अमित शर्मा

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गुरुवार, 25 मार्च 2010

अपनी आस्था का मंडन ही किसी प्रकार कल्याणकारी कैसे हो सकता है

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यस्यप्रणम्य चरणौवरदस्यभक्त्या स्तुत्वाचवाग्भिरमलाभिरतंद्रिता भि:। दीप्तैस्तमासिनुदतेस्वकरैर्वि वस्वां तंशंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥ जिन व...
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