बुधवार, 5 मई 2010

आज फिर से रात भर आपकी याद आई ---- अमित शर्मा


आज  फिर से रात भर आपकी  याद आई
आज फिर से  रात भर हुई  नींद से रुसवाई  
तस्वीर जो देखी आपकी चली फिर से पुरवाई 
गुजरी हर एक बात  दौड़ी आँखों में भर आई  

जिन्दगी की धूप से जब कभी परेशां हुआ था
आप का ही  साया मैंने हमेंशा सर पे पाया था 
साये तो वैसे  अब भी  जिन्दगी में खूब मिले है
पर मिला ना अब तक आप सा हमसाया कोई है 

याद आती है अब भी बैठ काँधे पे घूमना आपके
घुमाता हूँ जब  बैठा काँधे पे पडपोते  को आपके
यादों  में ही आएंगे क्या अब  दिने  क़यामत तक
कहिये तो फिर आ चले "अमित" जरा बाज़ार तक





39 टिप्‍पणियां:

  1. यादों में ही आएंगे क्या अब दिने क़यामत तक
    कहिये तो फिर आ चले "अमित" जरा बाज़ार तक

    jo chale jate hai fir shayad hi kahte hai "आ चले "अमित" जरा बाज़ार तक"

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  2. waah sir aankhein nam kar di...aage kuch nahi keh paunga...

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  3. बड़ों और बुजर्गों के प्रति श्रद्धा सुमन अच्छे लगे - सिर्फ यादें ही रह जाती है वक्त निकाल कर उन्हें याद कर लें उनके लिए यही सच्ची श्रद्धांजलि है आप सच्चे सपूत/पोते हैं

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  4. कहिये तो फिर आ चले "अमित" जरा बाज़ार तक

    बेइंतिहा दर्द समाया है इस पंक्ति में अपनों से बिछड़ने का

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  5. "कहिये तो फिर आ चले "अमित" जरा बाज़ार तक"

    बेइंतिहा दर्द समाया है इस पंक्ति में अपनों से बिछड़ने का

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  6. यादों को सम्मान देती पोस्ट ,उम्दा प्रस्तुती /

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  7. उस देह, रूप में न सही, साथ ही हैं स्वयं भी और उनका आशीर्वाद भी

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  8. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना!!बढिया प्रस्तुति।

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  9. भाव भीनी कविता

    हमारी विनम्र श्रद्धांजलि

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  10. निश्बद हूँ , ह्रदय स्पर्शि व मार्मिक रचना ।

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  11. सुक्ष्म रुप में आपके साथ ही है
    हमेशा मार्गदर्शन के लिए।

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  12. बड़े हमेशा ही आपके साथ होते हैं आपके अन्दर...

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  13. aapki rachna ..bas man ko chhoo gayi ...bhaavnaao ko ....ek kavita me khoobsurati ke saath piroya hai aapne

    http://athaah.blogspot.com/

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  14. अमित !
    बहुत दर्द नाक है इन जाने वालों को याद करना , बरसों पहले रोते रोते यह रचना लिखी थी जिसे आज भी नहीं पढ़ पाता !

    ज्यों ज्यों कटता समय तुम्हारी याद सताती रे !
    इस बगिया के पेड़ तड़पते याद तुम्हारी में !
    जितने पेड़ लगाये तुमने
    झूम रहे थे सब मस्ती में
    इस हरियल बगिया में
    किसने आग लगाई रे !
    सबसे ऊँचा पेड़ गिरा ! सन्नाटा छाया रे

    इस बगिया में जान तुम्हारी
    फिर क्यों रूठे इस उपवन से
    किस पौधे से भूल हुई ?
    कुछ तो बतलाओ रे !
    सारे प्यासे खड़े ! कहीं से माली आओ रे

    तुमने सबसे प्यार किया था
    तन मन धन सब दान दिया था
    बदला चाहा नहीं किसी से !
    फिर क्यों रूठे इस आँगन से
    सबसे प्यारी अनू सिसकती ! याद तुम्हारी में !

    हर आँगन से तुम्हे प्यार था
    भूले बिसरे रिश्ते जोड़े !
    कई घरों में खुशिया बांटी
    अपने दुःख का ध्यान नहीं था
    कल्पब्रक्ष अवतार ! यहाँ दावानल आई रे !

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  15. bhaavnaao ko khoobsurati ke saath piroya hai aapne
    touching post...

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  16. बस यादें ही रह जाती है, अपनों की लेकिन फिर भी हम कुछ ना कुछ ऐसा कर सकते है , जो उनकी स्मृति को चिरस्थायी रख सकता है. कुछ भी सेवा कार्य ...........

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  17. दिल की कोमल भावनाओं व स्मृतियों को सामने लाने के लिए कविता श्रेष्ठ माध्यम है और आप इसका बखूबी प्रयोग कर रहे हैं। पूज्य दादाजी को मेरा नमन।

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  18. जो कल थे,वो भी क्या पल थे.........!
    जो कभी साथ थे हमारे,
    हर पल-घडी के थे सहारे,
    कैसे बिना उनके ये पल गुजारे,
    पलके खोले तो याद,मूंदे तो असल थे...

    जो कल थे,
    वो भी क्या पल थे.........!

    कुंवर जी,

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. कल में कुछ नही था
    पर कुछ मेरे पास था
    आज में बहुत कुछ हू मगर
    क्या करू वो कुछ मेरे पास नही हैं


    यादों में जीना और उनको एक अच्छी दिशा देना बहुत जरुरी हैं

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  21. मर्मस्‍पर्शी रचना,,,

    आपके इन्‍ही तरीकों के तो हम कायल हैं।

    वस्‍तुत: शब्‍दों की सामान्‍यता में भी अद्भुत चमत्‍कार है।


    धन्‍यवाद स्वीकारें।

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  22. मर्मस्‍पर्शी रचना,,,धन्‍यवाद स्वीकारें।

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  23. मर्मस्‍पर्शी रचना,,,धन्‍यवाद स्वीकारें।

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  24. amit g apki is kavita ne mujhe mare baba ki yad dila di apne

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  25. apki is kavita ne mujhe kush yad dila diya

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  26. तुमको भुला दे इस की हमने बरसो दुआएँ माँगी थी
    रात तुम्हारा याद ना आना, याद आया तो रोए बहुत.

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  27. भावपूर्ण ,मन को छू गयी यह कविता .
    अपने ,हमारे साथ हमेशा आशीर्वाद के रूप में हमारे साथ रहते हैं.
    आप के दादाजी को नमन.

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  28. यादों में ही आएंगे क्या अब दिने क़यामत तक
    कहिये तो फिर आ चले "अमित" जरा बाज़ार तक
    in panktiyon ne to dil chhoo liya.

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  29. क्या आप सोच सकते है की कोई अगर अपने बड़ों को श्रधान्जली दे तो वो भी किसी की नापसंदगी का कारन हो सकता है. यही हो रहा है ब्लोग्वानी पर. अमित जी आपकी पोस्ट पे 3 नापसंदगी के वोट है .
    अब बताइए ये कोण कर सकता है??????
    अरे भइये तुम्हारी तो पुच अब ख़तम हो गयी और अमित जी के काम को तो बंगलौर से निकलने वाली एक हिंदी मगज़ीन ने भी सराहा है और अपने ताज़ा अंक में ब्लॉग के ऊपर लिखे गए आर्टिकल में चार हिंदी ब्लोगरों का रेफरेंस दिया है उसमे से एक अमित भाई का भी है.
    यह खबर कूद उस मग्जीन के मनेगर ने अमित भाई की पिछली पोस्ट पे दी है -------------

    Bharatiya said...

    Dear Sir / Madam,
    Greetings from Bharatiya Opinion Hindi Magazine, Karnataka.
    It is a pleasure for us to say that your blog has been featured as a reference
    in a write-up in the latest issue of our Magazine,
    You can read the Magazine online here --->>http://bharatiyaopinion.com
    Your Blog is featured on the page 48.


    We would like to send you a copy of the magazine if you could send
    us the your postal details. Our mail id is
    editorbo@gmail.com

    With Regards,
    Kamal Parashar
    Relations Manager.
    9945488001.
    May 4, 2010 1:17 PM

    अरे अकल के दुष्मनो नापसंद का वोट देने से कुछ नहीं होगा कुछ मतलब का लिखो जो तुम्हारी पोस्ट भी प्रसंसा पाए कोई भी http://bharatiyaopinion.com पे मग्जिन को ओन्लैन पड सकता है जिसके पेज 48 अमित जी के लेख का रेफरेंस है

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  30. बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति.पुण्य नमन!! स्मृतियाँ यूँ ही संजोये रखिये.

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  31. बहुत सुन्दर भावों से बुनी है ये कविता...बढ़िया अभिव्यक्ति

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  32. आप सभी का हार्दिक आभार !

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  33. कहिये तो फिर आ चले "अमित" जरा बाज़ार तक

    __________ इस तरह आपने भाव-विह्वलता की हद पार कर ली है. इन शब्दों में वह ताकत बन पड़ी है जिससे बिछड़े हुए बिलकुल करीब महसूस हो रहे हैं.

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जब आपके विचार जानने के लिए टिपण्णी बॉक्स रखा है, तो मैं कौन होता हूँ आपको रोकने और आपके लिखे को मिटाने वाला !!!!! ................ खूब जी भर कर पोस्टों से सहमती,असहमति टिपियायिये :)