भारतीय
वैदिक दार्शनिक परम्परा में किसी भी ग्रन्थ के तात्पर्य का निर्णय केवल किसी एक
पृथक् वाक्य के आधार पर नहीं किया जाता, अपितु
सम्पूर्ण प्रकरण, पूर्वापर सन्दर्भ, ग्रन्थकार
के प्रतिपादित सिद्धान्त, प्रयुक्त प्रमाणों तथा तर्क-प्रवाह को सामने
रखकर किया जाता है।
यही कारण
है कि मीमांसक आचार्यों ने उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति को
तात्पर्यनिर्णय के प्रधान साधन माना है। यदि इन साधनों की उपेक्षा करके किसी एक
वाक्य को उसके मूल सन्दर्भ से पृथक् कर दिया जाए, तो अनेक
बार ऐसा अर्थ निकल आता है जो स्वयं ग्रन्थकार के प्रतिपादित सिद्धान्त के प्रतिकूल
होता है।
जगद्गुरु
श्रीनिम्बार्काचार्यपीठाधीश्वर श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजी महाराज द्वारा विरचित "सिद्धान्तरत्नाञ्जलि" के
तृतीय परिच्छेद में दशश्लोकी के चतुर्थ श्लोक की व्याख्या के अन्तर्गत
ब्रह्मस्वरूप-वर्णन तथा व्यूह-तत्त्व-निरूपण के प्रसंग में एक महत्त्वपूर्ण वाक्य
प्राप्त होता है-
“किञ्चायं सदाशिवो निर्गुणश्चेत् तदा सगुणशिवस्यांशी अत
एवास्य विष्णुना साम्यमाधिक्यं च विरचितम् (वा विरञ्चितम्)”।
प्रथम
दृष्टि में यह वाक्य ऐसा प्रतीत हो सकता है मानो आचार्यश्री सदाशिव को निर्गुण
ब्रह्म स्वीकार कर रहे हों अथवा उन्हें भगवान् विष्णु के तुल्य या उनसे भी श्रेष्ठ
सिद्ध करना चाहते हों। किन्तु जब इस वाक्य को उसके सम्पूर्ण प्रसंग, पूर्ववर्ती
व्यूह-प्रकरण, गुणावतार-विवेचन तथा तत्त्व-क्रम के भीतर रखकर
देखा जाता है, तब यह स्पष्ट हो जाता है
कि ऐसा निष्कर्ष न तो आवश्यक है और न ही आचार्यश्री के प्रतिपादित सिद्धान्त के
अनुकूल।
यहाँ एक
पाठालोचनात्मक तथ्य भी ध्यान देने योग्य है। श्रीहंसदासजी महाराज द्वारा अनूदित
एवं श्रीआचार्यपीठ द्वारा प्रकाशित संस्करणों में “विरञ्चितम्” पाठ
प्राप्त होता है, जबकि श्रीद्वारकादासजी कठियाबाबा द्वारा
स्वीकृत पाठ में “विरचितम्” उपलब्ध
है। यद्यपि यह पाठभेद रोचक है, तथापि सम्पूर्ण
प्रकरण के
सिद्धान्तगत निष्कर्ष में इससे कोई मौलिक अन्तर उत्पन्न नहीं होता। इसलिए
अर्थनिर्णय का आधार पाठभेद नहीं, बल्कि सम्पूर्ण
प्रसंग का तात्पर्य होना चाहिए।
आचार्यश्री
पहले श्रुति, स्मृति और भागवत-प्रमाणों के आधार पर भगवान्
के अनन्त कल्याणगुणमय स्वरूप का प्रतिपादन करते हैं। “विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचम्”, “न ते विष्णोर्जायमानो न जातः”, “सहस्रधा महिमानः” आदि
श्रुतिवाक्यों के आधार पर वे यह सिद्ध करते हैं कि भगवान् अनन्त कल्याणगुणों के
एकमात्र आश्रय हैं। इसके पश्चात् वे वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न
और अनिरुद्ध-
इन
चार व्यूहों का निरूपण करते हैं तथा श्रीभागवत के प्रमाणों द्वारा दिखाते हैं कि
सम्पूर्ण विश्व-व्यवस्था इन्हीं व्यूहों के अधीन संचालित होती है।
वासुदेव को जाग्रत्-अवस्था, प्रद्युम्न को स्वप्न, संकर्षण को सुषुप्ति तथा अनिरुद्ध को तुरीय से सम्बद्ध बताकर आचार्यश्री
यह स्पष्ट करते हैं कि विश्व के समस्त अनुभवात्मक और तात्त्विक स्तर इस
व्यूह-व्यवस्था में अन्तर्भूत हैं। किन्तु इसके साथ ही वे यह भी स्पष्ट कर देते
हैं कि ये व्यूह अन्तिम तत्त्व नहीं हैं। इन सबके भी अधिष्ठाता स्वयं श्रीकृष्ण
हैं-
“सर्वोत्तमोऽनन्यापेक्षमहिमैश्वर्य्यः श्रीकृष्ण एव
स्वयंरूपः।”
यह वाक्य
सम्पूर्ण प्रकरण का केन्द्रबिन्दु है। यहाँ आचार्यश्री केवल भगवान् श्रीकृष्ण की
स्तुति नहीं कर रहे, अपितु अपने सम्पूर्ण सिद्धान्त की आधारशिला
स्थापित कर रहे हैं। व्यूह, पुरुषावतार, गुणावतार, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र- समस्त
तत्त्व श्रीकृष्णाश्रित हैं; किन्तु श्रीकृष्ण
किसी अन्य तत्त्व पर आश्रित नहीं हैं।
इसी
सिद्धान्त को और अधिक स्पष्ट करने के लिए आचार्यश्री एक क्रमबद्ध तत्त्व-श्रृंखला
प्रस्तुत करते हैं। भूतों से प्राणी श्रेष्ठ हैं, प्राणियों
से मनुष्य, मनुष्यों से देवता, देवताओं
से ब्रह्मा, ब्रह्मा से शंकर, शंकर
से विष्णु, विष्णु से शेषशायी, उससे
विराट्, उससे महाविष्णु, उससे
पुरुष, उससे वासुदेव, उससे
परंज्योति परमात्मा और अन्ततः “कृष्णाख्यं परं ब्रह्म”। इस सम्पूर्ण
तत्त्व-क्रम का निष्कर्ष दो वाक्यों में निहित है- “ब्रह्मणः शङ्करः श्रेष्ठस्तत्परो विष्णुरेव हि।” और “कृष्णाख्यं परं ब्रह्म।” अर्थात्
शंकर से विष्णु श्रेष्ठ हैं और समस्त तत्त्वों की चरम प्रतिष्ठा श्रीकृष्णस्वरूप
परब्रह्म में है।
इसी
तत्त्व-क्रम में आगे कहा गया है- “परमात्मा
परज्योतिर्निरीहो निर्गुणो विभुः।” और
तत्पश्चात्-
“कृष्णाख्यं परं ब्रह्म नित्यंनित्यगुणाश्रयः।” यहाँ “निर्गुण” शब्द का प्रयोग उसी परम, परात्पर
और सर्वाधार तत्त्व के लिए हुआ है जिसकी अन्तिम प्रतिष्ठा “कृष्णाख्यं परं ब्रह्म”
में की गई है। अतः आचार्यश्री के मत में वास्तविक निर्गुण परब्रह्म वही है जो
अन्ततः श्रीकृष्णस्वरूप में प्रतिष्ठित है। यदि
ऐसा है, तो यह मानना अत्यन्त कठिन हो जाता है कि कुछ
ही पंक्तियों बाद वही आचार्यश्री सदाशिव को उस परम निर्गुण परब्रह्म के रूप में
प्रतिष्ठित कर देंगे। यदि उनका अभिप्राय वास्तव में यही होता, तो
उनके द्वारा पूर्व में स्थापित सम्पूर्ण तत्त्व-क्रम निरर्थक हो जाता। तब सदाशिव
को विष्णु से ऊपर, वासुदेव से ऊपर और अन्ततः परब्रह्म के स्थान
पर प्रतिष्ठित करना पड़ता, जबकि आचार्यश्री ऐसा कहीं नहीं करते।
अस्तु, इस
प्रसंग में आचार्यश्री एक अत्यन्त सूक्ष्म शंका का समाधान कर रहे हैं। इससे पूर्व
वे अनेक प्रमाणों द्वारा यह सिद्ध कर चुके हैं कि ब्रह्मा, रुद्र
आदि देवता परमस्वतन्त्र परब्रह्म नहीं हैं। ब्रह्मा कभी जीवविशेष भी हो सकते हैं
और भागवतादि प्रमाणों से यह भी प्रतिपादित किया जा चुका है कि संहारकर्ता रुद्र
संकर्षणांश से प्रकट होते हैं। इस प्रकार ब्रह्मा और रुद्र दोनों की
परमस्वतन्त्रता का निरसन कर देने के पश्चात् स्वाभाविक रूप से एक नई आपत्ति उठ
सकती है। कोई प्रतिपक्षी यह कह सकता है कि “आप जिन
रुद्र की चर्चा कर रहे हैं वे तो गुणात्मक अथवा सगुण रुद्र हैं; किन्तु
हम उस सदाशिव की बात कर रहे हैं जो निर्गुण, गुणातीत
और सामान्य रुद्र से भिन्न हैं।” वस्तुतः इसी सम्भावित शंका को लक्ष्य करके
आचार्यश्री कहते हैं- “किञ्चायं सदाशिवो
निर्गुणश्चेत्...”
यहाँ
विशेष ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि आचार्यश्री ने केवल “सदाशिवो निर्गुणश्चेत्”
नहीं कहा, अपितु “किञ्चायं सदाशिवो निर्गुणश्चेत्” कहा
है। संस्कृत गद्य में “किञ्च” का प्रयोग
सामान्यतः किसी पूर्व प्रतिपादित विषय के उपरान्त एक अतिरिक्त सम्भावना, पूरक
विचार अथवा सम्भावित आपत्ति को प्रस्तुत करने के लिए किया जाता है। अतः यह पद
स्वयं संकेत करता है कि आचार्यश्री यहाँ कोई नवीन सिद्धान्त प्रतिपादित नहीं कर
रहे, अपितु पूर्व में
स्थापित तत्त्व-व्यवस्था के सन्दर्भ में एक सम्भावित शंका का समाधान कर रहे हैं।
इसी प्रकार “अयम्” शब्द भी प्रतिपक्ष द्वारा मान्य उसी सदाशिव की
ओर संकेत करता है जिसकी चर्चा इस प्रसंग में उठ सकती है। इसलिए वाक्य का आरम्भ ही
यह स्पष्ट कर देता है कि यहाँ मुख्य सिद्धान्त का प्रतिपादन नहीं, बल्कि
एक पूरक विचार का परीक्षण किया जा रहा है।
इसी
प्रकार इस पूरे वाक्य की एक अन्य महत्वपूर्ण कुंजी “चेत्” शब्द
है। संस्कृत में “चेत्” का अर्थ है- “यदि”, “मान लो
कि”, “यदि ऐसा माना जाए तो”। यह सिद्धान्त का नहीं, सम्भावना
का सूचक है। अतः आचार्यश्री यह नहीं कह रहे- “सदाशिवो निर्गुणः” अपितु
कह रहे हैं-
“सदाशिवो निर्गुणश्चेत्” अर्थात्- “यदि सदाशिव निर्गुण माने जाएँ...”
यह अन्तर
अत्यन्त महत्वपूर्ण है। भारतीय शास्त्रार्थ-पद्धति में अनेक बार आचार्य प्रतिपक्ष
की मान्यता को क्षणभर स्वीकार करके उसके परिणाम का विचार करते हैं। यहाँ भी वही
स्थिति है। इससे पूर्व आचार्यश्री सिद्ध कर चुके हैं कि ब्रह्मा प्रद्युम्नांश हैं
और रुद्र संकर्षणांश हैं। अब यदि कोई शैवमतावलम्बी यह कहे कि “हम गुणात्मक रुद्र
की नहीं, निर्गुण सदाशिव की चर्चा कर रहे हैं”, तो
उसके उत्तर में आचार्यश्री कहते हैं- “अच्छा, यदि
सदाशिव को निर्गुण माना जाए, तो भी...”। अतः यह
वाक्य सिद्धान्त-वचन नहीं, बल्कि पूर्वपक्ष-स्वीकृत तर्क है।
इसी क्रम
में वे कहते हैं- “तदा सगुणशिवस्यांशी।” इसका अभिप्राय यह है कि यदि सदाशिव को निर्गुण
माना जाए, तो वे सगुण शिव के मूलस्वरूप अथवा कारणरूप
होंगे। यहाँ “अंशी” शब्द का सामान्य अर्थ है-
वह जिससे अंश प्रकट होता है। अर्थात् उस स्थिति में सगुण शिव, सदाशिव
की अपेक्षा गौण अथवा अवतरित रूप माने जाएँगे। इस प्रकार आचार्यश्री केवल इतना
स्वीकार करते हैं कि निर्गुण सदाशिव की कल्पना करने पर उन्हें सगुण रुद्र का
कारणरूप माना जा सकता है; इससे आगे बढ़कर उन्हें परम परब्रह्म सिद्ध
नहीं किया गया है।
इसके
पश्चात् आचार्यश्री कहते हैं- “अत एवास्य
विष्णुना साम्यमाधिक्यं च विरचितम्”
(पाठभेदानुसार- “विरञ्चितम्”)। यहीं इस पूरे वाक्य का सर्वाधिक सूक्ष्म और
निर्णायक पक्ष उपस्थित होता है। सामान्यतः ध्यान केवल “विष्णुना साम्यमाधिक्यं” पद पर केन्द्रित हो जाता है, जबकि
अर्थनिर्णय वास्तव में “विरचितम्/विरञ्चितम्” सहित
सम्पूर्ण वाक्य के आधार पर किया जाना चाहिए। यदि “विष्णुना” को “साम्यम्” और
“आधिक्यम्” दोनों से सम्बद्ध करके यह अर्थ किया जाए कि सदाशिव विष्णु के समान भी
हैं और विष्णु से श्रेष्ठ भी हैं, तो ऐसा अर्थ तत्काल
ही आचार्यश्री के पूर्व प्रतिपादित सिद्धान्त से टकरा जाता है। जिन्होंने अभी-अभी
स्पष्ट रूप से कहा है- “ब्रह्मणः शङ्करः
श्रेष्ठस्तत्परो विष्णुरेव हि”, तथा
सम्पूर्ण तत्त्व-क्रम को क्रमशः विष्णु, शेषशायी, विराट्, महाविष्णु, वासुदेव
और अन्ततः “कृष्णाख्यं परं
ब्रह्म” तक पहुँचाया है, वे बिना
किसी पृथक् प्रमाण, विस्तृत तर्क अथवा सिद्धान्त-परिवर्तन के
सदाशिव को विष्णु से श्रेष्ठ सिद्ध नहीं कर सकते।
इसके
विपरीत यदि “विष्णुना साम्यम्” का अर्थ भगवान् विष्णु के साथ तुल्यता लिया जाए और
“आधिक्यम्” का सम्बन्ध ब्रह्मा, रुद्र अथवा अन्य
अधीनस्थ तत्त्वों की अपेक्षा विशेष महिमा अथवा श्रेष्ठता से ग्रहण किया जाए, तो
सम्पूर्ण प्रसंग सहज रूप से सुसंगत हो जाता है। तब वाक्य का भाव यह होगा कि यदि
सदाशिव को निर्गुण माना जाए, तो वे सगुण शिव के
कारणरूप अथवा अंशी स्वीकार किए जा सकते हैं, और इसी
आधार पर शास्त्रों में उनके विषय में विष्णु-साम्य तथा विशेष महिमा के कथनों का
निरूपण किया गया है। विशेषतः “विरचितम्” अथवा “विरञ्चितम्” पद यह संकेत करता है कि यहाँ आचार्यश्री स्वयं
कोई नवीन तात्त्विक सिद्धान्त स्थापित नहीं कर रहे, अपितु
सदाशिव के सम्बन्ध में शास्त्रों में प्राप्त साम्य एवं महिमा-वचनों का कारण
स्पष्ट कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में, यहाँ
सदाशिव की स्वतन्त्र परमश्रेष्ठता का प्रतिपादन नहीं, बल्कि
उनके सम्बन्ध में प्रचलित शास्त्रीय वचनों का समन्वय किया जा रहा है। इस प्रकार
सम्पूर्ण वाक्य का अभिप्राय यह ठहरता है कि सदाशिव को निर्गुण मानने की स्थिति में
शास्त्रों में वर्णित उनकी विष्णुतुल्यता तथा ब्रह्मादि की अपेक्षा विशिष्ट महिमा
का आधार समझ में आता है। यही अर्थ न केवल वाक्य के पूर्वापर सन्दर्भ के अनुकूल है, बल्कि
आचार्यश्री द्वारा पूर्व में प्रतिपादित सम्पूर्ण तात्त्विक व्यवस्था तथा
श्रीकृष्ण-परत्व के सिद्धान्त के साथ भी पूर्ण सामञ्जस्य रखता है।
इस प्रकार
आचार्यश्री का आशय यह है कि यदि किसी मतानुसार सदाशिव को निर्गुण माना जाए, तो
उनके विषय में प्राप्त विष्णुतुल्यता तथा अन्य देवताओं की अपेक्षा श्रेष्ठता के
शास्त्रीय वचनों का समन्वय किया जा सकता है। इसलिए यह वाक्य न तो श्रीकृष्ण-परत्व
का खण्डन करता है, न विष्णु-श्रेष्ठता का निषेध, और
न ही सदाशिव को स्वतन्त्र परब्रह्म सिद्ध करता है। इसका वास्तविक प्रयोजन केवल
विभिन्न शास्त्रीय वचनों का समन्वय करना है।
अतः
सम्पूर्ण प्रकरण का निष्कर्ष यही है कि आचार्यश्री श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजी महाराज
का सिद्धान्त सर्वत्र एकरस और अखण्ड है। परम निर्गुण, परात्पर, सर्वाधिष्ठान, सर्वस्वरूपश्रेष्ठ
तथा स्वयंभगवान् तत्त्व एकमात्र श्रीकृष्ण ही हैं। व्यूह, पुरुषावतार, गुणावतार, ब्रह्मा, रुद्र
और सदाशिव सम्बन्धी समस्त चर्चाएँ अन्ततः उसी सर्वोच्च सिद्धान्त की पुष्टि के लिए
हैं। “अतः ‘किञ्चायं
सदाशिवो
निर्गुणश्चेत्’
को आचार्यश्री का स्वतन्त्र सिद्धान्त न मानकर, सदाशिव-सम्बन्धी
एक सम्भावित मत का विचार करते हुए प्रस्तुत समाधान के रूप में समझना चाहिए। इसका
उद्देश्य सदाशिव-महिमा सम्बन्धी शास्त्रीय वचनों का समन्वय करना है, न कि
पूर्व प्रतिपादित श्रीकृष्ण-परत्व का संशोधन या अतिक्रमण।” यही इस
सम्पूर्ण प्रकरण का वास्तविक, प्रसंगसंगत और
सिद्धान्तानुकूल अभिप्राय है।
अमित शर्मा
जयपुर
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