शनिवार, 22 मई 2010

आपको बच्चों का कौन सा रूप पसंद है. ---------------- अमित शर्मा


बच्चे ईश्वर का दिया खुबसूरत उपहार है. 




 संसार में ऐसा कौन निष्ठुर होगा जिसका मन बच्चों को देखकर ना खिल उठता होगा.

बच्चे जब इस दुनिया में आते है तो सारी दुश्चिंताओं से दूर अपने माता-पिता के सामर्थ्य के आसरे निश्चिन्त रहते है.



लेकिन कुछ माता पिता पता नहीं क्या सोच कर अपने बचों के साथ ऐसा सलूक कर बैठते है 







जब तक माता के जीवन को हानि ना हो और गर्भ-समापन के आलावा कोई दूसरा विकल्प ना रहे, तब तो कुछ समझ में आ सकता है. लेकिन अनचाहा गर्भ रह जाये अपनी वासना कि अन्धायी से, लड़के कि चाहत में पता लगे कि लड़की है तो ये तरीका अपनाया जाये . हद है हैवानियत कि. कोशिश कीजिये कि अपनी पहचान में कहीं ऐसा ना हो पाए.

21 टिप्‍पणियां:

  1. दहल गया हूँ अन्दर तक, सुना तो काफी था इसकी भयानकता के बारे में. पर आज पहली बार एसा मंजर देखा है .
    कैसे कोई एस तरह कर सकता है. थू है इसे माँ-बाप पर

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  2. Female foeticide is on rise. A tragic state of our society. Hope people will realize soon, their mistake , their ignorance and the heinous crime they are commiting.

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  3. @ भाई अमित जी ! आपके द्वारा पुराण वचनों का संकलन वाक़ई क़ाबिले दीद है । मैं चाहूंगा कि आप उसे संपादित करके पुनः प्रकाशित करें । इससे इसलाम और वैदिक धर्म के आध्यात्मिक एकत्व का भी बोध होगा और विश्वासी जनों को पाप से बचने की प्रेरणा भी मिलेगी ।
    और एक अच्छी ख़बर गर्भस्थ भ्रूण के संबंध में भी है जिसे मैं आपसे नेक्स्ट पोस्ट में share करूंगा ।
    http://blogvani.com/blogs/blog/15882

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  4. थू है इसे माँ-बाप पर

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  5. इस प्रकार का अमानुषीय कृ्त्य तो कोई हैवान ही कर सकता है...जो जीव के जन्म लेने से पहले ही उसकी हत्या कर डालें....धिक्कार है ऎसे लोगों पर!

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  6. बैरागी से सहमत थू है ऐसे माँ-बाप पर

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  7. ऐसे लोगों को माँ-बाप कहना माँ-बाप शब्द का अपमान है

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  8. एक अजन्मे बच्चे की हत्या करना तो घोर अपराध है, इसके सिवा कुछ भी नहीं...

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  9. वीभत्स दृश्य । देखा नहीं जारहा है ।

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  10. धर्मग्रंथों में स्पष्ट वर्णित है कि भ्रूण हत्या करने वाला महापापी होता है। ब्रrावैवर्तपुराण में वर्णित है कि "गर्भघ्नश्च महापापी सम्प्रापनोति शुनीमुखम" अर्थात भ्रूण हत्या करने वाले रोध और नरक में जाते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार गर्भ में कन्या भ्रूण हत्या करने वाला, गांव को नष्ट करने वाला, गौ को मारने वाला महापापी रोध, नरक के भागी होते हैं।

    नारदपुराण, ब्रrापुराण के अनुसार भ्रूण हत्या करने वाले को वंशवृद्धि नहीं होती। ऐसे पुरुष या स्त्री के मरने पर उसके शव से स्पर्श करना, दाह संस्कार करना, श्राद्धतर्पण करना भी महापाप माना है। देवी भागवत पुराण अध्याय 9-34 श्लोक 27-28 के अनुसार गर्भपात करने वाले स्त्री पुरुष अगले जन्म गिद्ध, कौआ, सर्प, सुअर की योनि में जाता है, फिर बैल होने के बाद कोढ़ी मनुष्य होता है। गरुड़पुराण व मनुस्मृति में कहा गया है कि भ्रूण हत्या करने वाले के हाथ से जल भी ग्रहण नहीं करना चाहिए।

    वैर-विरोध लेकर किये जानेवाले युद्धमें भी शत्रुकी हत्याका ही उद्देश्य रहता है,फिर भी उसमें निहत्थे सैनिकपर शस्त्र नहीं चलाया जाता।पहले उसे सावधान करते हुए युद्ध के लिये ललकारते हैं,फिर शस्त्र चलाते हैं।परन्तु गर्भस्थ शिशु तो सर्वथा असहाय होकर पड़ा हुआ है।उसको इस बातका ज्ञान ही नहीं है कि कोई मुझे मार रहा है!ऐसी अवस्थामें उस मूक प्राणीकी दर्दनाक हत्या... See More कर देना कितना भयंकर पाप है?कितना घोर अन्याय है? अत: अन्नपर गर्भपात करनेवाले पापीकी दृष्टि भी पड़ जाय तो वह अन्न अभक्ष्य (न खानेयोग्य) हो जाता है।-स्वामी श्रीरामसुखदासजी

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  11. नर पिशाच होते हैं ऐसे लोग ।

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  12. @ Amit जी ! सारा मसला नैतिकता के अभाव का है . धर्म के अभाव में नैतिकता का होना असंभव है . ईश्वर को अपने कर्मों का हिसाब देने का और उनका फल भोगने का सिद्धांत ही आदमी को नैतिक और ईमानदार बना सकता है . अपने अच्छा लिखा है . इस विषय पर यह भी दर्शनीय है .
    http://vedquran.blogspot.com/2010/05/blog-post_18.html

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  13. हे भगवान्,इतना नीच भी हो जाता है इंसान......

    परमात्मा सभी को सदबुद्धि दे........

    कुंवर जी,

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  14. ये तो नीचता की हद हैं भाई

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  15. वैर-विरोध लेकर किये जानेवाले युद्धमें भी शत्रुकी हत्याका ही उद्देश्य रहता है,फिर भी उसमें निहत्थे सैनिकपर शस्त्र नहीं चलाया जाता।पहले उसे सावधान करते हुए युद्ध के लिये ललकारते हैं,फिर शस्त्र चलाते हैं।परन्तु गर्भस्थ शिशु तो सर्वथा असहाय होकर पड़ा हुआ है। उसको इस बातका ज्ञान ही नहीं है कि कोई मुझे मार रहा है! ऐसी अवस्थामें उस मूक प्राणीकी दर्दनाक हत्या... कर देना कितना भयंकर पाप है. कितना घोर अन्याय है.

    ------------- सिहरन. केवल सिहरन. संवेदना-शून्यता की पराकाष्ठा.

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  16. इस विषय पर सभी एकमत हों .......... यही मानवता है.

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