बुधवार, 15 सितंबर 2010

"सत्य" --- एक खोज

प्रतुलजी ने मेरी पिछली पोस्ट पर मेरे माध्यम से पंडित डी.के. शर्मा "वत्स" जी का वात्सल्य पाने की उत्कंठा जाहिर की थी. यह भावना पंडितजी तक मेल से पहुंचा दी है. 
मैंने अपनी बुद्धि की सीमित गति तक इन प्रश्नों के उत्तर पाने की कोशिश की, फिर सोचा की इस विषय पर ब्लॉग जगत के मनीषियों के विचार भी मिल जाएँ तो. मेरा अच्छा ज्ञान-वर्धन हो जायेगा.


प्रतुलजी के सवालों के उत्तर मैं जितना खोज पाया वह आपके समक्ष रख रहा हूँ, और आपसे ज्यादा जानने की आशा रखता हूँ .........

सत्य तो हमेशा एक ही होता है. पर सत्य के बारे में प्रश्न यह है की, सत्य और असत्य में भेद करने का मापक साधन क्या है ?  सत्य के मापक की खोज स्वयं अनुभव में करनी चाहिए.
सत्य सर्वव्यापक है अपरिवर्तनीय है, पर अनुभव-गम्य है . अब मान लीजिये की मैं कहूँ की मेरे सिर में दर्द हो रहा है, अब यह मेरे लिए स्पष्ट अनुभव है और मैं इसे असत्य नहीं कह सकता, मुझे जो कष्ट अनुभव हो रहा है, वह इस सर-दर्द के कारण हो रहा है, इस दर्द की अनुभूति का मेरे पास दूसरा कोई मापक नहीं है. जिससे की मैं जांच सकूँ की मुझे दर्द हो रहा है या नहीं. इसलिए मेरा अनुभव मेरा सत्य है.
मैं कहता हूँ "टेबल पर ग्लास रखा है" इस वाक्य के यथार्थ होने का अर्थ क्या है? मैं ख्याल करता हूँ कि मुझसे अलग, बाहर, टेबल और ग्लास मौजूद हैं और उनमें एक विशेष संबंध है. यदि स्थिति वास्तव में ऐसी ही है तो मेरा वाक्य सत्य है; ऐसा न होने की हालत में असत्य है.
मुझ से अलग टेबल है टेबल पर ग्लास है, यह मैंने कैसे जाना ? मेरी आँख ने ऐसा देखा. पर आँख कभी कभी धोखा भी दे जाती है तो मैंने उसे छू कर देख लिया, यह मेरा दूसरा अनुभव है.
पर मेरे तो आँख भी है, हाथ भी है. देख छू कर निश्चय  कर लिया की टेबल पर ग्लास रखा है. पर जिसके आँख नहीं है, उसे कैसे निश्चय होगा ?? दूसरा कोई बताएगा, पर कैसे मान लें !  स्वयं को अनुभव तो हुआ ही नहीं, जिसने बताया है वह तो उसका अनुभव है, खुद छू कर देखेगा. अब अगर व्यक्ति जन्मांध नहीं है तो हाथ से छू कर अपने पूर्व अनुभव के आधार पर निश्चय कर लेगा की टेबल पर ग्लास रखा है. लेकिन अगर कोई जन्मांध है तो ? तब वह अपने अब तक के अनुभव के आधार पर जैसा की उसे निश्चय कराया गया है की टेबल और ग्लास इस प्रकार के होतें है के आधार पर निश्चय करेगा.
सत्य एक ही है की टेबल है और उस पर ग्लास रखा है, लेकिन सबके अपने अपने अनुभव और परिस्थिति के कारण अलग अलग तरह से देखना पढ़ रहा है
जिन वाक्यों को हम सत्य कहते हैं, वे दो प्रकार के होते हैं- वैज्ञानिक नियम संबंधी और तथ्य संबंधी. "दो और दो चार होते हैं," यह वाक्य हर कहीं और सदा सत्य हैं; देश और काल का भेद उनके सत्य होने से असंगत है. पर अमित शर्मा का जन्म २७ अगस्त १९८३ को हुआ, यह अमित शर्मा के जन्म से पहले कहा ही नहीं जा सकता था, पर अब सदा के लिए सत्य है.
इसलियें हमारे अनुभवों के आधार और परिस्थितियों के अनुसार सत्य अलग अलग भासता है.
सत्य व्यापक है और बुद्धि सीमित. इसलिए सत्य तो अपरिवर्तनीय ही रहता है लेकिन बुद्धि की क्षमताओं के अनुसार होने वालें अनुभवों के आधार पर सत्य के प्रति हमारे निश्चय परिवर्तित होते रहतें है की हमने पहलें जो निर्णय लिया या जो अनुभव किया वह सत्य था या अब सत्य  हैं.
सत्य -असत्य को सही-गलत के नामों से भी हम जानतें है. जो निर्णय आज सही या सत्य भासता है वही कल गलत भी भास सकता है. 
प्रतुलजी सूर्य पूर्व से निकलता है सत्य नहीं है. बल्कि हमने अपने अनुभव से इसे सामजिक, और प्राकृतिक सत्य के रूप में स्थापित किया है, जबकि सत्य तो यह है की सूर्य स्थिर है और खगोलीय व्यवस्था अनुरूप हमें पूर्व से निकलता दिखलाई पड़ता है, इसलिए सूर्य का पूर्व से निकलना हमारा अनुभव जन्य सत्य है. अब जब सूर्य का पूर्व से निकलना पूर्ण सत्य नहीं है अपितु तात्कालिक अनुभूति से अनुभूत सत्य है . उसी प्रकार ध्रुवीय प्रदेशों के बारें में भी समझना चाहियें.
सत्य तो एक ही रहा की सूर्य पूर्व दिशा से नहीं निकल रहा है, पर स्थान विशेष की परिस्थितियों के अनुभव ने उसे सत्य के रूप में स्थापित कर दिया.
सत्य व्यापक है और हमारी अनुभव क्षमताएं सीमित, इसलियें हमारें शास्त्रों ने  "न इति, न इति" का घोष करके यही समझने की कोशिश की है की जितना जान लिया है उसे ही अंतिम मान लेने की भूल नहीं करनी चाहियें और सदा सत्यान्वेषण में निरत रहना चाहियें.

क्योंकि जब सत्य को जान लिया जायेगा तो फिर कुछ जानना शेष ही ना रह जायेगा. और जानने के बाद प्रश्न भी नहीं उठेंगे. इस लिए जब तक ना जाना जाये तब तक हमें सत्य की ख़ोज में ही लग्न चाहिये ना की, जितना जान लिया उसे ही पूर्ण मान लिया जाये.वास्तविक और व्यापक सत्य ऊँची वस्तु है. वह भाषण का नहीं, वरन् पहचानने का विषय है. समस्त तत्वज्ञानी उसी महान तत्व की अपनी-अपनी दृष्टि के अनुसार व्याख्या कर रहे हैं. और आप-हम उनके अनुभव किये को अपने अनुभवों पर परखने की कोशिश कर रहें है.  ईश्वर, जीव, प्रकृति के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करके अपने को भ्रम-बन्धनों से बचाते हुए परम पद प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ना मनुष्य जीवन का ध्रुव सत्य है. उसी सत्य के प्राप्त करने के लिए हमारा निरन्तर उद्योग होना चाहिए.


अब अगर आप विद्वतजनो का प्रसाद भी इस विषय पर मिल जाये तो मेरा ज्ञान-वर्धन होगा जिसके लिए मैं आपका आभारी रहूँगा.

 

अमित-शर्मा,

39 टिप्‍पणियां:

  1. "दो और दो चार होते हैं," यह वाक्य हर कहीं और सदा सत्य हैं; देश और काल का भेद उनके सत्य होने से असंगत है. पर अमित शर्मा का जन्म २७ अगस्त १९८३ को हुआ, यह अमित शर्मा के जन्म से पहले कहा ही नहीं जा सकता था, पर अब सदा के लिए सत्य है.
    सत्य वाकई अनंत होता है ... ओशो का एक लेख पढ़ा था सत्य पर ..
    .
    बढ़िया लेख लिखा है ........

    मेरे ब्लॉग कि संभवतया अंतिम पोस्ट, अपनी राय जरुर दे :-
    http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_15.html
    कृपया विजेट पोल में अपनी राय अवश्य दे ...

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  2. प्रमाण की अपेक्षा से सत्य 'अनुभव प्रमाण' व 'प्रत्यक्ष प्रमाण' होता है।
    जिसका विवेचन आपने किया ही है।
    सत्य सापेक्ष भी होता है,अर्थात वह किस अपेक्षा से कहा गया है,जैसे एक नृतक ने आगे से पुरुष वस्त्र व पिछे से स्त्री वस्त्र धारण किये हो,जो एक दिशा से देखने वाले को पुरुष लगे वहीं विपरित दिशा से देखने वाले को स्त्री लगे,यह दिशा की अपेक्षा से है।
    उसे चार निक्षेप में विभाजित किया जा सकता है 1-नाम निक्षेप,2-भाव निक्षेप,3-दृव्य निक्षेप,4-स्थापना निक्षेप।
    उदाहरणार्थ:किसी का नाम कृष्ण है,वह केवल नाम से कृष्ण है वाकई श्री कृष्ण नहिं,फिर भी उसे कृष्ण कहना नाम निक्षेप की अपेक्षा सत्य है। किसी में गुण कृष्ण जैसे है,उसमे केवल भाव कृष्ण से है,पर वाकई वह श्री कृष्ण नहिं,फिर भी उसे कृष्ण कहना भाव निक्षेप की अपेक्षा से सत्य है। श्री कृष्ण को ही कृष्ण कहना दृव्य निक्षेप की अपेक्षा से सत्य है। श्री कृष्ण की प्रतिमा को श्री कृष्ण कहना स्थापना निक्षेप की अपेक्षा से सत्य है।
    और भी शास्त्रो में सत्य को समझने के लिये 7 नय का विवेचन है,जो बडा गहन विषय है। विस्तार भय से,एक व्यवहार नय के उदाहरण से प्रस्तूत करता हूं,"आटा पिसाने जा रहा हूं" जबकि मैं गेहूं पिसाने जा रहा होता हूं पर व्यवहार नय की अपेक्षा से यह कथन सत्य है।
    अनेकांत का समन्वय ही अन्तिम सत्य होता है।
    जैसे छ: अन्धे और हाथी का दृष्टांत।

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  3. बढ़िया आलेख. लेकिन मुझे लगता है कि सत्य सापेक्षिक अधिक होता है...

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  4. सत्य के बारे में जानने की प्रतुलजी की उत्कंठा से हम सब भी कुछ पा रहे हैं। आपका और प्रतुलजी का आपसी संवाद बहुत प्रेरक होता है, आप दोनों की मेधा अचंभित करती है।
    आभार स्वीकार करें।

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  5. सुज्ञ जी के विचार 'सत्य' के सन्दर्भ में काफी सुलझे हुए लगे लेकिन उन्होंने विस्तार भय से कलम वापस खींच ली, जिज्ञासा प्यासी ही रह गयी. कृपया सुज्ञ जी से कहें इस सन्दर्भ की सभी जानकारियाँ समेटकर या स्व-विवेक चिंतन से इस धर्म-सभा में अपना पूर्ण भाषण दें. मेरा अति विनम्र अनुरोध है कि सुज्ञ जी दोबारा वापस आयें.

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  6. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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  7. आभार प्रतुल जी
    सभी जानकारियां, ज्ञानियों की प्रसाद मात्र है,मेरा स्व-विवेक नहिं,मैं मात्र प्रस्तूतकर्ता हूं, जैसा मैने जाना समझा।
    अन्तिम सत्य तक पहूंचने के चार मापक साधनों की पूर्व टिप्पणी में चर्चा की गई।
    1-प्रमाण, 2-निक्षेप, 3-नय, 4-अनेकांत।
    अब यदि विद्वान विशेष चर्चा हेतू दिशा निर्देश करें तो चर्चा आगे बढे।

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  8. सत्य व्यापक है और हमारी अनुभव क्षमताएं सीमित, इसलियें हमारें शास्त्रों ने "न इति, न इति" का घोष करके यही समझने की कोशिश की है की जितना जान लिया है उसे ही अंतिम मान लेने की भूल नहीं करनी चाहियें और सदा सत्यान्वेषण में निरत रहना चाहियें.

    bahut sundar bhav

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  9. सूर्य का स्थिर होना भी,खगोलविदों का अनुभव ज्ञान ही है, स्थिरता का आंकलन उनकी गणितिय गणनाओं पर आधारित होता है। और गणित भी परोक्ष या अनुभव ज्ञान है। अतः यह अनुभव प्रमाण हुआ, प्रत्यक्ष प्रमाण नहिं। प्रत्यक्ष प्रमाण सूर्य पर जाकर उसकी स्थिरता का भान करना है। जो कि असम्भव है,अतः अन्तिम सत्य हमारे लिये शेष रह जाता है।

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  10. सब कुछ तो लिख चुके हो सो और क्या लिखा जाये और मैं तो विद्वान् भी नहीं हूँ फिर भी मेरी सामान्य बुद्धि के अनुसार, सत्य का अर्थ अपनी अपनी बुद्धि और भावना के हिसाब से ही निकला जाता रहा है और शायद भविष्य में भी यही रहेगा ! मेरे विचार में स्व अनुभव ही सत्य माना जाता रहेगा क्योंकि पुरातन काल की तरह अब कोई आश्रम व्यवस्था भी नहीं है और न वे शिष्य जो गुरु ज्ञान को सत्य मान कर चलें !

    सत्य, समय- स्थान- परिस्थितियों के हिसाब से परिवर्तनशील है और शायद रहेगा भी !

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  11. प्रिय अमित जी, आपने इतने सुन्दर एवं स्पष्ट रूप से इसका विवेचन कर दिया है कि हमारे लिए तो कहने को कुछ शेष रह ही नहीं गया है...हालाँकि कल इस "ज्ञानयज्ञ" में अपनी ओर से कुछ आहुति डालने के इरादे से आए भी थे...मन्त्रोच्चारण भी कर चुके थे, किन्तु जब अग्नि में आहुति डालने का समय हुआ तो हाथ खाली के खाली..न तो हाथ में समिधा रही और न ही कहीं यज्ञकुंड दिखाई पडा....सब कुछ शान्त,स्थिर कोई हलचल नहीं...सो, बडे दुखी ह्रदय से खाली हाथ लौट जाना पडा. और अपने श्रम को व्यर्थ जाता देखकर दोबारा आने का मन ही नहीं हुआ.
    लिखते लिखते अचानक से कम्पयूटर हैंग हो गया था :)
    बहरहाल पुन: मन बनाकर अब आना हो पाया....इस तत्वचर्चा को आगे बढाने की इच्छा जगी है तो प्रारम्भ में मैं अपनी ओर से कुछ विचार रखना चाहूँगा......
    पहली बात तो ये कि इस तथ्य को अस्वीकार करना तो किसी के लिए भी संभव नहीं है कि संसार में अगर मनुष्य से स्वतन्त्र कोई वास्तविकता है तो उस वास्तविकता से सम्बद्ध कोई सत्य भी अवश्य है. अब ये "सत्य" क्या है ?
    'सत्य' वह है जो उतरकालीन किसी ज्ञान के द्वारा बाधित न हो. मान लीजिए आप घनघोर अन्धारयुक्त रात में मार्ग में पडी रस्सी को देखकर सर्प का ज्ञान होता है. संयोगवश प्रकाश का आगमन हो जाए तो पुन: देखने पर ठीक रस्सी का ज्ञान होता है. यहाँ पूर्व का सर्प-ज्ञान अब रस्सी-ज्ञान के द्वारा बाधित हो रहा है. अत: रस्सी में सर्प-ज्ञान होने से मिथ्या है, परन्तु यदि मेंढकों की आवाज सुनकर हमें उन्हे खाने वाले सर्प का ज्ञान उत्पन हो और अकस्मात उसी समय बिजली चमकने से घास पर भागता हुआ साँप दिखाई पडे तो कहना पडेगा कि यह ज्ञान अबाधित होने से सत्य है. वेदान्त में सत्य को 'त्रिकालबाध्य' माना गया है. अर्थात जो सभी कालों में विद्यमान हो, किसी भी काल में जिसका बाध न हो एवं जो सर्वत्र अवस्थित हो---वह त्रिकालाबाधित सर्वानुगत सत्य है. जैसे 2+2= 4 ही होता है. किसी भी समय या किसी भी स्थान विशेष में 2+2 न तो 3 होता है और न ही 5. वैसे ही वह सर्वात्मा परमसत्य भी भूत, भविष्यत एवं वर्तमान तीनों काल में जगत के आदि, मध्य एवं अन्त में तथा सभी प्रदेशों में, समस्त पदार्थों में अखंड, एकरस अविकृ्त रूप से अवस्थित है. यदि उस 'परमसत्य' को कोई भी व्यक्ति छोडना चाहे या उससे पृ्थक होना चाहे, तो हो ही नहीं सकता, क्यों कि उसका सभी के साथ तादात्मय सम्बन्ध है....
    जारी.......

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  12. अब इस 'सत्य' की भी तीन प्रकार की सत्तायें(अस्तित्व) हैं-----1. प्रतिभासिक सत्य 2. व्यवहारिक सत्य और परमार्थिक सत्य
    प्रतिभासिक सत्य--वह सत्य जो कि प्रतीत काल में सत्य प्रतिभासित हो किन्तु बाद में बाधित हो जाए जैसे रस्सी में साँप. जब तक रस्सी-ज्ञान नहीं होता तब तक सर्प का ज्ञान बना ही रहता है. इसी प्रकार समस्त प्रतीतियों में उत्पन ज्ञान अपने उतरकालीन ज्ञान से समाप्त होकर यथार्थज्ञान के द्वार खोलता है. यही प्रतिभासिक सत्य है......
    2.व्यवहारिक सत्य वो सत्य है जो इस संसार के समस्त व्यवहारगोचर पदार्थों में रहता है. किसी भी पदार्थ में 5 धर्म दृ्ष्टिगोचर होते हैं-----अस्ति, भाति, प्रिय, रूप तथा नाम. इनमें प्रथम तीन ब्रह्म में हैं और अन्तिम दो जगत में. सांसारिक पदार्थों का कोई न कोई रूप और कोई न कोई नाम अवश्य है और ये व्यवाहर के लिए नितान्त आवश्यक भी है. परन्तु वास्तविक ज्ञान की उत्पति हो जाने पर यह अनुभव बाधित हो जाता है. जैसे दूध का दही रूप में रूपान्तरण.
    सृ्ष्टि के इन समस्त पदार्थों से नितान्त विलक्षण एक अन्य पदार्थ भी हैं जो शाश्वत होने से व्यवाहरिक सत्य से ऊपर होता है-------जिसे पारमार्थिक सत्य कहा जाता है. ये वो अन्तिम सत्य है, जो तीनों कालों में अबाधित होने से शाश्वत सत्य है. वह भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में एक रूप रहने वाला है. यह है---परमसत्य अर्थात एब्सोल्यूट ट्रुथ. इस परमसत्य को व्यक्ति-मानव की विभिन्नता से या पृ्थकत्व से नहीं उपलब्ध कराया जा सकता, इसे शब्दों से नहीं समझाया जा सकता, बल्कि व्यक्ति को---विभेद को उसकी निस्सीमता में विलीन करके ही उपलब्ध किया जा सकता है. अमूमन जिस सत्य की मानवी बुद्धि के पराश्रय से चर्चा की जाती है, वह केवल वास्तविक सत्य की अभिव्यक्तिमात्र होने से प्रतीतिमात्र है----एक प्रकार की भ्रान्ति है, माया है. मतलब ये है कि बुद्धि द्वारा प्राप्त सत्य सत्यवत प्रतिभास बेशक होता है, किन्तु वो सत्य होता नहीं. पूर्ण सत्य जो है वह मनुष्य के उपरोक्त वर्णित दोनों प्रकार के गृ्हीत सत्यों का मिलित रूप है.....
    वस्तुत: यह समझना कि इस जगत में अपने आप से भिन्न कोई सत्य है, भ्रान्ति है. अन्तिम एवं पूर्ण सत्य यही है कि "मैं" के रूप में अभिव्यक्त जो सत्ता है-------वही "परमसत्य" है....अर्थात "अहम ब्रह्मास्मि" "मैं" ही ब्रह्म हूँ, "मैं" ही परमसत्य हूँ---सत्यस्यसत्यं

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  13. पंडित जी,
    सत्य की तीन प्रकृति 1. प्रतिभासिक सत्य 2. व्यवहारिक सत्य और परमार्थिक सत्य, का सारगर्भित विवेचन।
    आभार

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  14. गजेंद्रजी, भारतीय नागरिक जी, मौसमजी, राणाजी, शिवम् मिश्राजी, विपुलजी, सक्सेनाजी आप सभी का आभार उत्साहवर्धन के लिए ..........

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  15. सुग्यजी, पंडितजी आप लोगों ने इस चर्चा को आगे बढाया इसके लिए आभारी हूँ की आपने समय निकाल कर ज्ञान वर्षण करने की कृपा करी. आप के आशीर्वाद से यह पोस्ट मेरे लिए सर्वाधिक संग्रहनीय हो गयी है .

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  16. @ वह सर्वात्मा परमसत्य भी भूत, भविष्यत एवं वर्तमान तीनों काल में जगत के आदि, मध्य एवं अन्त में तथा सभी प्रदेशों में, समस्त पदार्थों में अखंड, एकरस अविकृ्त रूप से अवस्थित है. यदि उस 'परमसत्य' को कोई भी व्यक्ति छोडना चाहे या उससे पृ्थक होना चाहे, तो हो ही नहीं सकता, क्यों कि उसका सभी के साथ तादात्मय सम्बन्ध है....


    पंडित जी सौ बातों की एक बात आपने इन पंक्तियों में कह दी........... अद्भुत !

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  17. आप की रचना 17 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
    http://charchamanch.blogspot.com


    आभार

    अनामिका

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  18. —अमित जी, मैंने पहले सुज्ञ और फिर गुरुवर वत्स जी को पढ़ा शंकाएँ एक तरफ से समाप्त होती है. उन्हें अपने शब्दों में बाँधती हैं और फिर नये प्रश्नों का रूप लेकर खडी हो जाती हैं, जबकि सभा उखड़ ही रही है तब भी जिज्ञासु मन पहले 'सत्य' को अव्याप्त दोष वाली परिभाषा में बाँध कर नये प्रश्नों को बुला रहा है.
    "जो वस्तुयें अस्तित्व में होने के साथ अनुभवजन्य भी हों, वे सभी सत्य हैं." "जिन वस्तुओं और भावों की कल्पना ऐन्द्रीय अनुभव की हो, वे सत्य हैं."
    यदि मैं प्रारम्भ में बिना विज्ञान वाली समझ से 'स्व-चालित सृष्टि की घटनाओं को देखकर यह कहूँ कि "मेरा अनुमान है कि ईश्वर है" फिर दोबारा प्रमाणों के साथ कहूँ — "सच में ईश्वर है." फिर तीसरी बार उन प्रमाणों के 'राम नाम सत्य होने पर' कहूँ कि 'ईश्वर नाम सत्य है." ................. क्या साधारण जन को सत्य का भान क्षति पर ही सहजता से हो पाता है? मुझे किसी ने असत्य सूचनायें दीं जिस कारण मेरा अहित हुआ और नुकसान हुआ. फिर मैंने सच्ची जानकारियों की कीमत जानी. क्या झूठ/असत्य/शरीर ही सत्य के मूल्य/सत्ता/परमात्मा की अनुभूति का कारण है?
    — जो प्रमाणों के नष्ट होने पर भी अपनी सत्ता बनाए है, वह आखिरकार इतनी दुरुहता से समझ में आना वाला क्यों है? हमें कौन-सी आँखों से उसके पहली बार में दर्शन हो सकते हैं? ज़रूरी नहीं वह जीव रूप में प्रदर्शित हो.
    — यदि वह अंशी है तो क्यों वह अपने अंशों को छितराए हुए है? यदि यह लोक उसकी लीला है तब क्या वह इच्छा भी रखता है? क्या उसे आनंद की अनुभूति होती है? क्या वह व्यस्त रहने के लिये ही सृष्टि आदि कि पूरे ब्रह्माण्ड में खेल रचाए है?
    — उसे स्वामी और दास वाला खेल रुचता है क्या? क्यों नहीं वह हमारी सोच में समानता के भाव भर देता? क्यों हम उसके सम्मुख नत रहते हैं?
    — यदि नत होना लघुता की अनुभूति कराता है तो अवश्य आशीर्वाद का भाव गुरुता की अनुभूति कराता होगा? ... यदि ऐसा है तो अवश्य उस राम को भी गुरुता की अनुभूति होती होगी?

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  19. क्या वह व्यस्त रहने के लिये ही सृष्टि आदि कि पूरे ब्रह्माण्ड में खेल रचाए है?
    ....... इसे इस तरह पढ़ें?
    क्या वह व्यस्त रहने के लिये ही सृष्टि आदि के [पूरे ब्रह्माण्ड में] खेल रचाए है?

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  22. वस्तुत: यह समझना कि इस जगत में अपने आप से भिन्न कोई सत्य है, भ्रान्ति है.
    अन्तिम एवं पूर्ण सत्य यही है कि "मैं" के रूप में अभिव्यक्त जो सत्ता है-------वही "परमसत्य" है....
    अर्थात "अहम ब्रह्मास्मि" "मैं" ही ब्रह्म हूँ, "मैं" ही परमसत्य हूँ---सत्यस्यसत्यं

    @ हाँ, इस वाक्य में मुझे अपने प्रश्न का उत्तर मिलने का आभास हो रहा है. लेकिन मुझे और विस्तार चाहिए. मैं पूरी तरह सुलझ नहीं पा रहा हूँ गुरु जी.
    मन के भीतर के प्रश्न इसे ओढ़कर ही संतुष्ट नहीं हो पा रहे.
    अमित जी, गुरु वत्स जी को मैं बाध्य तो नहीं कर रहा हूँ या फिर बेवजह की खींचतान तो नहीं मेरे प्रश्नों में, यदि है तो फटकार भी लगा सकते हैं. मैं अपने अहंकार को छोड़ने के प्रयास में हूँ.

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  23. विज्ञजनों,
    मुझे प्रतीत होता है कि
    1-सत्य क्या है,उसे कैसे जाना परखा जाय। और
    2-परमसत्य(ईश्वर की सत्ता)क्या है।
    दोनो अलग अलग गम्भीर विषय,एक दूसरे में गड्मड से हो रहे है।
    सत्य को जानने,समझने और परखने का गणित आ जाय तो दुर्लभ परमसत्य के निकट पहूंचा जा सकता है।

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  24. सुज्ञ जी के वक्तव्य पर ध्यान देकर मैं फिर से मनन करने बैठता हूँ.

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  25. प्रतुल जी,
    कहीं मुझसे अनधिकार चेष्टा तो नहिं हो गई?
    यदि कोई ऐसा संदेश आप तक पहूंचा हो तो हृदय से क्षमाप्रार्थी हूं।

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  26. अरे सुज्ञ जी, केवल आपका नाम लेकर मैं आपसे दूरियाँ घटाने की कोशिश किये लेता हूँ. आपने सत्य और परमसत्य को पृथक चिंतन करने की सोच दी है. उस सन्दर्भ में ही मैंने पिछली टिप्पणी की थी. उसे अन्यार्थ न लें. मैं रात्रि १२ बजे ही तसल्ली से चिंतन कर पाता हूँ. अभी ओफीस में कामचलाऊ पत्र-व्यवहार कर रहा हूँ.

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  27. .
    अमित जी,
    बहुत सुन्दर विषय की चर्चा की है। मेरा भी मन था अपने विचार रखने का। लेकिन स्त्री हूँ, वाचाल कही जाउंगी। इसलिए चुप रहूंगी।

    विद जनों की चर्चा बहुत ज्ञानवर्धक और रोचक है, इसे आगे बढाया जाए। बहुत कुछ सीखने को मिलगा यहाँ।
    .

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  28. अमित जी यह पोस्ट संग्रहणीय हो गयी है. शेष चर्चा के लिये दूसरी सभा में सम्मिलित होंगे. वैसे आपकी पोस्ट में सब कुछ ही स्पष्ट ही था, फिर भी वत्स जी ने हमारा आमंत्रण स्वीकारा और जटिल विषय को सुलझाने में सहायता की. सुज्ञ जी ने काफी वैचारिक गरमी बनाने में योगदान दिया. उनकी चिन्तनशीलता का कायल हो गया हूँ.

    उत्तर देंहटाएं
  29. @अमित भाई,
    अभी तक सारी चर्चाएँ नहीं पढी हैं , पर ये बात तो है की पोस्ट संग्रह करने वाली है

    विषयांतर : अभी हमने भी एक सच को रेफरेंस सहित उजागर करने की कोशिश की है अपने ब्लॉग पर ... देखिएगा जरूर

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  30. हां एक बात और
    पुरुष हूँ .. इसका मतलब कुछ भी बोलूं वाचाल तो नहीं कहा जा सकता [ऐसा विज्ञानिक रूप से सिद्द हो चुका लगता है ]
    इस चर्चा में शामिल न हो पाने के पीछे कारण संभवतया मेरे "ज्ञान की कमी" लग रही है [ये भी सत्य है , स्वीकार लेना चाहिए, पुरुष हूँ इसलिए स्वीकार कर रहा हूँ ]

    [गैर जरूरी लगे तो कृपया कमेन्ट हटा दीजियेगा ]

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  31. @ मातोश्री स्वरुपजी पधारने का धन्यवाद्

    @ दिव्याजी आप भी अब "किसी के कहे" जाने को महत्त्व देने लगे :)

    @ प्रतुल जी आभार आपका की आपके कारण बहुत-कुछ सीखने को मिला

    @ दोस्त गौरव कोई एक ऐसा व्यक्तित्व बता दीजिये जो पूर्ण-ज्ञानी हो, उसके बाद किसी चर्चा का हिस्सा बनने से खुद को रोकना.......... बाकि आप बार-बार यह धमकी क्यों देते हो की मेरी कमेन्ट डिलीट कर देना :)

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  32. अमित जी,
    सत्य की खोज जारी रखें, इस पोस्ट से सार संग्रह करते हुए,अगली पोस्ट की विषयवस्तु बनाएं। चर्चा से हमारा ज्ञानार्जन होता है।
    आभार।

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  33. सत्‍य मात्र सत्‍य होता है,

    सत्‍य ईश्‍वर का रूप होता है तो सत्‍य दानवी प्रवृत्ति भी होता है ।

    बस समय, स्‍थान और व्‍यक्ति का भेद होता है ।


    हम सत्‍य का प्रयोग कहाँ कर रहे हैं, यह सबसे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है ।

    कहीं हमारे सत्‍य बोलने से यदि किसी की जान आफत में पड जाए तो वह सत्‍य होते हुए भी ईश्‍वरीयगुणों से युक्‍त नहीं अपितु दानवी प्रवित्ति का ही परिचायक होता है ।


    ज्ञानवर्धक और मनोरंजक चर्चा हेतु धन्‍यवाद

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  34. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  35. प्रिय अमित जी, आपका ब्लाग देखा| आपका आलेख विचारोत्तेजक एवं विचार-श्रृंखला को उत्प्रेरित करने वाला है| सत्य के काव्यात्मक संधान में लिखी गई अपनी एक पुरानी कविता की कुछ पंक्तियाँ भेंट कर रहा हूँ -

    'सत्य के इस पार कुहरा,
    स्वप्न के उस पार बादल|
    सत्य का स्वर,कठिन-कर्कश,
    स्वप्न की धुन, मधुर-मादल||

    स्वप्न सच,या सत्य सपना,
    यह पहेली कौन बूझे?
    स्वप्न का है रूप कैसा,
    सत्य का आकार क्या है??'

    - अरुण मिश्र

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जब आपके विचार जानने के लिए टिपण्णी बॉक्स रखा है, तो मैं कौन होता हूँ आपको रोकने और आपके लिखे को मिटाने वाला !!!!! ................ खूब जी भर कर पोस्टों से सहमती,असहमति टिपियायिये :)