गुरुवार, 27 मई 2010

ओ पथिक संभलकर जइयो उस देश ------------ अमित शर्मा

ओ पथिक संभलकर जइयो उस देश
महा ठग बैठ्यो है धार ग्वाल को भेष
टेढ़ी टेढ़ी चाल चले,अरु चितवन है टेढ़ी बाँकी 
टेढ़ी हाथ धारी टेढ़ी तान सुनावे बांसुरी बाँकी
तन कारो धार्यो अम्बर पीत,अरु गावे मधुर गीत
बातन बतरावे मधुर मधुर क्षण माहि बने मन मीत
सारो भेद खोल्यो मैं तेरे आगे,पहचान बतरायी है
अमित मन-चित हर लेत वो ऐसो ठग जग भरमाई है 
****************************************************************************
कुंवर जी कान्हा के देश  जा रहे थे तो सोचा कि उन्हें वहाँ रहने वाले एक महाठग के बारे में सावधान कर दूँ , जो अपनी बाँकी चितवन से मन हर ले जाता है.

27 टिप्‍पणियां:

  1. @अमित मन-चित हर लेत वो ऐसो ठग जग भरमाई है

    wastav men hai hi esa gajab jadu is thag ki rup adhuri men ki har koi apna sarvasv thaga baithta hai esse. kanha ki rupmadhuri ka raspaan karane ke liye dhanyawad!

    जवाब देंहटाएं
  2. अरे वह अमित जी इतनी सुन्दर रचना. मजा आ गया . बहुत बढ़िया.

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह....

    महा ठग बैठ्यो है धार ग्वाल को भेष....बहुत सुन्दर रचना....

    जवाब देंहटाएं
  4. भाई अमित जी..सुन्दर व आकर्षक प्रस्तुति के लिए बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  5. अमित भाई साहब आपने तो पथिक को रास्ता,मंजिल की पहचान सब बता दी है पर वो तो वैसा ही समझ पायेगा जैसा उसका प्रारब्ध और पुण्य होंगे....

    आपमें तो अपना अनुभव अत्यंत सुन्दर शब्दों में बता दिया....क्या है वो,कैसा है,क्या कर सकता है...जता दिया...

    अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत किया आपने अनुभव,भाव और शब्दों का....

    कुंवर जी,

    जवाब देंहटाएं
  6. टेढ़ी टेढ़ी चाल चले,अरु चितवन है टेढ़ी बाँकी
    टेढ़ी हाथ धारी टेढ़ी तान सुनावे बांसुरी बाँकी

    याद है अमित जब अपन साथ बैठते थे और कोई तुम्हे छेड़ता था तो तुम बोलते थे
    "हम से टेडायी कोई भूल मत करियो भैया हम है उपासी एक टेडी टांग वाले के"
    विपुल से तुम्हारे ब्लॉग कि चर्चा सुनकर आज पहली बार तुम्हारा ब्लॉग देखा. वास्तव में तुम बिलकुल नहीं बदले आज भी वही सही गलत का निर्णय करने वाले ठाकुरजी के निर्मल भक्त हो

    जवाब देंहटाएं
  7. सुन्दर व आकर्षक प्रस्तुति के लिए बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  8. ओ पथिक संभलकर जइयो उस देश
    महा ठग बैठ्यो है धार ग्वाल को भेष

    अजी ऎसे ठगिया से कौन न ठगा जाना चाहेगा....
    मन को तृ्प्त करती हुई सुन्दर रचना.....
    आभार्!

    जवाब देंहटाएं
  9. ओ पथिक संभलकर जइयो उस देश
    महा ठग बैठ्यो है धार ग्वाल को भेष

    अच्छा लिखा है दोस्त ,,,भाषा भी सुन्दर और रोचक लगी

    जवाब देंहटाएं
  10. "सखी पनघट पर , यमुना के तट पर
    भरने जो गई मटकी
    हो गई पागल एक पल में जब
    छवि देखि नटखट की "

    हरे कृष्णा

    जवाब देंहटाएं
  11. are wah amit aaj dikhe ho apne purane asli rang men, bhakti-ras hi tumhara asal roop hai ----

    जवाब देंहटाएं
  12. or aaj to naresh bhi aaya hai tumhari hazri bajane!

    जवाब देंहटाएं
  13. बहुत सुन्दर रचना..अलग सी. बेहद पसंद आई.

    जवाब देंहटाएं
  14. कृष्‍ण नाम सम्‍मोहन:


    बहुत ही सुन्‍दर रचना

    हृदय गदगद हो गया मित्र

    धन्‍यवाद

    जवाब देंहटाएं
  15. कृष्‍ण नाम सम्‍मोहन:

    जवाब देंहटाएं
  16. बहुत ही सुन्‍दर रचना

    हृदय गदगद हो गया मित्र

    जवाब देंहटाएं
  17. सुन्दर ,सावधान कर अच्छा ही किया !

    जवाब देंहटाएं
  18. ओ पथिक संभलकर जइयो उस देश
    महा ठग बैठ्यो है धार ग्वाल को भेष

    अद्भुत .....!!

    जवाब देंहटाएं
  19. Kai dino se koi nayi rachna nahi di bhai sahab
    Hemant

    जवाब देंहटाएं
  20. सुन्दर रचना | ब्रजभाषा का प्रयोग अद्भुत है |

    जवाब देंहटाएं
  21. murli varo karo kanho chanchal chatur chalak .

    odhn pitmbr jal bichaye pathik ko leta fans .

    mat jana us rah batohi o nat khat rah nihare.

    bade bhag ha chaubey tharo jo jal me fasia ja re.

    जवाब देंहटाएं
  22. अमित जी मज़ा आ गया. बचपन मैं दोहे पढता था , वोह आज याद आ गया.

    जवाब देंहटाएं

जब आपके विचार जानने के लिए टिपण्णी बॉक्स रखा है, तो मैं कौन होता हूँ आपको रोकने और आपके लिखे को मिटाने वाला !!!!! ................ खूब जी भर कर पोस्टों से सहमती,असहमति टिपियायिये :)