शनिवार, 3 जुलाई 2010

हम लोगों ने निर्गुण- निराकार शब्दों को हाउ बना डाला है ---- अमित शर्मा

लोगों में सगुण और निर्गुण उपासना के तात्पर्य को लेकर बड़ा मतभेद है। एक सामान्य सी परिभाषा लोगों के दिमाग में फिक्स है की परमात्मा को निर्गुण मानकर की जाने वाली उपासना निर्गुण उपासना है, और साकार मानकर की जाने वाली उपासना सगुन उपासना। पर शायद बारीकी से सोचा जाये तो सगुन-निर्गुण का मतलब कुछ  और ही है। यदि उपास्य में ज्ञान,बाल,क्रिया,शक्ति,रूप  आदि कुछ माना ही ना जाये तो फिर उसकी उपासना की कोई आवश्यकता ही नहीं है। ऐसी वस्तु का क्या ध्यान किया जाये ? ऐसी शुन्य-कल्प निर्गुण वस्तु का तो निर्देशन करना भी कठिन है। हकीकत में तो ऐसा कोई तत्व हो ही नहीं सकता जिसमें रूप,गुण आदि ना हो।  हम लोगों ने निर्गुण- निराकार  शब्दों  को हाउ बना डाला है, और इन शब्दों के ऐसे कल्पित अर्थ कर डाले है की जनसामान्य की तो बुद्धि ही चकराने लगती है।  इन शब्दों के वास्तविक अर्थ क्या है, इस बारे में तो शास्त्रों का ही सहारा लिया जाना चहिये।

निर् + गुण और निर् + आकार आदि समस्त पद है। व्याकरण शास्त्र के आचार्यो ने ऐसा नियम बताया है की ------ निर् आदि अव्यवों का पंचमी विभ्क्त्यंती शब्दों के साथ क्रांत (अतिक्रमण) आदि अर्थों में समास होता है।


इनका विग्रह (विश्लेषण) इस प्रकार किया जाता है-------  निर्गतो गुणेभ्यो यः स निर्गुणः, निर्गत आकारेभ्यो यः स निराकारः ।
मतलब जो सारे गुणों का अतिक्रमण कर जाये (प्रकृति के सत्व, रज, तम तीनो गुणों से लिप्त ना हो ) वही निर्गुण कहलाता है। इसी तरह पृथ्वी आदि समस्त आकारों को जो अतिक्रमण करने की सामर्थ्य रखता हो, अर्थात जिसका आकार अखिल ब्रह्माण्ड से भी बड़ा हो, वही निराकार कहलाता है। निर्विशेष, निर्विकल्प आदि दूसरे  शब्दों का भी इसी तरह अर्थ होता है।

व्याकरण शास्त्र के इन शब्दों के उपर्युक्त अर्थ के समर्थक उदहारण भी है। जैसे-------- "
निस्त्रिंश: निर्गत: त्रिन्शेम्योsगुलिभ्यो यः स निस्त्रिंश:" अर्थात तीस अंगुल से बड़े खड्ग (तलवार) को निस्त्रिंश कहना चहिये।

इसी तरह वेदादि शास्त्रों में भी परमात्मा का आकार भी समस्त आकारों से बड़ा बताया गया है जिसके एक एक रोम में करोड़ों ब्रह्माण्ड स्थित है।

"ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।"

"पगु बिन चलै, सुनै बिन काना....कर बिन करम करै बिधि नाना"!!   का अर्थ भी इन्ही अर्थों में है.................
शास्त्रीय प्रमाणों से जब अर्थ का सामंजस्य हो जाता है, फिर ब्रह्म  को सर्वथा गुण रहित और आकार रहित कैसे माना जाये ???? 

 

19 टिप्‍पणियां:

  1. अमित जी....मैं आपके इस लेख से पूर्णतया सहमत हूँ...

    कभी कबही दुःख होता है, देख कर जब लोग ईश्वर के स्वरुप को अज्ञानता वश अनायास ही वाद- विवाद करने लगते है...

    आपकी लेखनी को शत शत प्रणाम...

    धन्यवाद ...

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  2. "निर्गतो गुणेभ्यो यः स निर्गुणः, निर्गत आकारेभ्यो यः स निराकारः । मतलब जो सारे गुणों का अतिक्रमण कर जाये"
    ---सही है,उसी तरह जो द्र्ष्यमान सभी आकारों का अतिक्रमण कर जाये,वह निराकार।
    पर अर्थ तो यह होगा कि जो सारे गुणों को धारण करते हुए उससे भी
    अतिक्रमण कर आगे निकल गया,निर्गुण।
    और जो जिसे हमारे ज्ञान चक्षु कोइ आकार देने में समर्थ नहिं,जो समस्त आकारों से परे है,निराकार।
    क्या मैं ठीक हूं अमित जी ?

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  3. बिलकुल सही कहा जी आपने.....

    शब्दों के मनमाने अनर्थो ने सत्य,भगवान्,परमात्मा,धर्म सब की परिभाषाये परिवर्तित कर के रख दी है....एक बेहद जरुरी और सार्थक पोस्ट ये....

    अभी इतना ही...

    कुंवर जी,

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. @ हम लोगों ने निर्गुण- निराकार शब्दों को हाउ बना डाला है, और इन शब्दों के ऐसे कल्पित अर्थ कर डाले है की जनसामान्य की तो बुद्धि ही चकराने लगती है।

    सत्य वचन महात्मा, सच में कई बार कन्फुज हो जाता हूँ इसे बारे में सुन-पढ़कर, पर अब आपके इस लेख से एक बार फिर दिव्य ज्ञान मिला हे. बहुत बहुत धन्यवाद इस पोस्ट के लिए

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  6. निर्गुण और सगुण एक ही सत्ता के अप्रगत और प्रगट रूप हैं -काठ में अग्नि जब प्रज्वलित हो उठती है तो सगुण हो उठती है मगर अप्रगट होने पर निर्गुण ....रामचरित मानस के कई स्थलों पर इसका सुन्दर विवेचन है !

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  7. मैं तो तुलसी बाबा के इस कथन पर विश्वास करता हूं कि "जाकी रही भावना जैसी ......"

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  8. हालाँकि साकार और निराकार में किसी भी तरह का कोई भेद ही नहीं है.भेद है तो सिर्फ हम लोगों की दृ्ष्टि का. क्यों कि गहरे में साकार निराकार के विपरीत नहीं अपितु निराकार का ही एक हिस्सा है. बल्कि अविभाजित हिस्सा है. विभाजित तो सिर्फ हमें दिखाई पडता है---हमारी देखने की क्षमता सीमित है, इसलिए--अन्यथा अविभाज्य है.
    हालाँकि सत्य तो सदैव एक ही रहेगा, जो अजर अमर है, अस्पृ्श्य और अदृ्श्य है. किन्तु ऎसे तटस्थ ब्रह्म से भला एक आम आदमी का कहाँ काम चलता है. वह ऎसा ईश्वर चाहता है जो प्रार्थना सुनकर द्रवित होता हो, जो गुहार और पुकार से पिघल सकता हो. वही जो योगियों, ज्ञानियों के लिए अज, अरूप, निर्गुण और निराकार है, वही एक आम साधारण मनुष्य के लिए आकार ग्रहण कर लेता है.
    हिय निर्गुण, नयनन्हि सगुण, रसना राम सुनाम
    मनहूँ पूरट सम्पुट लसत, तुलसी ललित ललाम!!

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  9. कबीर याद आ गए। चक्की भली पिस खाए संसार....बहरा हुआ खुदाए.........भेद हमारे मनों में है जानते हैं फिर भी जीवन में उतारते नहीं आखिर क्यों..

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  10. अच्छा विचारणीय आलेख:

    पगु बिन चलै, सुनै बिन काना....कर बिन करम करै बिधि नाना

    ....!!

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  11. इस्लाम हर इन्सान की जरूरत है, किसी आदमी को इस्लाम दुश्मनी में सख्त देखकर यह न सोचना चाहिये कि उसके muslim होने की उम्मीद नहीं।-पूर्व बजरंग दल कार्यकर्त्ता अशोक कुमार

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  12. "यदि उपास्य में ज्ञान,बाल,क्रिया,शक्ति,रूप आदि कुछ माना ही ना जाये तो फिर उसकी उपासना की कोई आवश्यकता ही नहीं है। ऐसी वस्तु का क्या ध्यान किया जाये ?...........................हम लोगों ने निर्गुण- निराकार शब्दों को हाउ बना डाला है,"

    बिलकुल सही कहा है जी, बहुत कम उम्र में, बहुत कम शब्दों में इतनी वजनदार बातें कहतें है आप अपनी पोस्टों में. हर बार की तरह से फिर एक शानदार पोस्ट,,,, बधाई

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  13. विवेक जी की बात दोहरा रहा हूँ

    "ज्ञान लेकर जा रहे हैं आपकी पोस्ट पर से" ( हमेशा की तरह )

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  14. जैसे जीवन की दौड़ है मृत्यु की ओर.
    या कहें शरीर की दौड़ है मिट्टी की ओर.
    जैसे स्थूल की गति है सूक्ष्म की ओर.
    या कहें साकार की गति है निराकार की ओर.

    और हम 'आस्तिक लोग' इस दौड़ और गति में अपने-अपने ग्राह्य दृश्यों को गाँठ बाँधकर पूजते रह जाते हैं.
    कुछों को रूप-आकार वाले दृश्य हाथ लगते हैं और कुछों को उनके आभास वाले दृश्य पकड़ में आते हैं.
    और कुछ तत्त्ववेत्ता इनकी पूरी दौड़ और गति को देखते हैं और पहचानते हैं. मुझे पं.डी.के.शर्मा"वत्स उनमें से ही लगते हैं.

    आपकी इस बार की पोस्ट भी विचार को गति देने के लिये अच्छी रही.

    मेरे मन के 'सूक्ष्म भाव' शब्दों में आकार लेकर ही बोधगम्य हो रहे हैं. और जब निराकार साकार में अवतरित होता है तब ही ज्ञान इन्द्रियाँ प्रसन्न हो पाती हैं. उन्हें विषयों में रमने की आदत जो हो गयी है.

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  15. अति सुंदर विचारणीय पोस्ट.जल भाप रूप में जहाँ निराकार प्रतीत होता है वही बर्फ रूप में ठोस साकार रूप लेता है.परमात्मा को भी निर्गुण निराकार अथवा सगुन साकार की कोई बाध्यता नहीं है.भगवद गीता अध्याय १२ (भक्ति योग ) के अनुसार परमात्मा की भक्ति दोनों प्रकार से की जा सकती है.सगुन साकार सरल है,निर्गुण निराकार थोडा कठिन .

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  16. अमितजी . आपके इस लेखने मनको बहुत शांति दी और मेरा धन्यवाद स्वीकार करें

    निर्गुणभक्ति शब्दके गुणोको कोई महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्यजीको अपेक्षित अर्थमे कोई वैष्णव स्वीलर न करे इसमें मेरा क्या दोष ? आपके द्वारा यहाँ बताये गए इस शब्दके इतने सारे अर्थभी अगर इस शब्दकी बहु अर्थिकाका लाभ न मिल सके तो कोई क्या करे ?

    श्री वल्लभ द्वारा बताई गई विरुद्ध धर्मंश्रायी ब्रह्मकी निर्गुण भाव और सगुन साकार स्वरूपमें सेवक स्वरुप अगर हमारी समझमें ५५० वर्षोंके बादभ तो श्री वल्लभ भी क्या करें

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