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मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

शब-ए-गम



  वो गुदाज-ए-दिल-ए-मरहूम कहां से लाऊं
   अब मैं वो जज्बा-ए-मासूम कहां से लाऊं  

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मैं तन्हा था मगर इतना नहीं था,
तेरी तस्वीर से करता था बातें,
मेरे कमरे में आईना नहीं था,
समन्दर ने मुझे प्यासा ही रखा,
मैं जब सहरा में था प्यासा नहीं था,
मनाने रुठने के खेल में,
बिछड जायेगे हम ये सोचा नहीं था,
सुना है बन्द करली उसने आँखे,
कई रातों से वो सोया नहीं था,

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