शुक्रवार, 18 जून 2010

क्या वास्तव में स्त्री समाज को कभी भी पुरुष समाज से सच्चा प्यार और सम्मान नहीं मिला ????

मैं यहाँ स्त्री बुरी या पुरुष भला का राग अलापने नहीं बैठा हूँ. सिर्फ पिछले दिनों में कुछ नारी अधिकारवादियों के लेख ज्यादा पढ़ लिए, जिन पर हर जगह पुरुष समाज को शोषक वोह भी क्रूरतम शोषक बताया जा रहा है,
हमारे ब्लॉग समाज में भी कई जगह  महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा देने के सम्बन्ध में एक बहस चल रही है. पर इस आन्दोलन के थोथेपन  से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है. आम परम्परावादी समाज में ऐसी कोई भी चर्चा अपना अस्तित्व नहीं बना पाई है. क्यों क्योंकि समाज का शुद्ध स्वरुप परम्परावादी समाज में ही मिलेगा जहाँ स्त्री पुरुष को एक दूसरे का पूरक माना जाता है, प्रतिद्वंदी नहीं. और यह बात बार बार नहीं दुहराई जाती, सहज भाव से जीवन प्रवाह गतिमान रहता है.
नारी अधिकारों और समानता का हल्ला मचाने वाले हमेशा पुरुष को एक खतरनाक किस्म के क्रूर जानवर की भांति प्रस्तुत करने में लगे हुए है, और नारी को सदियों की महाबेचारी जो हर समय हर जगह हर एक पुरुष द्वारा प्रताड़ित की जा रही है. 
क्या वास्तव में यह शत-प्रतिशत सही है ? क्या वास्तव में हमें निरंतर ऐसी परिस्थितियां दिखलाई देती रहती है.?
बात सीधी सीधी मानवीय दुर्गुणों की है जिन्हें हमेशा स्त्री-पुरुष संघर्ष का नाम देकर सारे पुरुष समाज को शोषक घोषित किया जा रहा है. अगर कही भी शोषक -शोषित की बात आती है तो मानवीय दुर्गुणों के कारण ही आती है. क्या कोई पुरुष सिर्फ और सिर्फ नारी का ही शोषण करता है ?
क्या कोई भी पुरुष कभी भी अपनी पत्नी, मान, बहन, या दूसरी किसी भी के प्रति हमेशा ही झूंठा प्रेम या सन्मान दिखाता है.  क्या कोई भी नर हर मादा को दबा कर रखने की भावना रखता है ?

क्या स्त्री में मानवीय दुर्गुण नहीं पाए जाते ? क्या महिलाये अत्याचारी नहीं होती ? क्या महिलाये अपने दब्बू पति पर थानेदारी नहीं दिखाती ? दहेज़ कानूनों कि आड़ में पति शोषण कौन करता है. आपसी सहमती से बनाये गए संबंधों को बलात्कार का नाम कैसे दे दिया जाता है . आप कहेंगे की घरवालों के दबाव में जो की पुरुष प्रधान है. तो मैं पूछना चाहता हूँ की क्या पुरुष की बराबरी करने के लिए अनीति जायज है ?????

अपने को आजाद घोषित करने के लिए नैतिक वर्जनाये किसके द्वारा धुल-धूसरित की जारही है ?????  
कितने प्रतिशत लोग स्त्री शिक्षा के विरोधी है ???? कितने प्रतिशत लोग स्त्रियों के कामकाजी होने के विरोधी है. और कामकाजी होने की बात भी एकल परिवारों की ही आवश्यकता है. संयुक्त परिवारों में ना इसकी ज्यादा आवश्यकता पढ़ी है, और जब जरुरत नहीं महसूस हुई है तो उन परिवारों की महिलाओं ने भी इसे दासता का नाम  नहीं दिया है. और जिन परिवारों में जरुरत है उनमें ऐसी कोई बंदिशें भी ज्यादा दिखाई नहीं आती है. जितना की हल्ला मचाया जाता है. सब सहज रूप से चलता है, अगर असहजता है तो उसमें घर की महिलाएं भी शामिल होती है, फिर अकेले पुरुष की ही क्यों मिट्टी-पलीद की जाती है. अदालतें खुद कई बार यह मान चुकी हैं कि कई बार महिलाएं बदला लेने के मकसद से झूठे केस दर्ज करवा देती हैं और महिला के अधिकारों की रक्षा के लिए बने कानून बेगुनाह पुरुष के उत्पीड़न के हथियार बन जाते हैं।

 ज्यादा ना लिखकर आप सभी से विशेषकर स्त्री समाज से पूछना चाहुंगा की क्या वास्तव में स्त्री समाज को कभी भी पुरुष समाज से सच्चा प्यार और सम्मान नहीं मिला ???? 




 

63 टिप्‍पणियां:

  1. ज्यादा ना लिखकर आप सभी से विशेषकर स्त्री समाज से पूछना चाहुंगा की क्या वास्तव में स्त्री समाज को कभी भी पुरुष समाज से सच्चा प्यार और सम्मान नहीं मिला ????

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  2. अमित जी बहुत ही संवेदनशील मामले में आपने लेख लिखा है और बहुत खूब लिखा है. वैसे मैं जानता हूँ की इस बहस का कोई अंत नहीं होगा पर मेरा मत आपके साथ है. dekhen dusaron ki kya rai hai?

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  3. समाज का शुद्ध स्वरुप परम्परावादी समाज में ही मिलेगा जहाँ स्त्री पुरुष को एक दूसरे का पूरक माना जाता है, प्रतिद्वंदी नहीं. और यह बात बार बार नहीं दुहराई जाती, सहज भाव से जीवन प्रवाह गतिमान रहता है.

    Agri with you

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  4. मेरा मत आपके साथ है.

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  5. Aapki bahut khichayi hone wali hai shayad is post par. mahilavirodhi dakiyanusi stri swatantrata virodi or bhi na jane or kitni upadhiyan aap ko milegi aaj ..... AGRIM BADHAIYAN SWIKAR KAREN :-)))

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  6. स्त्री के बिना हमारा अस्तित्व ही क्या है , क्या कोई अपने घर में खड़े होकर यह सवाल कर पायेगा तो फिर इस प्रश्न का औचित्य क्या है ? माँ , बहन , पत्नी और पुत्री के बिना हम क्या हैं ? ????

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  7. बात स्त्री शोषण का राग अलापने वाली स्त्रियों से विशेषकर मुखातिब है क्यों की वे इस प्रकार का राग अलापती दिखाई देते है,
    और शायद आम समाज में इस तरह के तराने गए भी नहीं जाने लगे है, तो घर में पूछने की जरुरत अभी आन नहीं पड़ी है. प्रश्न का औचित्य महिला असमानता का हौव्वा खड़ा करने वाले झंडाबरदार सिद्ध कर पायेंगे

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  8. @ माँ , बहन , पत्नी और पुत्री के बिना हम क्या हैं ? ????
    यही बात तो मैं पुरुष विरोधी मानसिकता रखने वालों से भी पूछना चाहता हूँ की पिता,पति,भाई और पुत्र के बिना नारी क्या है इसका समाधान सिर्फ परम्परावादी समाज में ही मिलेगा जहाँ स्त्री पुरुष को एक दूसरे का पूरक माना जाता है, प्रतिद्वंदी नहीं. और यह बात बार बार नहीं दुहराई जाती, सहज भाव से जीवन प्रवाह गतिमान रहता है. स्त्री पुरुष असमानता का बेसुरा राग तो तथाकथित स्वतंत्रता के पैरोंकारों के द्वारा खड़ा किया गया हौव्वा है. जो कुछ अतिवादी मानसिकता से प्रेरित ज्यादा है, और तथ्याधारित कम .

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  9. Amit ji,

    Mujhe to humesha pyaar mila hai.

    mere vichaar iss sandarbh mein jaanne ke liye :-

    http://zealzen.blogspot.com/2010/06/nari-aur-purush-mere-mann-ke-udgaar.html

    Dhanyawaad

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  10. अमित जी ,कुछ महिलाओं ने दुर्भाग्यवश अपनी निजी जन्दगी के दुखद तजुर्बों को पूरे ब्लॉग जगत पर लाद दिया है !

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  11. नहीं साहब प्यार कहाँ मिलता है......बचपन में पिता के अधीन, युवा होने पर पति के अधीन और बुढ़ापे में बेटे के अधीन.............
    अब इस सन्दर्भ में सोचिये की बचपन में खाना-पिलाना-पढ़ना-घुमाना-अच्छा, बुरा सिखाना-जिंदगी के बारे में समझाना कौन करता है? किसी भी लड़की का पिटा नहीं बल्कि कोई अदृश्य ताकत....पिता तो पुरुष है बस पिटाई ही लगाएगा.
    आपने बहुत ही अच्छा लिखा है पर इसे बांचने महिलायें कम ही आयेंगी. कल आप लिख दीजिये पुरुषों के खिलाफ फिर देखिये कैसे आपके ब्लॉग पर भीड़ टूटती है महिलाओं की.
    ब्लॉग जगत इन्हीं विपदाओं से भर उठा है...... क्या करियेगा?
    प्यार मिलता है पर उसे देखने के लिए बेटी की, बहिन की, पत्नी की निगाह चाहिए न कि किसी औरत की...............
    शेष तो............
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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  12. आप लिख दीजिये पुरुषों के खिलाफ फिर देखिये कैसे आपके ब्लॉग पर भीड़ टूटती है महिलाओं की.

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  13. अमित, इसमें भी कोई शक नहीं कि मौका मिलने पर स्त्रियों का शोषण किया गया है. यह वास्तव में एक तरह की प्रकृति और प्रवृति है कि हर एक अपने से कमजोर का शोषण करता आया है और करता रहेगा और यह बात हरएक समाज के लिये सत्य है..

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  14. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  15. जी बिल्कुल, हमारे देश में तो स्त्री-पुरुष हमेशा से बराबरी पर रहे हैं, बल्कि नारी तो हमारे समाज में पूज्य है, कौन कहता है कि नारी-शोषण होता है...
    @-दहेज़ कानूनों की आड़ में पति शोषण कौन करता है.?
    --पता नहीं हमारे देश में ये दहेज-विरोधी कानून क्यों बनाया गया? क्योंकि दहेज हत्या तो हमारे यहाँ होती नहीं उल्टे औरतें इस कानून से पुरुषों पर अत्याचार करती हैं.
    @-आपसी सहमती से बनाये गए संबंधों को बलात्कार का नाम कैसे दे दिया जाता है ? पता नहीं कैसे दे दिया जाता है ...छः महीने से लेकर छः साल तक की बच्चियाँ आपसी सहमति से सम्बन्ध तो बना ही सकती हैं... पता नहीं लोग उसे बलात्कार क्यों कहते हैं.
    @-कितने प्रतिशत लोग स्त्री-शिक्षा के विरोधी है ???? जी बिल्कुल नहीं. हमारे देश में तो स्त्री-पुरुष बराबर पढ़े-लिखे हैं. ये तो सरकारी षड्‌यन्त्र है, जो औरतों की साक्षरता कम बतायी जाती है.
    @-ज्यादा ना लिखकर आप सभी से विशेषकर स्त्री-समाज से पूछना चाहुंगा की क्या वास्तव में स्त्री-समाज को कभी भी पुरुष समाज से सच्चा प्यार और सम्मान नहीं मिला ???? जी मिला है. बिल्कुल मिलता है. पता नहीं क्यों हमारे यहाँ औरतों की संख्या पुरुषों से कम है... ये भ्रूण-हत्या का हो-हल्ला क्यों मचाते हैं लोग?
    @-औरतों को भरपूर सम्मान मिलता है भारत में फिर पता नहीं सरकार नारी-सशक्तीकरण के पीछे क्यों पड़ी रहती है... और तो और न जाने सारे विश्वविद्यालयों में वूमेन स्टडीज़ का विभाग क्यों बना दिया गया है, जहाँ हम जैसे फ़्रस्टेटेड लोग रिसर्च में अपना सिर फोड़ रहे हैं.
    मैं आपसे सौ प्रतिशत सहमत हूँ ... हमारे देश जैसी उच्च स्थिति तो औरतों की कहीं नहीं है पूरे विश्व में...

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  16. अमित जी की बात से पूर्णतया सहमत हूँ
    मेरा मानना है ...............
    सुबह शाम मातमी धुनों वाले दैनिक धारावाहिकों में नारी पर अतिश्योक्तिपूर्ण अत्याचार
    जो दिखाया जाता है उससे भी नारी के भोले निस्वार्थ मन और उसके अवचेतन मस्तिष्क में एक बात बैठ जाती होगी
    "हमें अपने अस्तित्व को बचाना है" ( पता नहीं किससे ???)
    अगर उन धारावाहिकों को भी ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि नारी को सबसे ज्यादा परेशान तो नारी ही करती है
    पुरुष तो साधन मात्र होता है

    इतिहास भी हमेशा से रहा है साक्षी...
    नारी कि प्रथम शत्रु अगर कोई है तो....
    अधिकतर मामलों में वो नारी ही है....
    या बाकी बची कोई बात तो वो बस......
    आधुनिकता कि मानसिक बीमारी ही है....


    और कुछ पढने कि इच्छा हो तो यहाँ पढ़ लें

    http://my2010ideas.blogspot.com/2010/05/blog-post.html

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  17. @ मुक्ति जी, जवाब ये भी हो सकते है (वैसे लेख पढने के बाद उठे प्रश्नों के जवाब तो लेखक महोदय ही दे सकते हैं )

    @-दहेज़ कानूनों की आड़ में पति शोषण कौन करता है.?
    मुक्ति जी आप तो अखबारी कतरनों की ही बात करने कि कोशिश कर रहीं है शायद... मुझे लगता है सच्चाई जानने कि कोशिश तो व्यक्तिगत स्तर पर करनी होगी आंकड़े बदल हुए मिलेंगे

    @-आपसी सहमती से बनाये गए .......
    इसमें भी स्त्री पुरुष दोनों पीड़ितों के आंकड़े होंगे केवल स्त्री के नहीं ( ये जान कर आश्चर्य हो रहा है कि ऐसे बुरे लोगों को आप मानव भी मानती है, पुरुष और स्त्री में विभाजन तो दूसरी बात है )

    @-कितने प्रतिशत लोग स्त्री-शिक्षा के विरोधी है ????
    सही है ......जब कभी मेरिट लिस्ट में लड़कों से ज्यादा लड़कियों का नाम आता है ( जो कि आजकल अक्सर हो ही रहा है और बहुत अच्छी बात है ), तब आप अख़बार नहीं पढ़ती होंगी


    @-ज्यादा ना लिखकर आप सभी से विशेषकर स्त्री-समाज से पूछना.....
    भूर्ण ह्त्या मामलों में अगर सास ये कहती हो कि उसे "वंश का नाम आगे बढ़ाना है" तो स्त्री का दुश्मन पुरुष कैसे हुआ ??


    @-औरतों को भरपूर सम्मान मिलता है भारत में फिर पता नहीं सरकार .......
    उन्हें तो बस उन्ही वर्गों को ढूंढना होता है जो अपने आप को पीड़ित मानते है ( चाहे हो वो या नहीं )

    मुझे ऐसा लगता है कि हमारे देश उन देशों में टॉप कर रहा है जहां पर स्त्रियाँ तेजी से बेवजह हीनभावना कि शिकार होकर अपनी संस्कृति का त्याग कर रही है

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  18. @ मुक्ति जी किसने कहा दहेज प्रताडन नहीं होता लेकिन उसमें क्या पुरुष ही शामिल होते है. घर की स्त्रियाँ नहीं ????

    @ बलात्कार क्रूरतम करतूत है जो वहशी मानसिकता के लोग अंजाम देते है, कई वहशी इसमें मासूम लड़कियों और मासूम लड़कों में भेद नहीं करते.
    मूल बात यही निवेदित करने की कोशिश की है की मानवीय दुर्गुणों को पूरे पुरुष समाज पे क्यों कर थोपा जाता है.

    @ स्त्री-पुरुष अनुपात के लिए कई कारण जिम्मेदार है. जिनमे से भ्रूणहत्या जैसा क्रूरतम अपराध भी शामिल है. लेकिन क्या इस नीच-कर्म में सिर्फ पुरुष ही भागीदार रहते है. लेकिन स्त्री-पुरुष लैंगिक असमानता का सिर्फ यही तो एक कारण नहीं है,कई जैविकीय कारण भी तो है .
    आप इस लिंक पर देखिये http://www.myheritage.com/stats-78766902-0-0/gais-ka-swami-web-site/Overview मेरे परिवार की 22 पीढ़ियों का संकलन है, जिसमें ज्ञात कुल 211 व्यक्तियों में 122 पुरुष है और 89 महिलाएं मतलब कुल अनुपात 58% / 42% . अब आपके हिसाब से क्या मेरे परिवार में भी कन्या हत्या की सुदीर्घ परंपरा रही है. जबकि मेरे सामने ही मेरे दादाजी की 6 संतानों में 5 पुरुष और 1 कन्या संतान है. 5 पुरुष संतानों के 2-2 के हिसाब से 10 संतानों में 7 पुरुष और 3 कन्या संतान है. और इन 7 में अभी हम दो भाइयों की 2 पुरुष संतान है. बताइए क्या कारण है.

    @ मैंने कहा ना की आम समाज में परस्पर प्यार सम्मान तकरार सब सहज भाव से विद्यमान है, लेकिन कुछ फ़्रस्टेटेड लोगों द्वारा खड़ा किया जाने वाला पुरुष क्रूरता का हौव्वा सिमित है. और अगर अत्याचार है तो दोनों तरफ से है, एक ही को दोष क्यों ????

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  19. @ दिव्याजी प्रतुल जी के ब्लॉग पर हुए अद्रश्य संवाद के बाद से ही आपके विचारों और विद्वता के आगे नतमस्तक हूँ. आपका आभारी हूँ की आपने यथार्थ को व्यक्त किया नहीं तो कितने ही ऐसे भी है जो, जबरन ही यथार्थ को महसूस नहीं करना चाहते है

    @ अरविन्द जी इनके तजुर्बे का बोझ ही तो अब झुन्झुलाहट पैदा कर रहा है.
    @ "प्यार मिलता है पर उसे देखने के लिए बेटी की, बहिन की, पत्नी की निगाह चाहिए न कि किसी औरत की"
    सेंगर साहब बिलकुल सही कहा आपने.
    @ नागरिक जी बात प्रवृत्तियों की है जो सब जगह समान रूप से मौजूद है, लेकिन सभी को एक लपेट में तो नहीं समेत लेना चाहिये ना!!!!!!!!!
    @ विचारी जी इस संवेदनशील मुद्दे का हौव्वा बनाकर ही तो पुरुषों की संम्वेदनाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है.
    @ सलीमजी, नरेशजी, विपुलजी, गौरवजी आपके सहयोग के लिए धन्यवाद्

    बेनामियों से निवेदन है की अपनी भाषा के स्तर को बनाये रखिये. एक बेनामि ने महिलाओं और एक बेनामि ने अरविन्द जी पे अशोभनीय शब्दों का इस्तेमाल किया है. क्या समझा जाये मामला 50 - 50 का है :-))

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  20. @ अमित जी, मेरा पालन-पोषण भी बहुत लाड़-प्यार से हुआ है. कम से कम घर में तो मुझे कभी भी मेरे भाई से कम नहीं समझा गया. पर इसका ये मतलब नहीं कि समाज में लैंगिक भेदभाव नहीं है... मेरे साथ कभी कुछ अघटित नहीं हुआ इसका ये मतलब नहीं कि औरतों के साथ बलात्कार नहीं होते या छेडछाड नहीं होती... मेरे मंगेतर मुझे सिर आँखों पर बिठाते हैं , इसका ये मतलब नहीं कि घरेलू हिंसा नहीं होती.
    @ गौरव जी, मैं एक रिसर्चर हूँ तो इसका ये मतलब नहीं कि मैं सिर्फ अखबारी कतरनों के आधार पर बात करती हूँ...मैं अपनी आपबीती, दूसरों के अनुभव और सर्वे के आधार पर बात करती हूँ. मेरिट लिस्ट में लडकियां टॉप करती हैं क्योंकि वे ज्यादा मेहनत करती हैं... कम समय मिलने पर भी... पर वास्तविकता यह है कि अब भी ज्यादातर लड़कियों को अपनी पढाई बीच में छोड़ देनी पड़ती है...विशेषकर गाँवों में... स्थिति बदली है लेकिन बहुत ज्यादा नहीं... औरतों की स्थिति दोयम दर्जे की है ये एक सच है, कोई एक-दो लोगों द्वारा फैलाया गया भ्रम नहीं.
    मैं ये नहीं कहती कि सभी औरतें प्रताडित हैं...दुखी हैं... पर इसका ये मतलब भी नहीं कि सभी खुश हैं... अगर कुछ लोग सच के एक सिरे पर खड़े होकर ये कहते हैं कि समाज का एक वर्ग पूरी तरह दबाया-कुचला है, तो आप सच के दूसरे सिरे पर खड़े हैं और औरतों के साथ होने वाले भेदभाव को अनदेखा कर रहे हैं... जबकि सच कहीं बीच में है...ज़रूरत अति से बचकर असलियत देखने की है... और मैं असलियत से भागना नहीं चाहती ... वर्ना अच्छी-अच्छी बातें करके कौन अच्छा नहीं बनना चाहता?

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  21. @ ज़रूरत अति से बचकर असलियत देखने की है... और मैं असलियत से भागना नहीं चाहती ..

    माननीया मैंने भी सिर्फ यही कहने की कोशिश की है, बात असलियत को देखने की ही है. दूरदराज गाँव में जहाँ अशिक्षित महिला है वही भोंदू सा पुरुष भी है. लेकिन स्त्री-पुरुष संख्या पर मेरा प्रश्न अभी अनुत्तरित है, आपसे समाधान की उम्मीद है.........

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  22. waah arvind mishra kaa kament nahin delte kiya aur mera kar diya yae hii purush vaadi maansiktaa

    aakthu arivnd mishra aur tum dono par jo mhila blogger ki nij ki ziandgi par aaaye kament ko chhaptey ho

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  23. pataa nahin arvind mishra kitnii mahilaa blogger ki nij ki zindgi ko jaantey haen aaku thu haen aese kament par aur tum par bhi

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  24. बेनामी जी निजी का तात्पर्य अन्तरंग जीवन से नहीं, निजी का तात्पर्य व्यक्ति के संपूर्ण अस्तित्व से है, और अरविन्दजी का मंतव्य किसी अस्तित्व के निजी अनुभवों से है जो की स्वाभाविक शब्द है.और आप उसे कहाँ ले जा रहे है. यह मेरा घर है,, या यह मेरा निजी घर है. इसमें कुछ फर्क है तो बतलाइए.
    एक तो शब्दों को तोडा-मरोड़ा बहुत जाता है यहाँ......

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  25. himmat haen to dono kament rehnae do log khud hi samjh lagaee

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  26. Yar apne to dil ki bat kah di, main kudh bade dino se is bishya par likna chahta tha.

    Aurat hi Aurat jati ki dusman hai

    Nari ke bina purush nahi aur Purush ke bina Nari nahi.

    Itni azadi purusho ne hi to di hai

    Aur kya azadi chaihiye..... Kya khule aam cigrate ya sharab peene ki ya Kam se kam kapde main ghumane ki azadi.

    ya Late night ghar aane ki azadi.

    Ya bina shadi ke kisi ke sath ghar basane ki azadi aur kya chahiye bhai

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  27. भवतां आभार: एतस्‍य वैचारिकलेखस्‍य कृते । बहु किमपि न वदामि किन्‍तु एतत तु सत्‍यमेव यत प्रायश: स्‍त्रय: मिथ्‍याकार्येषु पुरूषानाम् आरोपकार्यं कुर्वन्ति । किन्‍तु सर्वथा एवमपि नास्ति एव ।


    धन्‍यवादार्ह: लेख:

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  28. प्रिय दोस्त,
    जंहा तक मेरी समझ है समाज के किसी भी मुद्दे पर इस प्रकार की बहस और दलीले तभी दी जाती हैं जब हमारे पास पर्याप्त आंकड़ों हों. मैं यहाँ पर बहस को इस लिहाज़ से लेना चाहता हूँ कि स्त्री का पुरुष पर और पुरुष का पर स्त्री का बराबरी का हक़ हो.

    मैं महिलाओं के कानूनी अधिकार में काम करने वाली संस्था में काम करता हूँ और मैंने वहां वास्तविकता में देखा है कि अभी भी समाज में लैंगिक भेदभाव मौजूद है! परिवार में यदि किसी भी तरह की कोई लड़ाई होती है तो इसमें महिला का ही दोष निकला जाता है. सरकार और समाज के विचारक ऐसे ही नहीं राग अलापते हैं कि महिलाओं के साथ हिंसा होती है. आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि घरेलू हिंसा कानून जो अभी अभी २००५ में हमारे देश में बना पर कितनी हाय हल्ला मची थी

    मुक्ति जी की की बात से मैं सौ प्रतिशत विश्वास रखता हूँ कि.. ''औरतों की स्थिति दोयम दर्जे की है ये एक सच है, कोई एक-दो लोगों द्वारा फैलाया गया भ्रम नहीं.
    मैं ये नहीं कहती कि सभी औरतें प्रताडित हैं...दुखी हैं... पर इसका ये मतलब भी नहीं कि सभी खुश हैं... अगर कुछ लोग सच के एक सिरे पर खड़े होकर ये कहते हैं कि समाज का एक वर्ग पूरी तरह दबाया-कुचला है, तो आप सच के दूसरे सिरे पर खड़े हैं और औरतों के साथ होने वाले भेदभाव को अनदेखा कर रहे हैं...''

    इसलिए मैं समझता हूँ कि इस मुद्दे पर अभी आपको और भी रिसर्च करने की जरूरत है. इसके लिए यदि आपको मेरी जरूरत हो तो बेझिझक लिखिए

    आपका शुभेक्शु
    शिशुपाल प्रजापति
    Email: iamshishu@gmail.com
    Blog: iamshishu.blogspot.com

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  29. शिशुपाल प्रजापति

    thanks for your feed back

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  30. @प्रजापति जी औरतों पर होने वाले अत्याचारों को बिलकुल नाकारा नहीं जा रहा है. पर इस बलबूते पर पूरे पुरुष वर्ग को दोषी ठहराना या नारी समाज द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों को दबाने की कोशिश कहाँ तक उचित है. जन्संख्याकिक असमानता में भी कन्या भ्रूण हत्या एक तत्व है लेकिन इसे प्रमुखता देते हुए पुरुष को ही जिम्मेदार बताया जाता है.
    लेकिन इस प्राकर्तिक कारण की भी लगे हाथ विवेचना कर दीजिये और अपने अध्यन में शामिल कीजिये इन आंकड़ों को भी----------
    @ स्त्री-पुरुष अनुपात के लिए कई कारण जिम्मेदार है. जिनमे से भ्रूणहत्या जैसा क्रूरतम अपराध भी शामिल है. लेकिन क्या इस नीच-कर्म में सिर्फ पुरुष ही भागीदार रहते है. लेकिन स्त्री-पुरुष लैंगिक असमानता का सिर्फ यही तो एक कारण नहीं है,कई जैविकीय कारण भी तो है .
    आप इस लिंक पर देखिये http://www.myheritage.com/stats-78766902-0-0/gais-ka-swami-web-site/Overview मेरे परिवार की 22 पीढ़ियों का संकलन है, जिसमें ज्ञात कुल 211 व्यक्तियों में 122 पुरुष है और 89 महिलाएं मतलब कुल अनुपात 58% / 42% . अब आपके हिसाब से क्या मेरे परिवार में भी कन्या हत्या की सुदीर्घ परंपरा रही है. जबकि मेरे सामने ही मेरे दादाजी की 6 संतानों में 5 पुरुष और 1 कन्या संतान है. 5 पुरुष संतानों के 2-2 के हिसाब से 10 संतानों में 7 पुरुष और 3 कन्या संतान है. और इन 7 में अभी हम दो भाइयों की 2 पुरुष संतान है. बताइए क्या कारण है.

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  31. नारी समाज द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों को दबाने की कोशिश कहाँ तक उचित है.

    where is this being done ????

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  32. @ अमित जी, आँकड़े पूरी तरह सच नहीं होते, लेकिन पूरी तरह झूठ भी नहीं होते. उत्तर भारत के कुछ राज्यों में भ्रूण-हत्या सबसे अधिक होती है और वहीं स्त्री-पुरुष अनुपात भी सबसे कम है... क्या यह सत्य नहीं है? आप अपने घर का उदाहरण दे रहे हैं...ऐसे न जाने कितने घर होंगे, जहाँ या पुरुष अधिक हैं या स्त्रियाँ ... मैं ये तो नहीं कह रही कि जहाँ औरतों की संख्या कम है, वह भ्रूण-हत्या के कारण है, पर क्या इससे ये सच्चाई झुठलाई जा सकती है कि हमारे देश में भ्रूण-हत्या एक कड़वा सच है.

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  33. @himmat haen to dono kament rehnae do log khud hi samjh lagaee

    तो भाई बेनामी तुम्हारी हिम्मत कहाँ चली गयी है जो तुम छिप कर बोल रहे हो!!!!!!!!!
    "आक थू" तो तुम पर है शिखंडी कहिंके

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  34. ये प्रश्न अनुत्तरित हैं अभी तक
    भूर्ण ह्त्या मामलों में अगर सास ये कहती हो कि उसे "वंश का नाम आगे बढ़ाना है" तो स्त्री का दुश्मन पुरुष कैसे हुआ ??

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  35. @मुक्ति जी , आप मुझे स्त्री विरोधी न समझें ... मैं सिर्फ ये जानना चाहता हूँ की ऐसा कौनसा सिक्का है जिसके दो पहलू नहीं है , आप अखबारी कतरन वाली बात को दिल पर ना लें

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  36. बेनामी तुम्हारी हिम्मत कहाँ चली गयी है जो तुम छिप कर बोल रहे हो!!!!!!!!!
    "आक थू" तो तुम पर है शिखंडी कहिंके

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  37. समाज का आधारभूत ढांचा सिर्फ स्त्री पर निर्भर है , स्त्री किसी भी सभ्यता की "छुपी हुयी" शक्ति है , अभी जो परेशानियां आ रही है उनकी वजह ये भी हो सकती है की नारी में अपनी पहचान पाने का कुछ नया जूनून पैदा हुआ है . अब बच्चों को संस्कार और हर तरह की देने के लिए बाहरी एजेंसी ( अध्यापक , काउंसलर) की मदद ली जायेगी .... नवीनतम शिक्षा में विवेक का कोई स्थान नहीं होगा .. बस एक ही डायलोग होगा ""ये सब तो नोर्मल है "" ...फिर अपराध पढेंगे ...फिर पुरुष पर सारा इलज़ाम आएगा .पर समस्या का मूल तो वही है ...... नारी अपना सही रूप छोड़ कर ( बच्चों को संस्कार देने का ) पता नहीं कौनसी पहचान के पीछे जा रही है .

    आज "अभिषेक बच्चन" सफल एवं """"सभ्य""" व्यक्तित्व हैं तो पूरा श्रेय "जया बच्चन जी" को ही जाता है जिन्होंने केरिअर के सफलतम मोड़ पर बच्चों के लिए केरिअर को त्याग दिया . आज वो सफल भी है और सबसे बड़ी बात """संतुष्ट"""" भी .. इसीलिए मैं कहता हूँ

    अपनी पहचान खोकर
    अपनी पहचान पाती है नारी
    जब हो अगली पीढ़ी संस्कारी
    तभी मिटेगी दुविधा सारी

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  38. अगर रामायण में सीता अपहरण की घटना रोकना चाहें तो सिर्फ शूर्पनखा ( एक स्त्री ) को रोकना होगा कई सारी स्त्रियों को समस्या हल हो जाएगी.......
    मैंने कहा ना " स्त्री ही स्त्री की प्रथम दुश्मन होती है, अगर बारीकी से देखो तो "

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  39. अमित जी, बहुत ही दमदार और उचित सन्दर्भ में लिखा लेख है. लेकिन साथ ही साथ यह भी सत्य है की नारियों का शोषण आज भी होता है. और अक्सर नारी उत्थान की बात करने वाले ही नारी शोषण में सबसे आगे होते हैं.

    लेकिन एक बात से मैं सहमत नहीं हूँ.

    "आपसी सहमती से बनाये गए संबंधों को बलात्कार का नाम कैसे दे दिया जाता है "

    व्यभिचार जैसे खतरनाक जुर्म को रोकने में यह बड़ा कारगर है. इससे कम-से-कम यह डर तो रहता है कि कहीं आपसी सहमति के बाद भी बलात्कार का आरोप ना लग जाए, और कुछ लोग इस डर से अनैतिक संबंधो से बच जाते हैं.

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  40. नारी उत्थान का झंडा बुलंद करने के चक्कर में अक्सर लोग सभी मर्दों को बुरा बना देते हैं, यह एक बहुत ही गलत बात है. मैं इस विषय पर पूर्णत: आपके साथ हूँ.

    ज़रा सोचिये इस पृथ्वी की आधी आबादी वाले सभी पुरुष अगर बुरे हो जाएँगे तो इस दुनिया का क्या होगा?

    ज्यादा ना लिखकर आप सभी से विशेषकर स्त्री समाज से पूछना चाहुंगा की क्या वास्तव में स्त्री समाज को कभी भी पुरुष समाज से सच्चा प्यार और सम्मान नहीं मिला????

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  41. जब महिलाए किसी ऐसे विषय पर लिखती है तो उनके कहने का अर्थ ये नहीं है कि सभी पुरुष बुरे है या सभी महिलाओ के साथ बुरा व्यवहार हो रहा है उन लेखो से बुरा उसे ही लगेगा जो खुद नारी को दोयम दर्जे का मान रहा है | अब सीता हरन के लिए दूसरी नारी को दोष दिया जा रहा है जैसे कि रावण ने उससे पहले किसी और नारी के साथ ऐसा किया ही न हो या वो तो राम से भी महान था उसे तो उसकी बहन ने ही कान भर भर के राक्षस बनाया हो | किसी ने कहा कि आज कल के बच्चे बिगड़ रहे है क्योकि महिलाए बाहर काम कर रही है बच्चो पर काम ध्यान दे रही है इसलिए मतलब ये कि जो महिलाए घर पर बच्चो को पाल रही है उनके बच्चे तो राम बन कर निकाल रहे है उनके बच्चे बिगड़ते ही नहीं | इन बातो से ही पता चल जाता है कि नारी के लिए आप के क्या विचार है आप हर बात के लिए नारी को ही दोष दे रहे है | यहाँ पुरे समाज कि बात हो रही है और लोग अपने निजी उदाहरन दे रहे है | आप के घर में ये नहीं हो रहा है बहुत अच्छी बात है पर जरा नजर घुमा कर अपने घर शहर और राज्य से बाहर पुरे देश का हाल देखीये फिर कुछ कहिये | ब्लॉग पर या कही और जो महिलाए इस विषय पर लिखती है वो इसी लिए लिखती है कि जिस सम्मान प्यार के साथ वो जीवन जी रही है वही सम्मान और प्यार सभी नारी को मिले और वो उसके लिए उनकी तरफ से लड़ती है | एक तरफ तो आप महिला स्वतंत्रता के नाम पर महिलाओ के विवाह पूर्व सेक्स को बुरा बता रहे वही दूसरी तरफ आपसी सहमति से बने सेक्स को सही ठहराह रहे है यदि ये गलत है तो दोनों के लिए गलत है क्या आप नहीं जानते कि विवाह का झूठा वादा करके कितने लडके ये सब लड़कियों के साथ कर रहे है आप को तो उन लड़कियों कि सराहना करनी चाहिए कि उन्होंने उन लड़को को अपना भावी पति मान कर कुछ किया अब वो मुकर रहा है यदि वो सिर्फ मौज मस्ती के लिए ये करती तो किसी को अदालत तक खीच कर नहीं ले जाती जबकि उनको मालूम है कि ऐसे केस में ज्यादा नुकसान उनको ही होगा |

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  42. इस चर्चा को चलाने का शुक्रिया अमित जी,
    बेशक आपके प्रसतूत दृष्टिकोण से सोचा ही जाना चाहिए।
    ममता और मोह वशीभूत नारी ने कंई कर्तव्य स्वयंभू लाद रखे है।
    जब कहीं कोई स्त्री इन स्वेच्छिक कर्तव्यों को असहनीय देख विचलित होती है तो, सर्वप्रथम बंदिश दूसरी नारी से ही उपस्थित होती हैं एवं सुविधा से अभ्यस्त पुरुष बादमें। उपस्थित अत्याचार के किस्से इसी मानसिकता के परिणाम है। और हो-हल्ला विपरित मानसिकता के।

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  43. मैंने पहले भी कहा है कि इस तरह के लेख लिखने से कोई फायदा नहीं है क्योकि जो सुधारे हुए है उनको इसकी जरुरत नहीं है और जो बिगड़े है उनके ऐसे लाखो लेख क्या खुद भगवान भी आकर कहे तो वो नहीं सुधरने वाले और सच को सच नहीं मानने वाले | ये हजारो साल पुरानी मानसिकता है उसे जाने में काफी समय लगेगा | हम सबकी बाते तो आप को बेकार लगेगी पर कम से कम शिशुपाल जी कि बात पर गौर कीजिए वो काम कर रहे है ऐसे ही विषय पर और पुरुष भी है |

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  44. @ अंशुमालाजी,

    आपकी इस टीप्पणी के पूर्वार्ध से सहमत,लेकिन "शिशुपाल जी कि बात पर गौर.... के विषय में...

    दाँतो के विशेषज्ञ के पास निश्चित ही दाँतो का दर्दी ही आयेगा,और दाँतो के विषय में उनका मन्तव्य निर्णायक होगा।

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  45. @ गौरव जी, मैं आपको क्या किसी को भी स्त्री-विरोधी नहीं समझती क्योंकि नारी की दोयम स्थिति के लिए पुरुष नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संरचना दोषी है... इसके लिए पितृसत्तात्मक विचारधारा दोषी है, जिससे सत्री-पुरुष दोनों ही प्रभावित होते हैं... पितृसत्ता के अंतर्गत सत्ता हमेशा शक्तिशाली के हाथ में होती है और विश्व के अधिकतर समाजों में पुरुष अधिक शक्तिशाली है... इसलिए सत्ता उसके हाथ में है... इसका यह अर्थ नहीं कि औरतें शोषक नहीं होतीं, बेशक औरतें भी शोषक होती हैं और पुरुषों में भी संवेदनशील लोग होते हैं... पर अपने देखा होगा कि जिन महिलाओं के हाथ में सत्ता होती है, वही कमज़ोर स्त्रियों पर अपना हुक्म चलती है. यदि सास तेज-तर्रार है तो वो हावी रहेगी और यदि बहू ज्यादा तेज है, तो वह सास का शोषण करेगी...
    हमारा बस ये कहना है कि क्या कमजोरों को इस समाज में रहने का हक नहीं है? अब चाहे वो स्त्री हो, दलित हो, गरीब हो या बाल मजदूर... हर एक को अपने न्यूनतम अधिकार तो मिलने ही चाहिए.
    आखिर बाल मजदूरी के लिए चलाए जा रहे अभियान से ये तो नहीं सिद्ध होता कि सभी बच्चे बाल मजदूर हैं या कुछ दलितों के अच्छी नौकरी पाकर अच्छी स्थिति में आ जाने से ये तो सिद्ध नहीं होता कि सभी दलितों की स्थिति सुधर गयी है. तो स्त्रियाँ तो देश की आधी आबादी हैं... उनमें से अधिकांश को अधिकार नहीं मिला है ये तो सच है ही न?

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  46. @मुक्ति जी, मैं आपके विचारों का तभी से सम्मान करता हूँ जब से आपका ब्लॉग पहली बार पढ़ा है आप वहां मेरे कमेन्ट भी देख सकती हैं ......मैं अभी अंतिम कमेन्ट करीब करीब वैसा ही करने वाला था जो की आपने अभी किया . मैं ये मानता हूँ की हमें विभाजन की आदत हो गयी है , ये हमारे संस्कारों में शामिल हो गया है
    अगर एक मानव दूसरे मानव को ( स्त्री या पुरुष तो फिर से विभाजन हो जायेगा ना ) सही सम्मान दे और उसके हितों को नुकसान न पहुंचाए तो सब ठीक हो जायेगा बस काफी है
    ..... फिर क्या आधी आबादी क्या पूरी आबादी
    ये आधी आबादी शब्द ऐसा प्रतीत होता है जैसे दूसरे गृह के जीव की बात हो रही हो , मैं तो कल भी सब को सम्मान देने की बात करता था आज भी करता हूँ और करता रहूँगा , क्योंकि मानव की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती के बाद आत्मसम्मान का ही नंबर आता है .. है ना ??

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  47. @मुक्ति जी, ये जान कर भी खुशी हुई की आप किसी को भी स्त्री विरोधी नहीं मानती पर फिर भी एक बात और कहूँगा अंत में की अगर मेरे किसी भी विचार से आपको थोड़ा सा भी बुरा महसूस हुआ हो ... जरा सा भी .....तो छोटा नादान भाई समझकर माफ़ कर दीजियेगा . मैं खुद भी यही चाहता हूँ की मैं गलत साबित हो जाऊं और आप सही .... इस हार में भी मुझे जीत की खुशी मिलेगी ..आपके सभी मानवता के हित में किये जाने वाले प्रयासों को बल मिले यही दुआ है मेरी

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  48. @ गौरव मैंने अपने ब्लॉग पर आपकी टिप्पणी पढ़ी थी और जानती हूँ कि आप मेरे ब्लॉग के समर्थक हैं. बहस और तर्क में बुरा मानने जैसी कोई बात नहीं होनी चाहिए... आप निश्चिन्त रहिये. मैं न किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप करती हूँ और न किसी बात को पर्सनली लेती हूँ. शुभकामनाएं !

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  49. अगर एक मानव दूसरे मानव को ( स्त्री या पुरुष तो फिर से विभाजन हो जायेगा ना ) सही सम्मान दे और उसके हितों को नुकसान न पहुंचाए तो सब ठीक हो जायेगा बस काफी है

    time and again i write on naari blog about eqaulity among human beings given by constitution and legal system

    i really fail to understand why people start abusing woman bloggers who write on these issues

    we are trying to spreadd awareness about the inequality and what woman bloggers are writing is to show how much disparity is still there

    gender bias is prevelent in vaiours forms and its the cconditioning of society which is responsible

    none has the right to tell woman what is right and what is wrong woman has been given a brain and she uses it

    after reaching adult hood and after becoming self reliant every individual shoul be given equal rights as given by law and constituion irrespective of cast and creed and gender

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  50. रचना जी, यही बात तो मैं भी कह रही थी कि जब तर्क की बात होती है, तो तर्क करें... लोग नारी ब्लॉगर पर व्यक्तिगत आक्षेप क्यों करते है? हमलोग तो कभी भी पुरुषों पर सीधे आरोप नहीं लगाते तो ये लोग क्यों ऐसा करते हैं?

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  51. Mukti
    Let them be abusive . every abusive post against me by any one makes me realise how deep rooted gender bias is . Woman bloggers are supposed to write goody good comments , goody goody poems and nothing more

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  52. आप सभी का आभार व्यक्त करते हुए एक बार फिर यह निवेदित करना चाहुंगा की मैंने ये पोस्ट लिखते हुए पहले ही साफ़ कर दिया था की "मैं यहाँ स्त्री बुरी या पुरुष भला का राग अलापने नहीं बैठा हूँ." सारी बुराई मानवता के पतन की है, किसी एक विषय नारी शोषण, बाल मजदूरी या शोषण, दहेज़, भ्रष्ठाचार, या देश द्रोह किसी भी एक समस्या के लिए किसी भी एक वर्ग मात्र को दोषी नहीं ठराया जा सकता है. जो दुर्गुण सार्भौमिक है, उन्ही के विरुद्ध आवाज़ उठनी चाहिये. किसी एक समाश्या के लिए सारे वर्ग को दोषी ठहरा देना नयोचित नहीं कहा जा सकता है.
    जिस प्रकार आतंकवाद के लिए सारे मुश्लिम समाज को, या फिर नक्सलवादी हिंसा के लिए सारे आदिवाशियों को दोषी नहीं बताया जा सकता है .
    लेकिन जब किसी भी एक समाश्या के लिए काम करने वाले, लेखन करने वाले सारी समस्या के लिए विपरीत वर्ग को समूल दोषी ठहरा जाते है तो बात मन को कचोटती है.
    एक बार फिर धन्यवाद देते हुए की आप सभी ने इस विषय की नाजुकता को समझते हुए जिस गरिमामय वातावरण में संवाद किया इसी प्रकार के सहयोग और संवाद की अपेक्षा करता हूँ और अपने बेनामी बंधु से भी आग्रह करता हूँ की अपने मन की बात गरिमामय ढंग से रखते तो सभी को कुछ और भी जानने को मिल सकता था.

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  53. @ अंशुमाला जी , शांति बनाये रखने के लिए मैं आपके कमेन्ट पर चुप्पी साध कर बैठा था ये जान कर ख़ुशी हुयी की आपको मेरी सोच एकतरफा लगती है ( और वो थी भी पर सिर्फ उस कमेन्ट में ) तभी आज मेरी नज़र आपके ब्लॉग पर गयी.... वहां पर बहुत ही अच्छा (एकतरफा) लेख मौजूद है जिसमे आपने एक ऐसे लाडले की कल्पना की है जो की माता पिता की दी हर सुविधा पा कर भी अपनी हर असफलता को उसी सुविधा का परिणाम बता रहा है ...ये देख कर लड़कों के बारे में आपके विचारों का कुछ अंदाजा तो हो गया .. मेरी आपसे विनती है की अब मेरे इस लेख पर लगे स्पष्ठीकरण को देखिये http://my2010ideas.blogspot.com/2010/06/blog-post.html और अगर आप करंट ट्रेंड पर कुछ लिखना चाहें तो मैं आपको एक विषय सुझा देता हूँ जिसमे

    "माता पिता एक डिग्री धारी योग्य वर की तलाश में एक लड़की को प्रोफेशनल कोर्स करवा देते हैं , शादी के बाद उसकी कम नोलेज से उसकी पोल खुल जाती है और वो माता पिता को उनकी दी गयी सुविधा पर कुछ वैसा ही पत्र लिखती है जैसा की आपने आपकी पोस्ट में लिखा है"

    ऐसा लेख मैं भी लिख सकता हूँ पर एकतरफा लेख लिखना शायद धीरे धीरे ही सीख पाऊंगा. हां एक बात और मैं ये मानता हूँ की स्त्री तो पहले परिवार को प्राथमिकता देनी चाहिए फिर अपनी पहचान को, इसीलिए एक सफल नारी का उदाहण भी दिया है ( इस केस में परिवार सभ्य संस्कारी है )
    @अमित भाई , अगर आपको मेरा ये कमेन्ट गैर जरूरी लगे तो तुरंत पूरी तरह हटा दीजिएगा , मैंने अंशुमाला जी को दो कमेन्ट भेज दिए है

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  54. दरअसल मैं ये भी महसूस करता हूँ की मेरी सोच बहुत देहाती टाइप की है पर आप भी सोचिये एक परिवार ( कल्पना है )

    एक सोफ्टवेयर इंजिनीअर धोती कुरते में लैपटॉप चला रहा है उसकी घरेलु कार्यों में दक्ष पत्नी उसी दक्षता के आधार पर घर पर गृह उद्योग चला रही है (घर की आय में भी हाथ बटाती रही है और अपना आत्म सम्मान भी बनाये रखती है ) जिसमे बच्चे भी सहयोग दे रहें है , सीख रहे है , मुझे उम्मीद है की ये बच्चे ( लड़के लड़कियां दोनों ) सफल लेखाकार बन सकते हैं क्योंकि वो घर की पाठशाला में प्रक्टिकल भी करते है और स्कूल भी जाते है . बड़े बड़े विदेशी सी ई ओ धोती कुरते वाले मुखिया से तनाव मनेजमेंट और प्रोफेशन की बारीकियां सीख रहे हैं , बड़ी बड़ी सेलिब्रटी महिलाएं उस साधारण सी दिखने वाली महिला से हर वो गुण पाने के लिए दूर दूर से आ रही है जो उन्हें आधुनिकता के अंधेपन में नहीं दिख पाया
    इनके बच्चे विदेश नहीं जाते महानगर नहीं जाते क्योंकि इन्टरनेट तो गाँव में भी है , और जिसे प्रतिभा की आवश्यकता होती है इनसे संपर्क करता है
    हर शाम मंदिर में भजन भोजन होता है लोग अपने दुःख बांटते है कोई साइकोलोजिस्ट नहीं ........
    हर बीमारी का उपचार दादी मां चुटकियों में कर देती है कोई ओपरेशन नहीं ......
    १०० प्रतिशत रोजगार , स्वाभिमानी महिलाऐं , हाई टेक्निक से लैस धोती कुरते वाले बच्चे ( धोती कुरता इसलिए क्योंकि भारत की जलवायु के अनुरूप है ) और विकसित भारत

    सारे एन आर आई भारत में आ चुके हैं और इसी तरह अपनी प्रतिभा का योगदान दे रहे हैं ....

    कैसा लगा ??? ये काल्पनिक भारतीय परिवार

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  55. एक अंतिम स्पष्टीकरण दे दूँ

    इस कल्पना में महिला जो गृह उद्योग चला रही है वह कोई छोटा मोटा उद्योग नहीं है .... माल एक्सपोर्ट भी होता है मतलब कुल मिला कर ऐ सी कमरें और भारी तामझाम ही नहीं है बाकी सबकुछ वैसा है जैसा की एक बड़ा बिजनेस में होता है. ये इस बात से साबित होता है की मुखिया की पुरुष और महिला की इनकम एक सी है
    और अगली पीढी की बालिकाओं ने सोच रखा है की वो भी माँ के नक़्शे कदम पर चलेंगी और अपने आत्म सम्मान की रक्षा करेंगी

    इस गाँव स्कूलों में नैतिक शिक्षा पढाई जाती है एक गाँव के सभी बच्चे एक दूसरे को भाई बहन मानते है , शादी पास के गाँव में होती है ... कोई अपराध की संभावना नहीं
    इस गाँव में तलाक जैसी कोई चीज नहीं होती क्योंकि घर के बड़े बुजुर्गों का फैसला मानना ही पड़ता है ,, कोई अदालत नहीं
    इस गाँव में चोरिया नहीं होती क्योंकि रोजगार पूरा है ( किसी के पास छोटा तो किसी के पास बड़ा )
    इस गाँव में वृद्धों का सम्मान होता है पूरा गाँव उनका ध्यान रखता है ( कोई वृद्धाश्रम नहीं )

    मेरी सोच हमेशा से संतुलित रही है पर मुझे उसे संतुलित तौर पर प्रदर्शित करना कभी नहीं आ पाया इसीलिए शायद मैं कमेंट्स में अपनी पूरी भावनाएं जाहिर नहीं कर पाता
    @ अमित भाई , मुझे विषय से कुछ हट कर और इतने बड़े कमेन्ट नहीं करने चाहिए जानता हूँ , पर पता नहीं क्यों कर रहा हूँ , आप इन्हें हटा सकते हैं

    ये किसी विशेष ब्लोगर के लिए नहीं, किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं ये मानव मात्र को मेरा सन्देश है

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  56. गौरव भाई आप ही बताइए की इन्हें हटाने की क्या जरुरत हो सकती है, ब्लोगिंग सिर्फ ठुकुरसुहाती लिखने का नाम ही तो नहीं है, और कमेन्ट करना सिर्फ "अच्छा है" , "बहुत बढ़िया" लिखदेना ही तो नहीं होता ना. आपने इस विषय पर इतनी अच्छी चर्चा को आगे बढाया इसके लिए तो मैं आप का आभारी हूँ.

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  57. ये सब बहसें ऐसी हैं जहां अपनी सोच के अनुसार जितने चाहिये उससे दोगुने तर्क जुटा सकते हैं बहस करने वाले लोग। स्त्री समाज और पुरुष समाज के कोई आंकड़े हीं हैं मेरे पास लेकिन अपनी आज तक की जिन्दगी के अनुभव के आधार पर यह तय करने में मुझे कोई दुविधा नहीं है कि स्त्री की स्थिति (कम से कम अपने देश में) दोयम दर्जे की ही है। महिलायें असुरक्षित हैं। उनकी जिंदगी पुरुषों के जीवन मुकाबले कठिन है।

    जो महिलायें आगे आ रही हैं उसमें उनका, समाज का और अच्छी सोच वालों का योगदान है।

    दो-चार , घर-परिवार ,आस-पास ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे जहां महिलायें खुशहाल दिखें लेकिन इन चन्द उदाहरणों को पूरे समाज पर समाकलित( इंट्रीग्रेट ) करके देखना कुछ ऐसा ही है कि स्थिति चाहे जैसी हो लेकिन परिणाम वही है जो हम मानते हैं।

    ब्लॉग जगत में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। यहां भी इसी समाज के ही लोग आते हैं। अपने पांच साल से अधिक के ब्लॉग जगत के अनुभव के आधार पर मेरा मानना है : ब्लॉगजगत में महिलाओं को तब तक बड़ी इज्जत और सम्मान के भाव से देखा जाता है जब तक अपनी सीमा में रहें। सीमा से बाहर निकलते ही उनके साथ लम्पटता शुरू हो जाती है। मजे की बात यह है सीमा तय करने की जिम्मेदारी भी लम्पट लोग ही निभाते हैं।

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  58. वाह अनूप शुक्ल जी! अब और कहने को क्या बचा है? बस यही कि यहाँ कानून भी लम्पट बनाते हैं और न्याय भी वे ही करते हैं।
    घुघूती बासूती

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  59. आपको साधुवाद | आज के दौर में किसी भी मुद्दे पर सिर्फ़ अपना नजरिया लिखना बहुत कठिन है पर आप ने यही करने की एक सफल कोशिश करी है, हलाकि विवाद फिर भी बन गया ! !

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  61. गंगा माँ बोली मैंने धोया पाप सबका दूर किये सबके दुःख मैं सबसे बड़ी,
    शिवजी बोले अरे पगली तू तो मेरे जटा मैं पली तू केसे बड़ी तुझसे मैं बड़ा,
    केलाश पर्वत बीच मैं बोला अरे प्रभु आप तो मेरी गोद मैं रहे आप से भी मैं बड़ा,
    तब हनुमान जी बोले रे मुर्ख तू तो मेरे हाथ पर पड़ा तुझसे तो मैं बड़ा,
    अब श्री रामजी बोले रे भक्त हनुमान तुम तो मेरे चरणों मैं पड़े तुमसे तो मैं बड़ा,
    अरे भाई ये सब तो मेरी जेब मैं पड़े मैं सबसे बड़ा हा हा हा हा ..........

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जब आपके विचार जानने के लिए टिपण्णी बॉक्स रखा है, तो मैं कौन होता हूँ आपको रोकने और आपके लिखे को मिटाने वाला !!!!! ................ खूब जी भर कर पोस्टों से सहमती,असहमति टिपियायिये :)