सोमवार, 15 नवंबर 2010

वेद साक्षात भगवान् की वाणी है, उनमें ऐसी कोई बात कभी नहीं हो सकती जो मनुष्य को अनर्गल विषयभोग और हिंसा की और जाने के लिए प्रोत्साहित करती हो.

इस संसार में अनेक प्रकार की प्रकृति के लोग है ; गीताजी में उनको दो भागों में विभक्त किया गया है ------ एक दैवी प्रकृति के तथा दूसरे आसुरी प्रकृति के मनुष्य----

     "द्वौ भूतसर्गौ लोकेsस्मिन दैव आसुर एव च"

इन दोनों प्रकार की प्रकृति के मनुष्यों के बारे में कुछ बताने की आवश्यकता ही नहीं है. फिर भी बिलकुल सूक्ष्म रूप से कहना चाहे तो कह सकते है की दैवी प्रकृति के लोग सात्विक जीवनचर्या का निर्वहन करते हुए परोपकार में निरत रहते है, जबकि आसुरी वृत्ति के मनुष्य दंभ,मान और मद में उन्मत्त हुए स्वेच्छाचार पूर्ण आचरण करते हुए पापमय जीवन जीते है.
बतलाने की आवश्यकता नहीं की प्राय ऐसे आसुरी लोग ही मांस-भक्षण और अश्लील सेवन की रूचि रखते है, और ऐसे कुक्करों ने ही अर्थ का अनर्थ करके वेद आदि शास्त्रों में मद्य मांस तथा मैथुन की आज्ञा सिद्ध करने की धृष्टता की है.


महाभारत में कहा गया है की प्राचीन काल से यज्ञ-याग आदि केवल अन्न से ही होते आये है. मद्य-मांस की प्रथा इन धूर्त असुरों ने अपनी मर्जी से चला दी है. वेद में इन वस्तुओं का विधान ही नहीं है------
१.  श्रूयते हि पुरा कल्पे  नृणां  विहिमयः  पशु: । 
    येनायजन्त  यज्वानः  पुण्यलोकपरायणाः ।।                  
२. सुरां मत्स्यान मधु मांसमासवं क्रसरौदनम । 
    धुर्ते:  प्रवर्तितं  ह्योतन्नैतद  वेदेषु कल्पितम ।।


असुर शब्द का अर्थ ही है --- "प्राण का पोषण करने वाला"  जो अपने सुख के लिए दूसरे प्राणियों की हिंसा करते है वे सभी असुर है. ये शास्त्र पड़ते हि इसलिए है की शास्त्र का मनमाना अर्थ करके येनकेन प्रकारेण शब्दों की व्युत्पत्ति करके खींचतान से चाहे जो अर्थ निकाल कर शास्त्रों की मर्यादा का नाश किया जा सके. इन कुकर्मियों द्वारा वेदों द्वारा यज्ञों में मद्य-मांस का विधान, पशुवध की रीति बतायी गयी है ऐसा कहा जाता है .


वेद साक्षात भगवान् की वाणी है, उनमें ऐसी कोई बात कभी नहीं हो सकती जो मनुष्य को अनर्गल विषयभोग और हिंसा की और जाने के लिए प्रोत्साहित करती हो. वेद भगवान् की तो स्पष्ट आज्ञा है ------------ "मा हिंस्यात सर्वा भूतानि" ( किसी भी प्राणी की हिंसा ना करें ).
बल्कि यज्ञ के ही जो प्राचीन नाम है उनसे ही यह सिद्ध हो जाता है की यज्ञ सर्वथा अहिंसात्मक होते आये है.
"ध्वर" शब्द का अर्थ है हिंसा. जहाँ ध्वर अर्थात हिंसा ना हो उसी का नाम है "अध्वर" . यह "अध्वर" ही यज्ञ का पर्यायवाची नाम है . अतः हिंसात्मक कृत्य कभी भी वेद विहित यज्ञ नहीं माना जा सकता है.
"यज" धातु से "यज्ञ" बनता है. इसका अर्थ है----- देवपूजा,संगतिकरण और दान. इनमें से कोई से भी क्रिया हिंसा का संकेत नहीं करती है.


वैदिक यज्ञों में तो मांस का इतना विरोध है की मांस जलाने वाली आग को सर्वथा ताज्य घोषित किया गया है. प्राय: चिताग्नि ही मांस जलाने वाली होती है. जहाँ अपनी मृत्यु से मरे हुए मनुष्यों के अंत्येष्टि-संस्कार में उपयोग की जाने वाली अग्नि का भी बहिष्कार है, वहाँ पावन वेदी पर प्रतिष्ठापित विशुद्ध अग्नि में अपने द्वारा मरे गए पशु के होम का विधान कैसे हो सकता है ?
आज भी जब वेदी पर अग्नि की स्थापना होती तो उसमें से अग्नि का थोडा सा अंश निकालकर बाहर रख दिया जाता है. इस भावना के साथ की कहीं उसमें क्रव्याद (मांस-भक्षी या मांस जलाने वाली अग्नि ) के परमाणु ना मिले हो. अत: "क्रव्यादांशं त्यक्त्वा" (क्रव्याद का अंश निकालकर ही ) होम करने की विधि है.
ऋग्वेद का वचन है-------
     क्रव्यादमग्निं प्रहिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः ।
       एहैवायमितरो जातवेदा  देवेभ्यो  हव्यं  वहतु  प्रजानन ।। 
                                                                                   ( ऋ ७।६।२१।९ )
"मैं  मांस भक्षी या जलाने वाली अग्नि को दूर हटाता हूँ, यह पाप का भार ढोने वाली है ; अतः यमराज के घर में जाए. इससे भिन्न जो यह दूसरे पवित्र और सर्वज्ञ अग्निदेव है, इनको ही यहाँ स्थापित करता हूँ. ये इस हविष्य को देवताओं के समीप पहुँचायें ; क्योंकि ये सब देवताओं को जानने वाले है."


ऋग्वेद में तो यहाँ तक कहाँ गया है की जो राक्षस मनुष्य,घोड़े और गाय आदि पशुओं का मांस खाता हो तथा गाय के दूध को चुरा लेता हो, उसका मस्तक काट डालो --------
यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्गक्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः ।
  यो  अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां  शीर्षाणि  हरसापि वृश्च ।। 
( ऋ ८।४।८।१६ )
 
अब प्रश्न होता है की वेदों में आदि मांस वाचक या हिंशा बोधक कोई शब्द ही प्रयुक्त न हुआ होता तो कोई उसका इस तरह का अर्थ कैसे निकाल सकता है ? 
इसका चिंतन करने योग्य सरल उत्तर यह है की प्रकृति स्वभावतः निम्न गामी होती है ; अतः प्रकृति के वश में रहने वाले मनुष्यों की प्रवृत्ति स्वभावतः विषयभोग की ओर जाती है. आसुरी स्वाभाव वाले विशेष रूप से निकृष्ट भोगों की तरफ जातें है. ओर उनकी प्राप्ति के साधन खोजतें है. इसी न्याय से इन आसुरी प्रकृति के लोगों ने वेद कथनों का मनमाना अर्थ लगा कर अपने कुकर्मों को वेद विहित कर्म घोषित कर दिया. 
महाभारत में प्रसंग आता है की एक बार ऋषियों और दूसरे लोगों में  "अज" शब्द के अर्थ पे विवाद हुआ. ऋषि पक्ष का कहना था की "अजेन यष्टव्यम" का अर्थ है  "अन्न से यज्ञ करना चाहिये. अज का अर्थ है उत्पत्ति रहित; अन्न का बीज ही अनादी परम्परा से चला आ रहा है; अतः वही  "अज" का मुख्य अर्थ है; इसकी उत्पत्ति का समय किसी को ज्ञात नहीं है; अतः वही अज है."
दूसरा पक्ष अज का अर्थ बकरा करता था. दोनों पक्ष निर्णय कराने के लिए राजा वसु के पास गए. वसु कई यज्ञ कर चुका था . उसके किसी भी यज्ञ में  मांस का प्रयोग नहीं हुआ था, पर उस समय तक वह मलेच्छों के संपर्क में आकर ऋषि द्वेषी बन गया था. ऋषि उसकी बदली मनोवृत्ति से अनजान उसी के पास न्याय करवाने पहुँच गए . उसने दोनों का पक्ष सुनकर ऋषियों के मत के विरुद्ध निर्णय देते हुए कहा " छागेनाजेन यष्टव्यम" . असुर तो यही चाहते थे. वे इस मत के प्रचारक बन गए; पर ऋषियों ने इस मत को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि यह किसी भी हेतु से संगत नहीं बैठता था. 

संस्कृत-वांग्मय में अनेकार्थ शब्द बहुत है. "शब्दा: कामधेनव:" यह प्रसिद्द है. उनसे अनेक अर्थों का दोहन होता है. पर कौन सा अर्थ कहाँ लेना ठीक है यह विवेकशीलता का काम है. कोई यात्रा पर जा रहा हो और "सैन्धव"  लाने के लिए काहे तो उस समय "नमक" लाने वाला मुर्ख ही कहलायेगा, उस समय तो सिन्धु देशीय घोड़ा लाना ही उचित होगा. इसी तरह भोजन में सैन्धव डालने के लिए कहने पर नमक ही डाला जाएगा घोड़ा नहीं .
इसी तरह आयुर्वेद में कई दवाइयों में घृतकुमारी (ग्वारपाठा) का उपयोग होता है, तो जहां दवा बनाने की विधि में " प्रस्थं कुमारिकामांसम " लिखा गया है; वहाँ किलो भर घृतकुमारी/ग्वारपाठा/घीकुंवार का गूदा ही डाला जाएगा . कुँवारी-कन्या का एक किलो मांस डालने की बात तो कोई नरपिशाच ही सोच सकता है. 
(साभार कल्याण उपनिषद-अंक)
                                                                                             जारी..............

36 टिप्‍पणियां:

  1. अमित जी,

    सार्थक वचन!! समयानुकूल!!

    प्रकृति स्वभावतः निम्न गामी होती है ; अतः प्रकृति के वश में रहने वाले मनुष्यों की प्रवृत्ति स्वभावतः विषयभोग की ओर जाती है. आसुरी स्वाभाव वाले विशेष रूप से निकृष्ट भोगों की तरफ जातें है. ओर उनकी प्राप्ति के साधन खोजतें है. इसी न्याय से इन आसुरी प्रकृति के लोगों ने वेद कथनों का मनमाना अर्थ लगा कर अपने कुकर्मों को वेद विहित कर्म घोषित कर दिया.

    काश की यह बात स्वयं को पशुतुल्य (आसुरी-प्रकृति) स्वीकार करने वालों तक पहूँचे!!

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  2. अमित,
    सरल उदाहरणों से अपना मंतव्य स्पष्ट किया है। वो अपना काम कर रहे हैं, आप अपना काम करते रहे है। मेरे पास अगर फ़िज़ूल की बातें हैं तो वही तो दे सकूंगा मैं?

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. अरे वाह ! अमित भाई,
    आनंद आ गया इस लेख को पढ़ के .... सच में
    संग्रह करने योग्य पोस्ट

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  5. >>>>>>>>>>> काली का आहार <<<<<<<<<<<<<<<<<<<


    1- काली सैकडों-लक्ष अर्थात लाखों हाथियों को मुख में रखकर चबाने लगी । -ठाकुर प्रेस, शिव पुराण पंचम युद्ध खण्ड अध्याय 37 पृष्ठ 3712- अम्बिका मदिरा अर्थात शराब पीती थी । -संस्कृति संस्थान , वामन पुराण , खण्ड 12 , ‘लोक 37 , पृष्ठ 2503- काली की जीभ से कन्या पैदा हो गई । -देवी भागवत , खण्ड 2, ‘लोक 36, पृष्ठ 248‘शिवलिंग और पार्वतीभगपूजा ?‘ का एक अंश लेखक : सत्यान्वेषी नारायण मुनि , स्थान व पोस्ट - सिकटा जिला - पश्चिमी चम्पारण , बिहार प्रकाशक : अमर स्वामी प्रकाशन विभाग , 1058 विवेकानन्द नगर , गाजियाबाद - 201001 मूल्य : 5 रूपये मात्र

    >>>>>>>>>>>>>>> शिवजी ओघड़ थे <<<<<<<<<<<<<<<<<

    1- ब्रह्मा जी शिवजी के पास गये और बोले - ‘‘हे ओघड़‘‘ । - साधना प्रेस हरिवंश पुराण पृष्ठ 140 2- सूत जी ने कहा - शंकर जी ‘‘ओघड़‘‘ हैं ।- डायमंड प्रेस ब्रह्माण्ड पुराण पृष्ठ 39/साधना प्रेस स्कन्ध पुराण पृष्ठ 19 शिवजी का भेष 1- मुण्डों की माला धारण करते हैं । - पद्म पुराण , खण्ड 1 , श्लोक 179 , पृष्ठ 324 शिवजी का निवास 1- शिवजी श्मशान घाट में रहते हैं । - डायमंड प्रेस वाराह पुराण पृष्ठ 160
    ?????????????????????????????????????????????????/??????????????/??????????????????


    शिवजी का आहार 1- शिवजी कहते हैं कि - ‘‘मैं हज़ारों घड़े शराब

    , सैकड़ों प्रकार के मांस से भी - ‘‘लिंग-भगामृत‘‘ के बिना

    सन्तुष्ट नहीं होता‘‘ । -


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    वेंकेटेश्वर प्रेस कुलार्णव तन्त्र उल्लास पृष्ठ 472- शिव जी अभक्ष्य

    पदार्थों का भक्षण करते हैं । - ठाकुर प्रेस शिव पुराण तृतीय पार्वती

    खण्ड अध्याय 27 पृष्ठ 235

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    ये सब क्या है वेद कुछ कह रहा है शंकर यानी शिव का वास्तविक

    रुप उूपर है किसकी मानोगे। आप कुछ कह रहे हो????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????

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  6. उस समय तक वह मलेच्छों के संपर्क में आकर ऋषि द्वेषी बन गया था. ऋषि उसकी बदली मनोवृत्ति से अनजान उसी के पास न्याय करवाने पहुँच गए . उसने दोनों का पक्ष सुनकर ऋषियों के मत के विरुद्ध निर्णय देते हुए कहा " छागेनाजेन यष्टव्यम" . असुर तो यही चाहते थे. वे इस मत के प्रचारक बन गए; पर ऋषियों ने इस मत को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि यह किसी भी हेतु से संगत नहीं बैठता था.

    इसी प्रकार श्रेष्ठ श्रुति की हिंसक व्यख्याएं हुई है।

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  7. "काश की यह बात स्वयं को पशुतुल्य (आसुरी-प्रकृति) स्वीकार करने वालों तक पहूँचे!"
    !

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  8. शिवजी का आहार 1- शिवजी कहते हैं कि - ‘‘मैं हज़ारों घड़े शराब

    , सैकड़ों प्रकार के मांस से भी - ‘‘लिंग-भगामृत‘‘ के बिना

    सन्तुष्ट नहीं होता‘‘ । -

    1.वेद मे मांस का भक्षण करना ऐसे कृत्य करने वालो को असुर कहा है
    शिवजी असुर हो गये

    (2).काली सैकडों - लक्ष अर्थात लाखों हाथियों को मुख में रखकर

    चबाने लगी ।

    -ठाकुर प्रेस, शिव पुराण पंचम युद्ध खण्ड अध्याय 37 पृष्ठ

    3712- अम्बिका मदिरा अर्थात शराब पीती थी ।

    देवियां भी ये भी असुर हैं।



    (3.)रामचन्द्र भी असुर हो गये क्योकि वो हिरण का षिकार करते थे


    तो सही कौन है

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  9. स्वामी विवेकानंद ने पुराणपंथी ब्राह्मणों को उत्साहपूर्वक बतलाया कि वैदिक युग में मांसाहार प्रचलित था . जब एक दिन उनसे पूछा गया कि भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कौन सा काल था तो उन्होंने कहा कि वैदिक काल स्वर्णयुग था जब "पाँच ब्राह्मण एक गाय चट कर जाते थे ." (देखें स्वामी निखिलानंद रचित 'विवेकानंद ए बायोग्राफ़ी' प॰ स॰ 96)
    € @ अमित जी, क्या अपने विवेकानंद जी की जानकारी भी ग़लत है ?
    या वे भी सैकड़ों यज्ञ करने वाले आर्य राजा वसु की तरह असुरोँ के प्रभाव में आ गए थे ?
    2- ब्राह्मणो वृषभं हत्वा तन्मासं भिन्न भिन्नदेवताभ्यो जुहोति .
    ब्राह्मण वृषभ (बैल) को मारकर उसके मांस से भिन्न भिन्न देवताओं के लिए आहुति देता है .
    -ऋग्वेद 9/4/1 पर सायणभाष्य
    सायण से ज्यादा वेदों के यज्ञपरक अर्थ की समझ रखने वाला कोई भी नहीं है . आज भी सभी शंकराचार्य उनके भाष्य को मानते हैं । Banaras Hindu University में भी यही पढ़ाया जाता है ।
    क्या सायण और विवेकानंद की गिनती कुक्कुरों , पशुओं और असुरों में करने की धृष्टता क्षम्य है ?

    उत्तर देंहटाएं
  10. चाहे विवेकानंदजी हो या फिर दयानन्दजी या फिर आप और हमारे जैसे संसारी जीव यदि विवेक को साथ रखते हुए वेदार्थ पर विचार किया जाएगा तो वेद भगवान् ही ऐसी सामग्री प्रस्तुत कर देतें है, जिससे सत्य अर्थ का भान हो जाता है. जहाँ द्वयर्थक शब्दों के कारण भ्रम होने की संभावना है, वहाँ बहुतेरे स्थलों पर स्वयं वेदभगवान ने ही अर्थ का स्पस्थिकरण कर दिया है----
    "धाना धेनुरभवद वत्सोsस्यास्तिल:" ( अथर्ववेद १८/४/३२ ) --- अर्थात धान ही धेनु है और तिल ही उसका बछडा हुआ है .

    "ऋषभ" एक प्रकार का कंद है; इसकी जद लहसुन से मिलती जुलती है. सुश्रतु और भावप्रकाश आदि में इसके नाम रूप गुण और पर्यायों का विशेष विवरण दिया गया है . ऋषभ के - वृषभ, वीर, विषाणी, वृष, श्रंगी, ककुध्यानआदि जितने भी नाम आये है, सब बैल का अर्थ रखते है. इसी भ्रम से "वृषभमांस" की वीभत्स कल्पना हुयी हुई है, जो "प्रस्थं कुमारिकामांसम" के अनुसार 'एक सेर कुमारी कन्या के मांस' की कल्पना से मेल खाती है. वैध्याक ग्रंथों में बहुत से पशु पक्षियों के नाम वाले औषध देखे जाते है. ------- वृषभ ( ऋषभकंद ), श्वान ( ग्रंथिपर्ण या कुत्ता घास) , मार्जार ( चित्ता), अश्व ( अश्वगंधा ), अज (आजमोदा), सर्प (सर्पगंधा), मयूरक (अपामार्ग), कुक्कुटी ( शाल्मली ), मेष (जिवाशाक), गौ (गौलोमी ), खर (खर्परनी) .
    यहाँ यह भी जान लेना चहिये की फलों के गुदे को "मांस", छाल को "चर्म", गुठली को "अस्थि" , मेदा को "मेद" और रेशा को "स्नायु" कहते है -------- सुश्रुत में आम के प्रसंग में आया है----
    "अपक्वे चूतफले स्न्नायवस्थिमज्जानः सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यन्ते पक्वे त्वाविभुर्ता उपलभ्यन्ते ।।"
    'आम के कच्चे फल में सूक्ष्म होने के कारण स्नायु, हड्डी और मज्जा नहीं दिखाई देती; परन्तु पकने पर ये सब प्रकट हो जाती है.'

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  11. @ सुज्ञजी, सक्सेना जी यह बात उन तक पहुंचे ना पहुंचे पर अपनी कोशिश तो अब घर बचाने की होनी चाहिये की अपनी जानकारी में ही अपना कोई इस नरक पंथ पर ना चल पड़े ........

    @ गौरव भाई पोस्ट के संग्रहण से काम नहीं चलेगा ................ आप इस ध्येय का संगी बनना होगा आपकी खोजी प्रवृत्ति अगर वेद भगवान् पर अनर्गल आक्षेप लगाने वालों के मुंह तोड़ने में काम आ सके तो अपने आप को कृतज्ञ मानूंगा

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  12. @ मौसमजी, अभिषेकजी आभार .

    @ बेनामी वंश उत्पन्न कुकर्मीजी अपना सड़ा राग अपने प्रेमियों के ब्लॉग पर ही बजाया कीजिये. वर्णसंकर की विशेष पहचान होती है की वह हमेशा उलटे सीधे काम ही करता है, यहाँ बात वेदों की हो रही है और तुम कहाँ कहाँ से उलजुलूल प्रकाशनों के उद्धरण दे रहे हो.

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  13. जिसने भी धर्म ग्रथं लिखा वो तो चला गया और उसमे ऐसा लिखा

    कि अच्छे अच्छे ज्ञान वान लोग उलझ कर उसे अब सुलझाने मे लगे

    है। अपने दिमाग से ज्ञानी लोग शब्दो का अर्थ बदल कर पेश कर रहे

    है। अरे जिसने लिखा वो नही सुलझा पाया तो आप लोग क्या

    सुलझाओगें। वो तो कोरी बकवास कर के उलझा गया अब उलझे रहो।

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  14. रावण का विरोध यहां के ब्राम्हण क्यो करते थे क्योकि रावण तामसी

    प्रवत्ती का नही था और यहां के ब्राम्हण तामसी प्रवत्ती के थे वो

    भारत के ब्राम्हणो की बैल की बली और उसका भक्षण तामसी प्रवत्ती

    से घ्रणा करता था इसी लिये यहा के ब्राम्हणो ने उसे राम चन्द्र से

    मरवा दिया। हकीकत है ये

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  15. शंकराचार्य जी और विवेकानंद जी के ज्ञान को नकार कर अपना घर कैसे बचा पाएँगे आप ?
    @ अमित जी, कृप्या मूल प्रश्नों के जवाब स्पष्ट रूप से दें कि
    1- क्या अपने विवेकानंद जी की जानकारी भी ग़लत है ?
    या वे भी सैकड़ों यज्ञ करने वाले आर्य राजा वसु की तरह असुरोँ के प्रभाव में आ गए थे ?
    2- सायण से ज्यादा वेदों के यज्ञपरक अर्थ की समझ रखने वाला कोई भी नहीं है . आज भी सभी शंकराचार्य उनके भाष्य को मानते हैं ।
    क्या सायण और विवेकानंद की गिनती कुक्कुरों , पशुओं और असुरों में करने की धृष्टता क्षम्य है ?
    3- Banaras Hindu University में भी यही पढ़ाया जाता है ।
    क्या BHU में भी ग़लत पढ़ाया जा रहा है ?
    4- शंकराचार्य जी और विवेकानंद जी के ज्ञान को नकार कर अपना घर कैसे बचा पाएँगे आप ?

    उत्तर देंहटाएं
  16. शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक्छत्रेण सूर्यातपो नागेन्द्रो निशिताङ्कुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ।
    व्याधिर्भेषजसङ्ग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषं सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्।।
    जल से अग्नि बुझाया जा सकता है, सूर्य के ताप को छाते से रोका जा सकता है, मतवाले हाथी को तीखे अंकुश से वश में किया जा सकता है, पशुओं को दण्ड से वश में किया जा सकता है, औषधियों से रोगों को भी शान्त किया जा सकता है, विष को भी अनेक मन्त्रों के प्रयोगों से आप उतार सकते हैं - इस तरह सब उपद्रवों की औषधि शास्त्र में है,परन्तु मूर्खों, दुराग्रहियों की किसी शास्त्र में कोई औषधि नहीं है....
    मूर्खता का इससे बडकर प्रमाण भला क्या होगा कि आलेख की मूल भावना एवं विषय् से इतर ये स्वनामधन्य लोग अपनी ही हाँकने में लगे हैं.कुछ ओर न मिला तो अब शंकराचार्य जी और विवेकानन्द जी की रामकहानी ले बैठे. इसलिए लम्पटों को ज्ञान देने में अपनी उर्जा नष्ट करने की अपेक्षा आप इस 'ज्ञान यज्ञ' में आहूति देने में समय का सदुपयोग करें. उस समाज के कल्याण के लिए, जो कि ईश्वरप्रदत बुद्धि का प्रयोग कर कुछ जानना,समझना, उसे ग्रहण करना चाहता हैं.
    अब तो हमारी ये धारणा पुख्ता होने लगी है कि इन्सान की शिक्षा का उसकी बुद्धि से कैसा भी कोई सरोकार नहीं है. पढ लिखकर भी कुछ लोग जीवन भर मूर्ख के मूर्ख ही बने रहते हैं........

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  17. जमाल साहेभ क्या रट्टा लगाए हुए हैं आप किसी भी मनुष्य का ज्ञान हमेशा पूर्ण नहीं होता, और ना हिन्दू किसी एक का आँख मीच कर अनुगमन करने वाली भेड़ है. (आप जैसे मेरे कुटुम्बियों के समान)
    विवेकानंदजी क्या कहा, क्या पाया इसका उन्होंने दुराग्रह नहीं किया की मैंने जो जाना समझा है वही परीपूर्ण अंतिम सत्य है ..................और जो इसे नहीं मानेगा वह मार डाला जाएगा.
    तो जब उन्होंने इस बात का उद्घोष ही नहीं किया की मेरा ज्ञान ही परीपूर्ण,अंतिम और सत्य है ............मैं जो कह रहा हूँ उसके इनकारी के लिए सिर्फ और सिर्फ मौत है ...................जब उनका ऐसा आग्रह नहीं था तो आप क्यों विवेकानंदजी की अवमानना को लेकर दुःख दुबले हो रहे है.
    ऐसा ही सायण भाष्य और BHU के लिए समझे .
    बंधुजी मेरा घर मेरे पुरखों के प्रताप से सुरक्षित है....................आप अपने पाप के ताप से अपने घर को बचाने का उपाय सोचिये .

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  18. पंडितजी अब तो दो घडी चैन से नहीं रहने देते कई कुकर्मीजन(मांस भक्षी)............... मेहनत से अध्यन करके किसी विषय पर कुछ इस लिए लिखते है हमारे जैसे ब्लोगर की आप जैसे गुरुजनों से अधिक विस्तार से और भी जानने को मिलेगा, पर नहीं !!!!!!! इनके तो खुजली पाउडर की बरसात होती रहती है जिसे खुजाते-खुजाते यहाँ वहाँ रगड़े देते रहते है :) और सारी मेहनत का गुड गोबर करदेते है ................अरे भाई हम आपके पास जोर आजमाईश के लिए नहीं आ रहे की आप सन्मार्गी बनजाओ,,, फिर आप हमें कुमार्ग का उपदेश देने की हट क्यों पाल रखे हो

    उत्तर देंहटाएं
  19. काम क्रोध मध लोभ की जब लग मन मे खान तब लग पंडित मूखों

    तुलसी एक समान।।

    ये पंक्ति भगवानो के उपर लागू नही होती क्योकि उन्हे छूट थी
    इन्हे सारे कुकर्म माफ थे मानव जाति इनके भोग विलास का साधन थें।

    ये शूद्रों के लिये है।

    मगर मेरे विचार:- पाथर पूजें हरि मिलें तो मै पूजौं पहाड़।।

    1 - ऐसे देवी देवता है कि मंदिर मे कुत्ता टांग उठा कर इनके उपर मूत के चला जाता है मगर ये कुत्ते को भगा नही सकते।
    कहते है कि बड़े प्रतापी हैं। बहुत शक्ति है इनमें फिर भी महान हैं

    2-कुत्ता तो छोड़ो मक्खी तक भगा नही सकते हमारी क्या मदद करेगें। फिर भी महान हैं

    3-प्रसाद खाके सेकड़ो बीमार हो जाते है फिर भी महान हैं

    4-प्रसाद खाने से कोई बीमार ठीक नही होता फिर भी महान हैं

    5- हर साल मंदिरों मे भगदड़ हजारों मर जाते हैं। फिर भी महान हैं

    6- हर साल हजारों दर्शन करने जाते समय या दर्शन करके लौटते समय एक्सीडेंन्ट मे मर जाते है। फिर भी महान हैं

    7- अस्थि विसर्जन करने जाते समय कितने दुर्घटनाओं मे मर जाते है फिर भी महान हैं।


    मूर्खों कि कमी नही है बड़े बड़े ज्ञानीयों की बुद्धी भ्रष्ट है क्या करें

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  20. आर्यों की सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहते हैं। पहले दृष्टिकोण के अनुसार लगभग १७०० ईसा पूर्व में आर्य अफ़्ग़ानिस्तान, कश्मीर, पंजाब और हरियाणा में बस गये। तभी से वो लोग (उनके विद्वान ऋषि) अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिये वैदिक संस्कृत में मन्त्र रचने लगे। पहले चार वेद रचे गये, जिनमें ऋग्वेद प्रथम था। उसके बाद उपनिषद जैसे ग्रन्थ आये। हिन्दू मान्यता के अनुसार वेद, उपनिषद आदि ग्रन्थ अनादि, नित्य हैं, ईश्वर की कृपा से अलग-अलग मन्त्रद्रष्टा ऋषियों को अलग-अलग ग्रन्थों का ज्ञान प्राप्त हुआ जिन्होंने फिर उन्हें लिपिबद्ध किया। बौद्ध और धर्मों के अलग हो जाने के बाद वैदिक धर्म मे काफ़ी परिवर्तन आया। नये देवता और नये दर्शन उभरे। इस तरह आधुनिक हिन्दू धर्म का जन्म हुआ।

    दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार हिन्दू धर्म का मूल कदाचित सिन्धु सरस्वती परम्परा (जिसका स्रोत मेहरगढ़ की ६५०० ईपू संस्कृति में मिलता है) से भी पहले की भारतीय परम्परा में है।

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  21. अत्यंत सार्थक चर्चा-परिचर्चा|वेद-ज्ञान की सच्ची उपादेयता ही खोजियों एवं जिज्ञासुओं का विवेक जाग्रत करने में है|रचना काल से हजारों वर्षों में वेदों ने जितने लोगों को संस्कारी बनाया है उसकी तुलना में बहुत कम लोग(लगभग नगण्य)सायण का भाष्य समझ कर कुमार्गी हुए हैं|हर भाष्यकार एवं टिप्पणीकार की अपनी सीमा होती है|भारतीय मेधा एवं अभिरुचि अत्यंत परिष्कृत है|'सार-सार को गहि लिया थोथा दिया उडाय|'
    - अरुण मिश्र.

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  22. to mr anonymous
    पाथर जोरि के मस्जिद लई बनाय
    ता चढि मुल्ला बाग दे क्या बहरा हुआ खुदाय .....

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  23. 5- हर साल मंदिरों मे भगदड़ हजारों मर जाते हैं। फिर भी महान हैं

    6- हर साल हजारों दर्शन करने जाते समय या दर्शन करके लौटते समय एक्सीडेंन्ट मे मर जाते है। फिर भी महान हैं

    ha ha ha... kya mast joke maara hai...
    aur kuch log yahan se hawayi yatra karke doosre desh jaate hain... wahan jaakar ek jagah patthar fekakar shaitaan ko maarte hain.... usme na jaaane kitne bewkoof maare jaate hain...
    ha ha ha...
    bura jo dekhan main chala bura n milya koi
    jo man khoja aapna to mujhse bura na koi....
    ha ha ha.....

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  24. ..

    भाइयो ईद है आज़, मुझे मत रोकना मुबारक बाद देने से.

    हमारी गली से कुछ दूर
    हर साल की तरह
    इस बार भी
    चीख-पुकार होगी
    जीव-तंतुओं द्वारा -
    "ईद मुबारक ईद मुबारक" की
    इस चीख का अर्थ होगा "जाएँ तो जाएँ कहाँ"
    यह अर्थ की चौथी शब्द शक्ति है : तात्पर्य शब्दशक्ति
    इस शक्ति के द्वारा हम वास्तविक अर्थ तक पहुँचते हैं. मुबारकबाद में भी 'बचाओ बचाओ का स्वर' सुनते हैं.


    ईद
    ____

    भाइयो !
    मिलकर मनाओ ईद
    दिल में ना रह जाए
    कसक औ' फिकर ।

    ग़र ग़रीबी में
    दबा हो कोई बन्दा
    बाँट फ़ितरा दिखा
    उसको भी जिगर ।

    पर ना जिंदा
    जनावर को मार
    मुर्दा खा ना बन्दे
    कर परिन्दे - बेफ़िकर ।

    दर और दरिया
    मान सबका
    मौहब्बत का —
    सब बराबर, सब बराबर ।

    ज़र और जोरू
    है सलामत
    ख़ुद की व औरों की
    रख पाक अपनी भी नज़र ।

    सरहद हिंद पर
    मरने का ज़ज्बा पाल
    कर दे दुश्मनों को
    नेस्तनाबुद ओ' सिफर ।

    ..

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  25. @प्यारे वशिष्ठ जी !
    @ शेखर सुमन जी ! स्वामी करपात्री ने वेदार्थ पारिजात भाग 2 पृष्ठ 1977 पर लिखते हैं -
    यज्ञ में किया जाने वाला पशुवध भी पशुओं का स्वर्गप्रापक होने से तथा पशुयोनि निवारण पूर्वक दिव्यशरीर प्राप्ति कराने में कारण होने से पशु का उपकारक ही होता है । वह यज्ञीय पशु अपकृष्ट योनि से विमुक्त होकर देवयोनि में उत्पन्न होता है ।

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  26. चीख भी सुन लो सुनो पुकार भी,
    श्राप भी सुनो और हाहाकार भी।
    ए आदम की औलाद तू क्या आदमी,
    औलादों की तेरे भी थी क्या कमी।
    जिन की जान के बदले आई हमारी जानपर,
    जिएगी तेरी औलादे भी बनकर जानवर॥

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  27. काम क्रोध मध लोभ की जब लग मन मे खान तब लग पंडित मूखों

    तुलसी एक समान।।

    ये पंक्ति भगवानो के उपर लागू नही होती क्योकि उन्हे छूट थी
    इन्हे सारे कुकर्म माफ थे मानव जाति इनके भोग विलास का साधन थें।

    ये शूद्रों के लिये है।

    मगर मेरे विचार:- पाथर पूजें हरि मिलें तो मै पूजौं पहाड़।।

    1 - ऐसे देवी देवता है कि मंदिर मे कुत्ता टांग उठा कर इनके उपर मूत के चला जाता है मगर ये कुत्ते को भगा नही सकते।
    कहते है कि बड़े प्रतापी हैं। बहुत शक्ति है इनमें फिर भी महान हैं

    2-कुत्ता तो छोड़ो मक्खी तक भगा नही सकते हमारी क्या मदद करेगें। फिर भी महान हैं

    3-प्रसाद खाके सेकड़ो बीमार हो जाते है फिर भी महान हैं

    4-प्रसाद खाने से कोई बीमार ठीक नही होता फिर भी महान हैं

    5- हर साल मंदिरों मे भगदड़ हजारों मर जाते हैं। फिर भी महान हैं

    6- हर साल हजारों दर्शन करने जाते समय या दर्शन करके लौटते समय एक्सीडेंन्ट मे मर जाते है। फिर भी महान हैं

    7- अस्थि विसर्जन करने जाते समय कितने दुर्घटनाओं मे मर जाते है फिर भी महान हैं।


    मूर्खों कि कमी नही है बड़े बड़े ज्ञानीयों की बुद्धी भ्रष्ट है क्या करें

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  28. @ Anonymous
    एक बार हम चार पांच दोस्त गाँव के पास बीड में दिशा-मैदान के लिए गए. वहाँ एक कलंदर जो की अजमेर जियारत के लिए जा रहे थे; नमाज -ए-अस्र का समय हो जाने के कारण वहीँ नमाज अता करने लगे; हम भी अपना काम भूलकर श्रद्धा से उनकी अर्चना देखने बैठ गए. दूसरी रकत में सजदे के लिए ज्यों ही झुके एक सूअर कहीं से दौड़ता हुआ आया कलंदर जी के पिछवाड़े की तरफ से जोरदार तरीके से भिड गया, कलंदर जी चारों खाने चित्त !!!!!!!!!!!!! अब हम भी सोचने लगे की यार नमाज पढ़ते समय तो बन्दा-खुदा की बारगाह में होता है फिर यह सूअर की तरह बाबाजी को चित्त कर गया, अल्लाहजी ने सूअर को रोका क्यों नहीं ????????????? अब बेटा बेनामी वंश की उपज कुकर्मीचंद इस बात का जवाब दे अल्लाह मियाँ ने उन कलंदर जी को क्यों नहीं बचाया क्या नमाज झूंठी होती है ?????????????

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  29. @ Anonymous
    बेनामी वंश की उपज कुकर्मीचंद!
    मेरा गाँव अजमेर रोड पर ही है, हर साल कम से कम ५०० जियारातियों के एक्सीडेंट में मरने की ख़बरें तो तुम्हे फोटो सहित भेज दूंगा अपना मेल आई डी दे दीज्यो

    अर वोह ज्यो हज्ज में हडकंप मचता है और हजारों दब कुचलकर मरे जाते हैं भाप्ड़े उसका क्या कारण है ज़रा जे भी बतला दीज्यो

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  30. ..
    काम क्रोध .... तुलसी एक समान।।
    @ हे अमूर्ख विद्वान् !
    पंडित मूरख के एक समान !
    जब मन में घर किये रहे
    काम क्रोध मद मान.
    _______________

    # ये पंक्ति भगवानो के उपर लागू नही होती क्योकि उन्हे छूट थी
    इन्हे सारे कुकर्म माफ थे मानव जाति इनके भोग विलास का साधन थें।
    @ आपके भगवान् शायद वे हैं जो कवि-कलाकारों ने तय किये. जिनका चरित्र गोपी-वस्त्र हरण, एकाधिक पत्नियाँ रखना, परस्पर द्वेष रखना, झगड़े करना रहा. लेकिन इन गपोड़ों के रचयिता स्वयं विलासी भक्त जन रहे.
    भक्ति के बहाने अब तक बहुत कुछ हो चुका है. इस पर विस्तार से बाद में बात करेंगे.

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  31. ..
    1 - ऐसे देवी देवता है कि मंदिर मे कुत्ता टांग उठा कर इनके उपर मूत के चला जाता है मगर ये कुत्ते को भगा नही सकते।
    कहते है कि बड़े प्रतापी हैं। बहुत शक्ति है इनमें फिर भी महान हैं.
    @ आपको स्थूल उदाहरणों से समझाता हूँ.
    — ईश के लिये सभी जीव-जंतु एक समान होते हैं. कुत्ता मूते या मक्खी बैठे उसके लिये वे पुत्रवत हैं.
    — बच्चा गोद में माँ के सभी कुछ कर देता है. क्या माँ उसका अनिष्ट कर देती है.
    ..

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  33. ..

    2-कुत्ता तो छोड़ो मक्खी तक भगा नही सकते हमारी क्या मदद करेगें। फिर भी महान हैं
    @
    — यदि भगा दे तो क्या उससे उसकी महानता बरकरार रहेगी.
    — अवसर देना क्या महानता नहीं है?
    — यदि मेरे टिप्पणी बॉक्स में आप आकर गाली-गलौज कर जाते हैं. तो क्या उसे मैं अपना अपमान मानूँ?
    — जिसकी जैसी समझ, जितनी समझ, वह अपनी क्षमताओं में ही करता है.

    ..

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  34. ye AAWAR SHAYAD KUCH JADA HI BOL RAHA HAI............EK BAT KAHA TO SAMAJ ME NAHI AATA KI MAA APNE BETE KO PYAR KARTI HAI VAH Q USE NAFRAT KAREGI KYA SHAYAD TERI MAA NE KAHA HOGA KI , BETE MAI TUJHE BAHOT MAMATA KARTI HU AUR AGLE KSHAN VAH TUJHE NAFRAT BHI KARNE LAGI HO..... KYA TARK HAI ANWAR ISME SAMJHE AAP AAP KAHTE HAI KI VEDO ME GOHATYA HOTI THI AUR AAPNE KUCH SHLOK BHI PRASTUT KIYE PAR KYA AAPKO US SHLOK ME KE AARTH BHI SAMAJ AAYE HAI KUCH BAS BAWAS BAKBAK KARE JA RAHE HO.. AAGAR HINDU DHARM KO SAMJNA HAI TO PAHLE USKA PURA AADHYAN KARE FIR BOLE...AUR EK BAT JIS VEDO ME EK BAR KAHA GAYA HAI KI GOHATYA PAP HAI TO VO FIRSE GOHTYA KA SAMRTHAN KAISE KAREGI .....YAH AASURI VRUTTIYO KI CHAL HAI .....AAP JAISE LOGO SE HI SAMAY SE PURV MAHAPRALAY AAYEGA HAME TO KUCH FARAK NAHI PADEGA Q KI HAM TO SATYA KI RAH PAR CHAL RAHE HAI AUR KISI KA DIL NAHI DUKHATE HAI PAR JARA SOCHIYE AAP JO VEDO KO APMANIT KAR RAHE HO USKA KHAMIYAJA KITNA BURA HOGA....

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जब आपके विचार जानने के लिए टिपण्णी बॉक्स रखा है, तो मैं कौन होता हूँ आपको रोकने और आपके लिखे को मिटाने वाला !!!!! ................ खूब जी भर कर पोस्टों से सहमती,असहमति टिपियायिये :)