शुक्रवार, 21 मई 2010

"अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभं"

हमें कभी कभी अप्रत्याशित परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है. ऐसी परिस्थितियाँ जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते सामने खडी हो जाती है. क्या कारण है ??
सबसे पहले तो समझने वाली बात यह है कि ईश्वरीय विधान में हमें ऐसा कुछ भी प्राप्त नहीं होता जिसके अधिकारी हम नहीं है .
कर्म सिद्धांत अकाट्य और सुनिश्चित है. संसार भर में सारे प्राणियों के जो सुख-दुःख, अच्छी-बुरी परिस्तिथि जो कुछ भी हम देख पाते है; वह हमारे ही पिछले कर्म का प्रतिसाद है. हमारा केवल यही एक जन्म नहीं है. हमारे साथ असंख्य पूर्वजन्मों के कर्म संस्कार संचित है .
लेकिन कुछ मान्यताएं बतलाती है कि सिर्फ यही एक जन्म है और मृत्यु के  बाद एक लम्बे इन्तजार के बाद न्याय का समय आएगा जिस दिन सारे प्राणियों का हिसाब किताब होगा. जबकि न्याय कि भावना और प्रत्यक्ष दिखने वाली स्थितियों में यह सिद्धांत टिक नहीं पाता है. अगर वर्तमान जन्म ही प्रथम और अंतिम है तो फिर सभी प्राणियों को एक साथ और एक ही परिस्थितियों में जन्म लेना चहिये था; जबकि हम देखते है कि ऐसा बिलकुल नहीं है .क्यों कोई शारीरिक रूप से अपंग जन्म लेता है, या हो जाता है, क्यों कोई परम धनि या परम फ़कीर होता है, अगर गर्भाशायी बालक भी किसी प्रकार दुःख प्राप्त कर रहा है तो सीधा  सीधा मतलब है कि उसके पूर्वजन्म के कर्म फलदायी हो रहे है, जन्म लेते ही कितने ही बच्चे भयंकर परिस्थितियों का सामना करते है, यह किस कारण से साफ़ है पिछले कर्मनुबंध से. नहीं तो कोई कारण नहीं है कि कोई भी प्राणी संसार में असमान  रूप से सुख-दुःख भोगे.
मेरी समझ में तो न्याय सिद्धांत तो इसी प्रकार घटित होता है कि संसार एक अनवरत और शाश्वत प्रक्रिया  है, सारा जीव समुदाय उसका अंग है और अपने कर्मानुसार जगत में फलोप्भोग करता है .जो कुछ भी घटित होता है उसके लिए हम किसी दूसरे को दोष नहीं दे सकते है. भले ही कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारी  परिस्थिति के लिए उत्तरदायी दिख रहा हो, पर वह हमारे सुख-दुःख का मूल कारण बिलकुल भी नहीं है.बल्कि अनेक जन्मों में हमारा अनेक जीवात्माओं से सम्बन्ध रहता है. उनके साथ हमारा ऋणानुबंध है, जिसे हमें समय अनुसार चुकता करना होता है. इस तरह प्रत्येक परिस्तिथि का मूल कारण हम  ही है. जब तक हमारे कर्म का लेखा अनुमति नहीं देगा, तब तक कोई हमें सुख-दुःख नहीं दे सकता. 
काहु न कोउ सुख दुःख कर दाता /
निज कृत करम भोगु सब भ्राता // 

एक बार धृतराष्ट्र ने श्री कृष्ण से पूछा कि मैंने जीवन में ऐसा कोई भयंकर पाप नहीं किया, जिसके फलस्वरूप मेरे सौ पुत्र एक साथ मार गए. श्रीकृष्ण ने उसे दिव्य द्रष्ठी प्रदान कि . तब उन्होंने देखा कि पचास जन्म पहले वे एक बहेलिया थे और उन्होंने पेड़ पर बैठे पक्षियों को पकड़ने के लिए जलता हुआ जाल फेंका था, जिससे सौ पक्षी अंधे होकर जाल में गिरे और मार गए. पचास जन्मों तक संचित पुण्य कर्मों के कारण उन्हें इस कर्म का फल नहीं मिला, पर जब पुण्य कर्मों का प्रभाव ख़त्म हुआ तो उन्हें यह फल भोगना पड़ा. कर्मफल अकाट्य है,अचूक है, उसे भोगना ही पड़ता है -- "अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभं"

यह बात भी पूरी तरह सही है कि भगवान् कि मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता. ईश्वर न किसी से राग करता है न किसी से द्वेष. वह तो केवल दया और न्याय करता है. छोटी बुद्धि के होने के कारण हम नहीं जान पाते कि हमारे लिए सही गलत क्या है. पर सर्वज्ञ होने के कारण ईश्वर जानता है कि हमारे हित में क्या है. उसके आगे हमारे सारे कर्मों का हिसाब है, इसलिए सबका समन्वय करते हुए जो युक्तियुक्त होता है,  वह वही करता है. 
इसलिए सभी अच्छे बुरे कर्मों  का ध्यान देते हुए हमें अपने जीवन में सज्जनता लाते हुए, दूसरों की भलाई के काम करने चहिये जिससे कि पिछले गलत कामों को भोगते  हुए हमसे कोई दूसरा गलत काम ना जो जाये जिसका फल फिर दुखदायी हो. 

22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट...

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  2. शिक्षाप्रद पोस्ट है .... सहमत

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  3. महफूज अली जी की सक्रियता काबिले तारीफ है / उम्दा धार्मिक प्रस्तुती / सत्य की सार्थक विवेचना लेकिन हम इतना और कहना चाहेंगे की सत्य और परोपकार करने में अगर तकलीफ और अपमान का घूँट भी पीना परे तो भी पीछे नहीं हटना चाहिए / अमित जी हम चाहते हैं की इंसानियत की मुहीम में आप भी अपना योगदान दें कुछ ईमेल भेजकर / पढ़ें इस पोस्ट को और हर संभव अपनी तरफ से प्रयास करें ------ http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/05/blog-post_20.html

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  4. अमित जी , आप की व्याख्या अच्छी है ।

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  5. सीख लेने योग्य बातें. आभार इस पोस्ट का.

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  6. जीवन में सज्जनता लाते हुए दूसरों की भलाई करते जीना ...
    खयाल अच्छा है ...जीवन का यही उद्देश्य होना चाहिए ...!!

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  7. आपकी पोस्ट से हमेशा ऊर्जा मिलती है। धन्यवाद।

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  8. बहुत ख़ुशी हुई आप को वापस देखकर. अब तो जब तक आपकी कोई पोस्ट पढने को नहीं मिलती तब तक कुछ खालीपन सा मिलता है. बहुत गहराई तक उतरकर फिर एक उम्दा मोती लाये है आप धन्यवाद्!

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  9. बहुत ऊँचे दर्जे की बाट काफी सरलता से कहने की कोशिश, वापसी के लिए बधाई

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  10. @हमें अपने जीवन में सज्जनता लाते हुए, दूसरों की भलाई के काम करने चहिये.... बहुत खूब !!

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  11. यह ईश्वरीय विधान ही है कि आप सभी का स्नेह अनवरत रूप से प्राप्त हो रहा है......स्नेह वर्षण के लिए आप सभी का आभार

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  12. दीपक गर्ग22 मई 2010 को 4:12 pm

    अमित,
    इतनी सी उम्र में इतनी गहरी बातें और गहरी समझ.
    कुछ कर के ही मानोगे.

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  13. दिल्ली के ब्लागर इंटरनेशनल मिलन समारोह में भाग लेने के लिए पहुंचने वाले सभी ब्लागर साथियों को कुमार जलजला का नमस्कार. मित्रों यह सम्मेलन हर हाल में यादगार रहे इस बात की कोशिश जरूर करिएगा। यह तभी संभव है जब आप सभी इस सम्मेलन में विनाशकारी ताकतों के खिलाफ लड़ने के लिए शपथ लें। जलजला भी आप सभी का शुभचिन्तक है और हिन्दी ब्लागिंग को तथाकथित मठाधीशों से मुक्त कराने के एकल प्रयास में जुटा हुआ है. पिछले दिनों एक प्रतियोगिता की बात मैंने सिर्फ इसलिए की थी ताकि लोगों का ध्यान दूसरी तरफ भी जा सकें. झगड़ों को खत्म करने के लिए मुझे यही जरूरी लगा. मेरे इस कृत्य से जिन्हे दुख पहुंचा हो उनसे मैं पहले ही क्षमायाचना कर चुका हूं. हां एक बात और बताना चाहता हूं कि थोड़े से खर्च में प्रतियोगिता के लिए आप सभी हामी भर देते तो भी आयोजन करके इस बात की खुशी होती कि चलो झगड़े खत्म हुए. मैं कल के ब्लागर सम्मेलन में हर हाल में मौजूद रहूंगा लेकिन यह मेरा दावा है कि कोई मुझे पहचान नहीं पाएगा.
    आप सभी एक दूसरे का परिचय प्राप्त कर लेंगे फिर भी मेरा परिचय प्राप्त नहीं कर पाएंगे. यह तय है कि मैं मौजूद रहूंगा. आपकी सुविधा के लिए बताना चाहता हूं कि मैं लाल रंग की टी शर्ट पहनकर आऊंगा..( बाकी आप ताड़ते रहिएगा.. सब कुछ अभी बता दूंगा तो मजा किरकिरा हो जाएगा .बाकी अविनाशजी मुझे पहचानते हैं लेकिन मैंने उनसे निवेदन किया है कि जब तक सब न पहचान ले तब तक मेरी पहचान को सार्वजनिक मत करिएगा.
    आप सभी को शुभकामनाएं. अग्रिम बधाई.

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  14. @इतनी सी उम्र में इतनी गहरी बातें और गहरी समझ.
    कुछ कर के ही मानोगे.

    100% agree with deepak

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  15. बिल्कुल सच है- अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभं।
    इतनी अच्छी व्याख्या हेतु आपका साधुवाद.

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  16. "अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभं"
    बहुत सही बात है. याद दिलाने का धन्यवाद!

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  17. बहुत ही सारगर्भित पोस्ट, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  18. जब भी ग्लूकोज़ की कमी अनुभूत होती है, आपको पढ़ लेता हूँ.
    यह आलेख ऐसा है कि इसे चुनकर पी.एच.डी. किया जा सकता है.

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