शायद किसी ने ठीक ही कहा है कि बेटियाँ बहुत जल्दी बड़ी हो जाती है. कितनी अच्छी तरह याद है मुझे जब मैं छै-सात साल का था, राखी का त्योंहार मुझे रुलाने लगा था. उदास बाल-मन में टीस पैदा होती थी कि मेरे कोई बहन क्यों नहीं है. माँ से खीज कर कहता था कि आप हॉस्पिटल से भाई की जगह बहन क्यों नहीं ले आयी थी.
एक अदद बहन के ना होने पर पैदा होने वाली कसक से उठतें बचकाने सवालों के जवाब भी उसी अंदाज में मिलतें थे. पर कोई भी जवाब रक्षाबंधन के आसपास के दिनों की हताशा,निराशा का समाधान नहीं करतें थे.
शायद भगवान् को भी दया आ गई और मेरे बड़े चाचाजी की शादी के साल भर बाद हमारे घर में एक नन्ही परी उतर आयी. आज भी कुछ धुंधला सा याद है जब मैं मम्मी के साथ रिक्शे में बैठ हॉस्पिटल जा रहा था तो कैसे रिक्शे वाले जल्दी जल्दी चलने के लिए टोक रहा था. कॉटेज में पहुंचकर चाचीजी के बगल में लेटी उस लाल-गुलाबी गुढ़िया को देखकर दिल कैसा हुमक-हुमक उठा था, शब्द ही नहीं है कैसे बताऊँ .......... और जब मुझे पलंग पर बैठा कर उस रुई के फाहे सी हल्की-कोमल लड़की को मेरी गोदी में लिटाकर दादीजी ने कहा की ले संभाल अपनी बहन को, तो मैंने सबसे पहले यही पूछा था की अब राखी कितने दिन बाद आएगी :)
उसके बाद कैसे इतने साल हँसतें खेलते बीत गए और हम सात भाई और तीन बहनों की हंगामी टीम में हम दोनों बड़े भाईयों के बाद, जब उस नन्ही नेहा की शादी पिछले दिनों जयपुर के ही डॉ. वरुण से पक्की हुयी तो बीते गुजरें इक्कीस साल की एक एक खट्टी-मीठी बात स्मृति-पटल पर तैरने लगी. कब यादों में खोये खोये ही गंग-जमुन धार बहकर भी बंद हो गयी, कुछ अंदाजा नहीं.
वह तो पत्नीजी आकर मसखरी करने लगीं की जब अपने साले की बहन को ब्याह कर लाये थे तब तो यह आंसू नहीं आये और अब खुद की बहन के ब्याह की बात पर रो रहे हो :)
रविवार को वाग्दान समारोह था, भावी जोड़े को आशीर्वाद दीजिये.
