बी.आर.चौपड़ा जी के महाभारत पर आधारित दृश्यों का आरोपण महर्षि वेदव्यास जी के महाभारत पर करते हुए विदुरजी को पोथीधर, भीष्मजी को मूर्ख, पञ्च पाण्डवों को क्लीव घोषित किया गया है।
चौपड़ा जी की महाभारत में ही यह दृश्य है कि शिशुपाल वध के पश्चात पुनः सुदर्शन धारण करते समय श्रीकृष्ण की अंगुली कट गई थी और द्रौपदी जी ने अपने ओढ़नी की लीर उनकी अंगुली पर बांधी थी।
इससे अनजाने में लिखा कथन भी सत्य निकला कि "लेखक ने महाभारत नहीं पढ़ी है।"
उस सभा में जितने जन उपस्थित थे सबको श्रीकृष्ण ने "निपटा दिया" ऐसा लेख में है।
परन्तु आश्चर्य है कि द्रौपदी के अपमान के सबसे बड़े दोषी उनके पांच पति नहीं निपटे।
'युधिष्ठिर को जुए का "शौक" था' ये किसने कहा?
शकुनि ने, अब शकुनि का वचन धर्मराज की धर्मज्ञता में प्रमाण होगा?? 😊 शकुनि ने भी "व्यसनी" नहीं कहा, उसने कहा "युधिष्ठर को द्युत प्रिय है।"
पुनः यही वचन अर्जुन ने कहे, किस प्रसङ्ग में ?
अपनी प्रतिज्ञा पूर्ति हेतु युधिष्ठिर महाराज के अपमान रूपी वध हेतु, क्योंकि उन्होंने गांडीवधारी के गांडीव पर कटाक्ष किया और अर्जुन की प्रतिज्ञा थी गांडीव को दुर्वचन कहने वाले का वध कर दूँगा।
तो यह भी उनके दुर्व्यसन रूप में जुआरी होने का प्रमाण नहीं है।
तनिक रुकिये तो!!!!
बात है युधिष्ठिर की, बात है महाभारत की तो जब महाभारत में युधिष्ठिर महाराज को धर्मराज कहा गया है तो वे धर्मराज ही रहेंगे उनकी धर्मज्ञता में हम आप किञ्चित ऊहापोह नहीं कर सकते।
हाँ आप कहिये युधिष्ठिर जी को कलंकराज पर अपनी अधिकारिता में, महाभारत के मिथ्या आरोपण से नहीं।
सम्पूर्ण महाभारत के नायक धर्मराज महाराज युधिष्ठिर ही हैं, स्वयं अनंतकोटी ब्रह्माण्डनायक श्रीकृष्ण भी नहीं। क्योंकि श्रीकृष्ण का नायकत्व महाभारत के विराट कथ्य में भी अकथ ही रहा जो स्वाभाविक ही है।
महाराज युधिष्ठिर पर आक्षेप लगाने का अर्थ है सनातन की समस्त ऋषि प्रज्ञा पर आरोप लगाना की वे मूर्ख लोभी थे जो उन्होंने किसी चक्रवर्ती जुआरी को लोभवश धर्मराज कहा।
महाराज युधिष्ठिर पर आक्षेप लगाने का अर्थ है
योगेश्वर श्रीकृष्ण पर आरोप लगाना की उन्होंने अपने सामर्थ्य का विनियोग एक मूर्ख जुआरी के समर्थन में उसे चक्रवर्ती बनाने के लिए किया।
महाराज युधिष्ठिर पर आक्षेप लगाने का अर्थ है उनके परमवीर अनुजों को बलशाली उज्जड मात्र सिद्ध करना कि वे इतने बुद्धिहीन थे कि अपने परम मूर्ख अविवेकी बड़े भाई की सारी बाते मानकर जीवनभर भटकते फिरे और उसे ही अपना राजा मानते रहे।
महाराज युधिष्ठिर पर आक्षेप लगाने का अर्थ है
की उन परम भट्टारिका राजराजेश्वरी भगवती याज्ञसेनी देवी द्रौपदी के अतुलित सामर्थ्य को तिरस्कृत करना जिनका इतना सामर्थ्य था कि यदि उन्हें धर्मराज युधिष्ठिर की धर्मज्ञता में अणुभर भी संदेह होता तो पाण्डवों का अस्तित्व ही भस्म कर देती। परन्तु वे सदा धर्मराज की सहधर्मिणी बनी रही।
और भी बहुत कुछ है परंतु अभी बस इतना ही निवेदन है, अपना मतरोपण कीजिये परन्तु अपनी अधिकारिता में, नाकि शास्त्रों के मिथ्या आवरण में। ना ही धारावाहिकों के कथानक को मूल शास्त्रों पर प्रमाणिकता देकर।