शनिवार, 20 जून 2020

सूर्य ग्रहण आषाढ कृष्ण अमावस्या रविवार 21 जून 2020

आषाढ कृष्ण अमावस्या रविवार 21 जून 2020 को होने वाला सूर्य ग्रहण उत्तर भारत के कुछ भागों में कंकणाकृति तथा शेष भागों में खंडग्रास दृष्टिगोचर होगा । रविवार को सूर्यग्रहण होने से "चूड़ामणि सूर्यग्रहण" के नाम से कहा जाता है । शास्त्रों में चूड़ामणि सूर्यग्रहण के समय स्नान, दान, जप, पाठ आदि का विशेष महत्त्व बतलाया है । ग्रहण का सूतक जयपुर में दिनांक 20 जून, 2020 ई. को रात्रि 10:15 बजे से आरम्भ होगा । सूतक काल में बालक, वृद्ध व रोगियों को छोड़कर किसी को भी भोजनादि नहीं करना चाहिये ।
ग्रहण के समय सूर्य को देखना, भोजन, शयन, मूत्रादि त्याग, तैलाभ्यंग वर्जित होते हैं । पका अन्न, कटी सब्जी - फल ग्रहणकाल में दूषित हो जाते हैं । अतः उन्हें नहीं खाना चाहिये । घी-तेल में पका अन्न, घी, तेल, दूध, दही, आदि में कुशा रखने से दूषित नहीं होते । ग्रहण काल में मन्त्र जाप विशेष रूप से करना चाहिये ।
जयपुर में ग्रहण का स्पर्श प्रातः 10:15 पर, ग्रहण मध्य 11: 56 पर, ग्रहण मोक्ष 13 : 44 पर होगा ग्रहण का पर्वकाल 03 घंटे 29 मिनट का रहेगा । काल भेद से सभी स्थलों पर ग्रहण का स्पर्श-मध्य-मोक्ष भिन्न भिन्न होता है। अपने अपने स्थानों पर ग्रहण का समय ज्ञात करने हेतु दो लिंक दिए जा रहें है, प्रथम लिंक को खोलकर मानचित्र में अपने स्थान को खोजकर वहाँ क्लिक करने पर प्रथम चित्र के अनुसार समन्वित वैशविक समय अनुसार ग्रहण का स्पर्श-मध्य-मोक्ष समय लिखा दिखाई देगा। तब दूसरे लिंक में अपने स्थान का नाम भरकर पहले लिंक में प्राप्त हुआ UTC वैश्विक समय भरे तो उस स्थान का ग्रहण का स्पर्श-मध्य-मोक्ष समय प्राप्त हो जायेगा।
इस अनुसार ही प्राप्त ग्रहण स्पर्श समय से चार प्रहर पूर्व अर्थात 12 घंटे पहले से सूतक का पालन करें।

1. ग्रहण का स्पर्श-मध्य-मोक्ष समय प्राप्त करने हेतु {समन्वित वैशविक समय} लिंक --https://eclipse.gsfc.nasa.gov/SEgoogle/SEgoogle2001/SE2020Jun21Agoogle.html?fbclid=IwAR1wvzAaXx4uM_mTOor6OYyQEJvoyq0-FKwbv62-rZofU6cThrRBUHmm1JE

2. UTC {समन्वित वैशविक समय} से भारतीय स्थानिक समय परिवर्तन हेतु लिंक ---
https://www.utctime.net/utc-to-ist-indian-converter?fbclid=IwAR0guewiLq6hNKfsI06Zojqk3jNjU2Sl4nMMpOTuIKaxbONtHiF1IG2bALo





मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

श्रीराम आपकी सदा ही जय हो !!





हे महावीर ! आप इस प्रकार अनजान की भांति युद्ध क्यों कर रहे है ?
हे राघव ! अब इस दुरात्मा का नाश कीजिये।

मातिल के रूप में समस्त समुदाय की प्रार्थना को स्वीकार कर इक्ष्वाकु कुल शिरोमणि श्रीराघवेन्द्र ने गुरुदेव अगस्त्य द्वारा प्रदत्त ब्रह्मास्त्र का विधिपूर्वक संधान किया कालाग्नि की भाँति प्रदीप्त पंचमहाभूतांश निर्मित वह बाण चला तो मानो भगवान् भास्कर सूर्यवंश दिवाकर राम की कीर्ति को प्रकाशित करने के लिए उस महाबाण के तेज के रूप में  स्वयं ही अवस्थित हो गए।  वह भास्करवर्चस वज्रसार रामबाण महानाद करता हुआ रावण के लिए साक्षात् यम स्वरुप होकर पापात्मा के वक्ष में जा धंसा और  दुरात्मा की आत्मा को उसकी देह से विलग कर पुनः श्रीराघवेन्द्र की शरण उपस्थित हो गया।
दिग्दिगंत हर्षनाद से गुंजायमान हो उठा,  देवगण पुष्पवर्षा कर समस्त जनो सहित समर पराक्रमी दुर्जेय श्रीरामचन्द्र के समक्ष नतग्रीव हो बोल उठे
हे राघव आपकी जय हो !
हे श्रीरामचन्द्र आपकी जय हो !
हे रिपुञ्जय,  हे स्थिरप्रज्ञ, महाप्रतापी,
रघुकुलराज नंदन श्रीराम आपकी सदा ही जय हो !!


शुक्रवार, 15 जून 2018

श्री "श्रीजी" श्रीराधासर्वेश्वरशरण देवाचार्य जी महाराज

नित्य निकुञ्ज बिहारी श्रीसर्वेश्वर-युगल, श्रीरङ्ग देवी सखी की कुञ्ज में लीलाविहार कर अनन्त सखियों को आनंद प्रदान कर रहे थे। उस नित्य सरस बिहार की सुख भूमि पर भी एक सखी किञ्चित विरह भाव भावित हो एक ओर खड़ी थी। उन सहचरी को इस प्रकार उदास देख अनन्य कृपा मयी श्रीकिशोरी जी ने कहा " हे सखी ! तुम आज इतनी उदास और विरह भाव से पूरित क्यों लग रही हो ?" सखी कुछ न बोली और नेत्रों से झर झर अश्रुपात होने लगा। तब श्रीरंगदेवी जी ने निवेदन किया कि, 
"प्यारीजु ! आप श्रीयुगल ने पूर्वकाल में मुझे भूतल पर त्रिताप दग्ध निज जन का त्राण करके उनको युगल चरण मे पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त करने की आज्ञा प्रदान की थी तब मैंने अपने सुदर्शन-चक्र स्वरुप के तेजांश से निम्बार्क रूप में प्रकट होकर हंस वंश की जो परम्परा स्थापित करी थी उस परम्परा के निर्वहन का दायित्व अब इस प्यारी सखी को कुछ समय संभालना हैं। अतः ये आपके चरणन की चातकी भोली सखी विरह-भाव से दुःखी हो रही हैं।
तब श्रीयुगल दंपत्ति हस पड़े और श्रीलालजू ने कहा की, 
हे भोली सखी ! भूतल पर जो हंस-वंश की सरिता बह रही हैं उसमें तो हम नित्य ही जल-केलि किया करतें हैं, तथा हम दोनो मूर्तिमन्त स्वरुप हो "सर्वेश्वर" नाम से सदा तुम्हारे ही कण्ठ रुपी सिंहासन पर आसीन ​रहेंगे ​ तब यह विरह की भावना क्यों ?
श्रीप्यारे के ऐसे मधुर वचनों से अपने ताप को तिरोहित कर तब वह निजसखी ने श्रीयुगल चरण की आज्ञा को हृदय में धार भू लोक के लिए प्रस्थान किया, संग में कुछ सखियाँ पहुँचाने चली। 
मार्ग में एक सखी ने पूछा बताओ सखी भूलोक में किस स्थान पर अवतरित होवोगी तो रत्नप्रभा सखी ने कहा भारतवर्ष में, तब पहली सखी ने कहा भारतवर्ष में ही क्यों ? 
इसपर रत्नप्रभा सखी ने कहा की, सम्पूर्ण धरा पर एकमात्र भारतवर्ष की भूमि ही परम रम्य हैं जो श्रीयुगल की अति मन भावनी हैं। यह वह पुण्य भूमि हैं जो शास्त्रों-ऋषियों-तथा देवताओं द्वारा भी स्तुत्य हैं तथा वंदना योग्य हैं -

वन्दे नितरां भारतवसुधाम्।
दिव्यहिमालय-गंगा-यमुना-सरयू-कृष्णशोभितसरसाम् ।।
मुनिजनदेवैरनिशं पूज्यां जलधितरंगैरंचितसीमाम् ।
भगवल्लीलाधाममयीं तां नानातीर्थैरभिरमणीयाम् ।।
अध्यात्मधरित्रीं गौरवपूर्णां शान्तिवहां श्रीवरदां सुखदाम् ।
सस्यश्यामलां कलिताममलां कोटि-कोटिजनसेवितमुदिताम् ।।
वीरकदम्बैरतिकमनीयां सुधिजनैश्च परमोपास्याम् ।
वेद्पुराणैः नित्यसुगीतां राष्ट्रभक्तैरीड्याम् भव्याम् ।।
नानारत्नै-र्मणिभिर्युक्तां हिरण्यरूपां हरिपदपुण्याम् ।
राधासर्वेश्वरशरणोsहं वारं वारं वन्दे रम्याम् ।।

​सखी धर्म का केंद्र तथा मुनि-देवजन अभिलाषित यही भूमि हैं - 
वैदिकसंस्कृतिकेंद्रस्वरूपा ​नित्यं विबुधजनैरभिलाष्या ।।

यही एकमात्र भूमि हैं जिसपर अपने परम धर्म में निष्ठ धर्माचार्य निवास करतें हैं तथा इस पवित्र भूमि से अन्य किसी भूमि पे वास करने की सोचते भी नहीं -
धर्माचार्यै धर्मसुनिष्ठै-, नितरां धीरै: परिसन्धेयम्।

और हे सखी ! जिस स्थान पर अध्यात्म्धर्म - पथप्रदर्शक सभी परम आचार्यचरणों द्वारा जागतिक जीवों को अतुलित ज्ञान दिया जाता हैं उस परम सुन्दर भारत वर्ष का ही मैं अभिनन्दन करके अवतरित होउंगी। 

तब पहली सखी ने कहा की हे श्रीयुगल की प्यारी, आपकी सभी बातें समुचित हैं परन्तु भारत वर्ष के इतर अन्य भूमि में भी तो जीव निवास करतें हैं तथा ​उन अज्ञानी बद्ध जीवों के कल्याण की भी तो व्यवस्था होनी चाहिए। उन अज्ञान के तिमिर में अंध हुए बद्ध जीवों को वैष्णव धर्म की शरण में लेने हेतु या तो आप उन्ही देशों में अवतरित होवो अथवा आपकी मनोवाञ्छा अनुरूप भारतवर्ष में अवतरित होकर भी समय समय तद देशों में ज्ञान-भक्ति के प्रचार- प्रसार हेतु उन देशों की भी यात्रा किया करना।

रत्नप्रभा सखी ने गंभीर होते हुए कहा कि, हे सखियों ! आप लोग मेरी बात सुनिए ऐसा नहीं हैं की भारतवर्ष से इतर देश के निवासी ज्ञान पाने योग्य नहीं हैं। परन्तु जैसे पृथ्वीतल समस्त विश्व के सभी जनों के लिए शान्ति और सुख का विस्तार करता है ठीक वैसे ही 
"एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्र जन्मन:।
स्वं स्वं चरित्रां शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्व मानवा :।" मनुस्मृति वचनानुसार इस भारतवर्ष से नित्य सत्प्रेरणा (मार्गदर्शन) भी हुआ करता है।

शान्तिं सुखम भुवि तनोति यथा जनेभ्य:, 
सत्प्रेरणामपि करोति तथैव नित्यम्। 
एतादृशं निखिलदानपरं प्रसिद्धं, 
वन्दे च तं रुचिरभारतवर्षदेशम् । ।

हे सखियों ! जीव के निजकर्मानुसार ही उनका यथा स्थान जन्म होता हैं। महान पुण्यों के उदय स्वरुप ही इस भारत भूमि पर जन्म होता हैं जिससे की वह यहाँ विराजमान धर्माचरण निरत आचार्यों के शीघ्र शरणागत हो अपने उद्धार के मार्ग पर दृढ हो सके। तथा प्रारब्ध वश जिनके पापकर्म भौतिक भोगों का फल शेष हैं वे पुण्यमयी भारतभूमि से अन्य देशों में जन्म लेते हैं। परन्तु संस्कारवश उनमें भी जिनका पुण्योदय हुआ हैं वे स्वयं ही इस भूमि की शरण लेकर इस भारतवर्ष में आकर शास्त्र सम्मत आध्यात्मिक धर्म की शिक्षा एवं यहाँ के निवासियों के आचरण से सत्प्रेरणा प्राप्त करते हैं -
देशा: समग्रा: श्रुतिधर्मशिक्षां 
सम्प्राप्नुवन्तींति महामहत्वम् ।
सत्प्रेरणां शास्त्रयुताञ्च यस्मात् 
तं भारतं नौमी सुभव्यरूपम् । ।

उन मुमुक्षुओं शरणागत जनों को यहाँ आश्रय प्राप्त होता हैं -
सदाSSश्रयो वै शरणागतानां

इस लिए हे सखियों ! शास्त्रानुमोदित इस पवित्र भारतवर्ष की रम्य भूमि पर ही मैं अवतरित होउंगी क्योंकि शास्त्र में जो निर्देश किया हैं वही करना परम कर्तव्य हैं। जीवों के लिये इस भूमि की संस्कृति तथा परम्परा ही परम सेवनिय है, इतर राष्ट्रों की सभ्यता एवं संस्कृति का सर्वथा परित्याग ही परम आवश्यक हैं -

युवकै मुख्यतो देशे सेवनियाSSत्मसंस्कृति: ।
हातव्ये परराष्ट्राणां सभ्यता - संस्कृति सदा । ।
शास्त्रविधि न हातव्यो यः सर्वमङ्गलप्रद: ।
तद्राहित्येन हानि: स्यादित्यत्र नास्ति संशय: । ।

यह सुस्थापित विधि हैं की इस पवित्र भारतभूमि का नित्य सेवन ही मङ्गलकारी हैं, अन्य पाश्चात्य मलेच्छ देशों के पथ की ओर तो भूलकर भी नहीं देखना चाहिए क्योंकि उस भूमि का वातावरण एवं वहाँ उपजी संस्कृति असेवनिय हैं - 
पाश्चात्यपथमादायाSचरन्ति ये जना द्रुतम ।
​भवन्तु सावधानास्ते तिष्ठन्तु स्वीयसंस्कृतौ । ।

तथा हे सखियों ! तपश्चर्या से जिनका उज्जवल स्वरुप परम पुण्य रूप है, ऐसे परम आस्थावान धर्मतत्वेत्ता हमारी सखी स्वरूपा आचार्यगण द्वारा निर्दिष्ट सुखप्रद जो मार्ग हैं वही हम सभी के लिए परम अनुसरणीय हैं। चूँकि भारत से इतर भूमि मलेच्छ भूमि हैं तो त्याज्य हैं क्योंकि बुद्धिमान व्यक्तियों का कर्त्तव्य हैं की वे दुस्सङ्ग का सर्वथा त्याग करदें तथा पवित्र सत्संग में ही स्वयं को प्रवृत करें। सर्वदा सर्वेश्वर श्रीहरि की उपासना तथा उन्ही का मङ्गलमय चिंतन अपने जीवन का कर्तव्य समझें। भारतवर्ष से इतर भूमि में श्रीसर्वेश्वर प्रभु की सेवा का लोप हो जाता हैं - 
पूर्वजानां दृढ़ाSSस्थानां धर्मतत्वविदां सताम् । 
तपसोज्ज्वलपुण्यानां ग्राह्यो मार्गः सुखप्रदः । ।
दुस्सङ्ग सर्वथा त्याज्य: संसेव्या साधुसङ्गति: । 
अभिज्ञै नितरां लोकै: कर्तव्यमात्मचिन्तनम् । ।

श्रीरत्नप्रभा सखी द्वारा इस प्रकार शास्त्र ज्ञान पूरित वाणी द्वारा उन सखियों ने श्रीभारतवर्ष की पुण्य भूमि को नमन किया तथा कहा कि, हे श्रीयुगल की लाड़ली सखी आप सत्य ही भारत धरा पर अवतीर्ण होवो तथा वहां बद्ध एवं मुमुक्षु जनों के अज्ञान का निवारण कर हंस वंश के संतों की ज्ञान गङ्गा में डुबकी लगवाकर उन्हें श्रीयुगल चरणों की ओर उन्मुख क्र उनके चित्त को शांत करों तथा विधिवत धर्म की मर्यादा दृढ कर शीघ्र ही अपने इस सखी स्वरुप को पुनः प्राप्त कर नित्यनिकुञ्ज में श्रीयुगल के सरस बिहार को निहार अमित आनंद लूटो।

तब रत्नप्रभा सखी ने भूतल पर भारतवर्ष के पुष्कर क्षेत्र के समीप अत्यंत पवित्र स्थान श्रीनिम्बार्क तीर्थ में अवतार ग्रहण किया तथा अपने यथा समयानुरूप लीला का प्रदर्शन करते हुये ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया विक्रम सम्वत २००० के मङ्गल दिन श्रीमन्निखिलमहीमण्डलाचार्यचक्रचूड़ामणि, सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र, स्वाभाविक द्वैताद्वैत प्रवर्तक, यतिपतिदिनेश, राजराजेंद्र समभ्यर्चित-चरणकमल, श्रीसुदर्शन चक्रावतार श्रीरंगदेवी स्वरुप श्रीभगवन्निम्बार्काचार्य की पावन परम्परा में श्रीसर्वेश्वर प्रभु को अपने कंठसिंहासन में धारण करने वाले अड़तालीसवें आचार्य रूप में श्री "श्रीजी" श्रीराधासर्वेश्वरशरण देवाचार्य जी महाराज​ ​ के नाम से प्रतिष्ठित हुये। 


आपश्री ने अपने आचार्यत्व में धर्मपालन तथा आचार निष्ठा की जो पराकाष्ठा दिखलाई हैं वह आज आचार्य की रहनी करनी के एकमात्र उदहारण के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। 
आपश्री के इस अनिर्वचनिय जगद्गुरुत्व को आज पंचसप्तति (पच्चत्तर- 75) वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। आपश्री की शरणागति प्राप्त कर हम बद्ध जीव श्रीयुगल चरणों के चरणामृत पान के अधिकारी हो सके हैं यह आप ही का चमत्कार हैं अन्यथा हम जैसे जीवों का उद्धार किस विध संभव हैं।

जै जै आप की कृपा का वर्षण ही हमारे दग्ध हृदयों को शान्त करने वाला हैं, हमारे लिए अन्य कोई अवलम्ब नहीं।

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​​लेख में प्रयुक्त संस्कृत श्लोक श्रीजी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ "भारत भारती वैभवं " से लिए गए हैं।

गुरुवार, 10 मई 2018

जो मनुष्य शास्त्रों का ​अनुसरण नहीं करते ​हैं ​उन ​अशुद्ध चित्त वालों को नष्ट ही जानों।

श्रीसर्वेश्वर श्रीकृष्ण गीताजी के तीसरे अध्याय के बत्तीसवें श्लोक में कहते हैं -
​जो मनुष्य मेरे इस मतमें दोषदृष्टि करते हुए ​ शास्त्रों का ​अनुसरण नहीं करते ​हैं ​उन ​अशुद्ध चित्त वालों सर्व कर्म से अनभिज्ञों को नष्ट ही जानों। ​!!३२!!

​तब अर्जुन का प्रश्न होता हैं - यदि ऐसी बात है जैसा की आप कहते हैं तो सब शास्त्रों से प्रतिपादित आपके मत के अनुकूल लोग क्यों नहीं चलते हैं ? शास्त्र की आज्ञा के प्रतिकूल क्यों चलते हैं ?

इस प्रश्न का उत्तर देते हैं :-
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।। 3.33।। ​

​इसका मंतव्य विस्तृत रूप में जगद्विजयी श्रीकेशवकाशमीरी भट्टदेवाचार्यजी स्पष्ट करते हुये अपने भाष्य में लिखतें हैं ​:-

​पूर्व जन्मों में किये गए कर्मों के गुणों के अनुकूल शुभ और अशुभ कर्मों के संस्कार से इस जन्म में प्रकट हुआ जो स्वभाव होता हैं उसी को प्रकृति कहते हैं। वेद, स्मृति, पुराण के शब्दार्थ का जानने वाला भी इस अपनी प्रकृति के अनुकूल ही चलता हैं। अर्थात जैसी उसकी प्रकृति है वैसा ही कर्म करता है, तो फिर मूर्खों के विषय में क्या कहना हैं ( कौन बात चलावे) ? वे तो अपनी प्रकृति के अनुकूल चलेंगे ही। इसलिए जीवमात्र अपनी प्रकृति के वश में है। ऐसी दशा में निग्रह अथवा शास्त्र की आज्ञा क्या कर सकती हैं ? भाव यह है कि अनादि विषय वासना से दूषित चित्त वालों की सर्व कामना त्याग पूर्वक मुझ में कर्म अर्पण करने वाली बुद्धि नहीं होती हैं।

​तब शंका हो सकती हैं कि , यदि सब कोई प्रकृति के वश में है और कोई उससे रहित अथवा स्वतंत्र नहीं हैं तो गुरु और शास्त्र का उपदेश व्यर्थ हुआ

इस शंका उत्तर भगवान् इस प्रकार देते हैं :-
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ।।3.34।।

उसे श्रीआचार्यचरण अपने भाष्य में समझाते हैं :-
आँख कान आदि ज्ञानेन्द्रियों का वाक् आदि कर्मेन्द्रियों का अपने अपने शब्दादि विषयों में और वचनादि कर्मों में रागद्वेष स्वभाव से ही सिद्ध है। अर्थात अपने अनुकूल कोमल मीठे आदि वस्तुओं में राग वा प्रेम और अपने प्रतिकूल कठिन आदि वस्तुओं से द्वेष वा क्रोध स्वभाव से ही अर्थात प्राचीन वासना के अनुसार सबको होता हैं। गुरु और शास्त्र का उपदेश यही हैं कि इन रागद्वेषों के वश में मनुष्य को नहीं होना चाहिए। क्योंकि ये रागद्वेष, सर्वस्व हरण करने वाले चोर के ऐसा, मुमुक्षु पथिक को भ्रष्ट जान, भक्तिरूप मोक्ष के मार्ग से गिराते हैं, और विषय प्राप्ति साधन रूप बुरे रास्ते में ले जाकर के और उसमें आसक्ति पैदा करके मोक्ष के साधन रूप सर्वस्व का हरण करते हैं। जिस प्रकार राज सैनिक राह चलने वाले को चोर के वश में देख उसको मुक्त कराकर सही मार्ग बताते हैं, उसी प्रकार शास्त्र और आचार्य का उपदेश मोक्षार्थी को राग-द्वेष से हटाकर सर्वेश्वराधन रुपी मार्ग में लगता हैं। इसलिए गुरु और शास्त्र का उपदेश व्यर्थ नहीं हैं। ​

​तब शंका हो जाये की किसी भी व्यक्ति से रागद्वेष नहीं करना इस आज्ञा के परिपालनार्थ युद्धादि कर्म एवं कर्तव्य नियत कर्म आदि क्यों किये जाएँ ? 
ऐसी शंका के निवारणार्थ ​भगवान् कहते हैं :-
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।। 3.35।। ​

​भाष्य :- 
अपने वर्णाश्रम का शास्त्र विहित धर्म कर्म गुण वाला होने पर अथवा उसका सांगोपांग आचरण न बनने पर भी पूर्ण रूप से और सुचारु रीति से प्रतिपालित दूसरे वर्णों के विहित धर्म से अधिक श्रेष्ठ है। इसलिए अपने धर्मों में स्थित रहकर मरना भी दूसरे धर्म में रहकर जीने से श्रेष्ठ है। इसका कारण यह है कि दूसरे का धर्म भय देने वाला है क्योंकि दूसरे के धर्म में रुचि, पाप ही के समान नरक में पहुँचाने वाली है। शास्त्र भी कहता है :-
"पर्युदस्तो हि यो यस्माच्छास्त्रीयादपिकर्मणः।। 
​न स तत्राधिकारी स्याद्दानादौ दीक्षितो यथा ​ ।। "
​अर्थात जैसे जो पुरुष शास्त्रसम्मत कर्म से हट जाता है वह दीक्षित भी हो तो भी दानादि किसी भी कर्म में अधिकारी नहीं हो सकता। ​

रविवार, 1 अप्रैल 2018

॥ श्रीमत्सुदर्शनचक्रावतारभगवन्निम्बार्कप्रणीता वेदान्तदशश्लोकी

॥ वेदान्तदशश्लोकी ॥

ज्ञानस्वरूपञ्च हरेरधीनं शरीरसंयोगवियोगयोग्यम् ।
अणुं हि जीवं प्रतिदेहभिन्नं ज्ञातृत्ववन्तं यदनन्तमाहुः ॥ १॥

जीव ज्ञान स्वरूप हैं और हरि के अधीन हैं। यह शरीर के संयोग और वियोग के योग्य हैं। यह अणु परिमाण वाला हैं। प्रत्येक देह में भिन्न और ज्ञाता जीव को श्रुतियाँ तथा महर्षिजन अनन्त कहते हैं।

जीव ज्ञान स्वरूप हैं। ज्ञान स्वाभाविक चैतन्य, नित्य एवं स्वयं ज्योति हैं। जिस प्रकार लवण बाहर व भीतर से रसमय हैं उसी प्रकार यह ज्ञान भी सब ओर से हैं। जैसे जलमय भी समुद्र जल का आधार हैं, वैसे ही जीव ज्ञान का आश्रय हैं। अतः यह "अहम" के अर्थ के रूप में ज्ञाता, कर्ता और भोक्ता भी हैं। ज्ञान धर्म हैं। ज्ञात धर्मी हैं। धर्म और धर्मी का अविनाभाव संबंध होता हैं। जिस प्रकार सूर्यप्रभा सूर्य से पृथक नहीं रह सकती, उसी प्रकार धर्म व धर्मिरूप ज्ञानत्व व ज्ञातृत्व का भी अविनाभाव संबंध हैं। ज्ञाता ज्ञान से प्रकाशित होता हैं। देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और प्राण से विलक्षण यह जीव श्रीहरि के अधीन हैं। अतः सभी क्रियाकलापों में परतंत्र हैं। परिमाण में अणु अतीन्द्रिय, शरीर के साथ संयोग व वियोग के योग्य, प्रतिदेह में भिन्न और अनन्त जीव हैं। ऐसा वेदान्त वाक्य व महर्षिजन उपदेश करते हैं।

॥ श्रीमत्सुदर्शनचक्रावतारभगवन्निम्बार्कप्रणीता
वेदान्तदशश्लोकी - प्रथम श्लोक ॥

रविवार, 13 अगस्त 2017

कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् - 3




पिछली कड़ी में श्रीभगवान के अवतार प्रकारों को समझकर यह मत निश्चित होता हैं कि -
"कृष्णस्तु भगवान् स्वयं " 
सत्य ही हैं।
तो अब आगे जिज्ञासा होती हैं कि उनका अवतरण कैसे होता हैं। उनकी देहादि भी क्या पंचभौतिक होती हैं। और उनका अवतरित स्वरुप नित्य हैं अथवा अनित्य। सबसे पहले तो इन प्रश्नों का उत्तर हमें आपस में ना पूछकर स्वयं श्रीभगवान से ही पूछना चाहिए।  और पूछना भी क्या हैं वे तो स्वयं बता दिए हैं -
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्‌ । 
                  प्रकृतिं  स्वामधिष्ठाय  सम्भवाम्यात्ममायया ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता 4/6)
मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ। 

अवतरण कैसे होता हैं के लिए बताते हैं - "जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं"
अपने स्वरूप में पंचभौतिक कल्पना के लिए भी स्वयं ही निरूपण करतें हैं -
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् |
                      परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्र्वरम् || (श्रीमद्भगवद्गीता 9/11)
मूर्ख लोग मेरे संपूर्ण प्राणियों के महान ईश्वरूप परमभाव को न जानते हुए मुझे मनुष्य शरीर के आश्रित मानकर अर्थात साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं।

चूँकि वे सर्वेश्वर हैं, सर्वसमर्थ हैं इस लिए यह कहना की परमात्मा तो निर्गुण-निराकार हैं, वह मनुष्य अथवा किसी भी रूप में कैसे जन्म ले सकता हैं तो ऐसा कहना हमारी ही मूर्खता हैं।  हम स्वयं ही उनकी सर्वव्यापकता, सर्वसमर्थता पर प्रश्नचिन्ह लगते हैं।  श्रीभगवान विरूद्धधर्माश्रय हैं।  यदि उनमें विरूद्धधर्माश्रय नहीं होगा तो वे पूर्णब्रह्म कैसे सिद्ध होंगे।  श्रीभगवान में देह जन्मादि विकार मानना ही असंगत हैं।  क्योंकि देहादि के विकार त्रैगुण्य के अंतर्गत हैं और ये त्रिगुण भगवान् के आधीन हैं। फिर जो विरूद्धधर्माश्रय की निष्पत्ति जो बताई हैं वह इस प्रकार हैं की वे -
 अणोरणीयान् महतो महीयान्। (कठ० 1/2/20)
‘वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और महान से भी महान है।’

आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः। (कठ० 1/2/21)
'बैठा हुआ ही दूर चला जाता है, सोता हुआ ही सब ओर चला जाता है।'


श्रीनिम्बार्काचार्य अपनी वेदान्त कामधेनु दशश्लोकि में नियंता तत्व को बताते हुए कहते हैं -
स्वभावतोSपास्त-समस्तदोष-मशेषकल्याणगुणैक-राशिम् । 
व्यूहांगिनं ब्रहृम परं वरेण्यं, ध्यायेम कृष्णं कमलेक्षणं हरिम् ।।


जो स्वभाव से ही समस्त  दोषों से रहित हैं और जो समस्त गुणों का पुंज हैं।
इस वाक्य से ही सिद्ध हैं कि वह परमब्रह्म स्वभावतः ही दोष रहित हैं, जिससे आत्मा का अपकर्ष हो वह दोष कहलाते हैं। पंचक्लेश, षड्विकार, प्राकृत सत-रज-तम आदि गुण तथा उन गुणों से अन्य अनंत दोष जो हैं, उनसे वह नियंता तत्व शुद्ध हैं।
यह जो  "निर्गुणं निष्क्रियं निर्मलं निरवद्यं निरञ्जनं"  उस अविनाशी तत्व के लिए कहा जाता हैं, इस वाक्य की सिद्धि भी उक्त वर्णन से ही होती हैं, परंब्रह्म को प्राकृत हेय गुणों से रहित होने के कारण "निर्गुण" कहा जाता हैं।  श्रुति कहती हैं -
"य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्प: परः पराणां सकला न यत्र क्लेशादय: सन्ति परावरेशे" 

इसलिए जो नित्यों का भी नित्य हैं, चेतनों का भी चेतन हैं और अकेले ही सबकी कामनाओं को पूर्ण करता हैं उन देवताओं के भी परमदेव,स्वामियों के भी स्वामी, परात्पर भुवनों के ईश्वर, सबके उपासनीय परमात्मा को हम जानतें हैं। न तो उनका कोई कार्य हैं और न करण ही -
"नित्यो नित्यानां चेतनश्वेतनानामे को बहूनां यो विदधाति कामान्, तं देवतानां परमं च दैवतं,पतिं पतीनां परमं परस्ताद्‌विदाम देवं भुवनेशमीड्यम्‌, न तस्य कार्यं करणं च विद्यते।"

उस स्वभाव से ही समस्त दोषों से रहित, समस्त कल्याणादि गुणों की राशि, वासुदेव-संकर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध नामक चतुर्व्यूह के अङ्गी परं ब्रह्म स्वरूप, कमल के समान नेत्रों वाले, सबके मन को हरण करने वाले वरेण्य श्रीकृष्ण का हम ध्यान करें।

श्रीकृष्ण का हम ध्यान करें जो हमारे मन का हरण करते हैं। हरण करना अर्थात आकर्षित करना।  हम आकर्षित उधर ही होते हैं जिसमें हमें आनंद प्राप्ति हो, रस प्राप्ति हो। श्रुति कहती हैं -
 "रसो वै सः। रसँ ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति"
अतः वह रस:स्वरुप आनंदस्वरूप परंब्रह्म जीव को नित्य अपनी ओर आकर्षित करता हैं, और वे परंब्रह्म हैं
"कृष्णस्तु भगवान् स्वयं"

#कृष्णं_सर्वेश्वरं_देवमस्माकं_कुलदैवतम्‌
क्रमश:

रविवार, 6 अगस्त 2017

कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् - 2


"कृष्णाख्यं परं ब्रह्म"  यह कृष्ण परम ब्रह्म हैं जो सब का  अधिष्ठान हैं वह परमात्मा परम ज्योति, चेष्टा रहित, निर्गुण और विभु हैं। इन्ही श्रीकृष्ण की ब्रह्म रूपात्मिका शक्ति से गुणात्मक पुरुष नामक शक्ति का आविर्भाव होता हैं जिन्हे "प्रधानेश" कहते हैं। इस प्रधानेश नामक शक्ति से महाविष्णु व्यक्त होते हैं जो हिरण्यगर्भ नाम से विख्यात हैं।
यही हिरण्यगर्भ महाविष्णु महाविराट रूप से व्यक्त हैं जिनसे अनंत विराट और अनंत विराटों की अभिव्यक्ति शेषशायी श्रीनारायण और शेषशायी नारायण का शक्ति विस्तार श्रीविष्णु के रूप में प्रकट होता हैं।
इन सभी शक्ति रूपों के आश्रय  जो स्वयं सर्वैश्वर्य युतः साक्षात सर्वमाधुर्यवान सर्व गुण-अगुण विवर्जित परमब्रह्म श्रीकृष्ण ही निज संकल्पपूर्वक भक्तजनाधीन अपने अवतार विग्रहों को प्रकट करतें हैं।

अवतार तीन प्रकार के हैं -
१. लीलावतार
२. पुरुषावतार
३. गुणावतार

प्रथम लीलावतार के चार भेद हैं -
अ. आवेशावतार
ब. प्रभावतार
स. विभवावतार
द. स्वरूपवतार

अ. आवेशावतार की दो अभिव्यक्ति हैं
१. स्वांशावेशावतार (कपिल, परशुराम आदि )
२. शक्त्यावेशावतार  ( सनकादिक, नारद, पृथु,  आदि)
ब. प्रभावतार में - हंस, ऋषभ, धन्वन्तरि, मोहिनी, व्यास आदि हैं।
स. विभवावतार में - मत्स्य, कूर्म, नर-नारायण, वराह,  हयग्रीव, पृष्णीगर्भ, बलभद्र आदि हैं।
द. स्वरूपावतार में सर्वाधिक ऊर्जा का संचार होता हैं।   नृसिंह, राम, कृष्ण स्वरूपवतार हैं।

श्रीनृसिंह स्वरूपावतार होते हुये भी पूर्णावतार नहीं हैं।

फिर पूर्णावतार कौन हैं ?
पूर्णावतार तो एक श्रीकृष्ण ही हैं।

ऐसे कैसे ? श्रीराम भी तो स्वरूपावतार हैं उनकी गणना कहाँ गई ??
अरे भैया !  श्रीराम-कृष्ण में भेद मान रहे हो इसलिए ऐसा पूछ रहे हो :)
श्रीराम-कृष्ण तत्वतः स्वरूपतः एक ही हैं, दोनों में कोई भेद ही नहीं हैं।

श्रीमद्भागवत में श्रीराम के लिए आया हैं -
" तस्यापि भगवानेष साक्षाद ब्रह्ममयो हरिः।
   अंशांशेन  चतुर्धागात  पुत्रत्वं   सुरै : ।।
साक्षात श्रीभगवान ही अपने अंशों -भरत-लक्ष्मण-शत्रुघ्न  सहित श्रीराम के रूप में प्रकट हुए।
यहाँ  "भगवानेष साक्षाद" की समानता "भगवान् स्वयं" से हैं तो जब कहा जाता हैं कि - "कृष्णस्तु भगवान् स्वयं" तो यह घोषणा श्रीराम-कृष्ण दोनों के लिए हैं।
कृष्णोपनिषद कहती हैं -
यो रामः कृष्णतामेत्य सार्वात्म्यं प्राप्य लीलया।
अतोशयद्देवमौनिपटलं   तं       नतोSस्म्यहम ।।

इस लिए श्रीराम-कृष्ण के नाम से  परं ब्रह्म स्वयं की प्रकटते हैं तथा अन्यावतार उनके अंश कला आदि हैं जिनमें कल्पभेदादि से शक्तिसंचार की न्यून्याधिकता होती हैं।

                                         "एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्"

#कृष्णं_सर्वेश्वरं_देवमस्माकं_कुलदैवतम्‌
क्रमश:








गुरुवार, 3 अगस्त 2017

कृष्णस्तु भगवान् स्वयं - 1



आज पवित्रा एकादशी की आप सभी को मङ्गल बधाई !
प्राणधन योगेश्वर श्रीकृष्ण के जन्ममहोत्सव में 12 दिन शेष हैं। श्रीकृष्ण के वाङ्ग्मय स्वरुप श्रीमद्भागवत में भी बारह स्कंध हैं। जिसमे श्रीकृष्ण के अवतार लीलाओं के बहाने से भक्ति-ज्ञान-वैराग्य की स्थापना की गई हैं। 
श्रीमद्भागवत घोषणा करती हैं - "कृष्णस्तु भगवान् स्वयं"  
इस सूत्र को आगे पकड़ेंगे परन्तु पहले एक धारणा को मार्जित करना हैं। धारणा यह कि श्रीकृष्ण का प्राकट्य कंस के कारागृह में हुआ। कारागृह नाम से हमारे मन में छवि आती हैं एक साधारण कमरें की जिसकी तीन दीवार हैं ऊपर एक छत, एक दीवार में छोटा सा उजाल-दान और चौथी दीवार के स्थान पर लौहे के सरियों से बना द्वार।  ऐसा एक कमरा या ऐसे कमरों का समूह, कारागार और वहां सुरक्षा प्रहरी जेलर यह एक कारागृह की वास्तविक स्थिति हैं। 

अब ऐसी स्थिति में सभी के मन में कौतुक अवश्य जागता हैं की इस प्रकार सबके सामने वसुदेव-देवकी कैसे संसर्ग करते होंगे और क्यों करते होंगे ?
कई कालनेमि उपहास पूर्वक कहते हैं - "देवकी-वसुदेव भी पक्के धुनी थे, और कारागार में वी.वी.आई.पी. ट्रीटमेण्ट था।
जेल में आठ आठ बच्चे पैदा कर लिये । कमाल है। और मानो कंस मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष भी था, वसुदेव को जेल में भी यौनाचार की सुविधा दे दी।​"

साधारण जन की कौतुक जिज्ञासा तथा अपने को ही वास्तविक ब्रह्मज्ञान के अधिष्ठाता कहने वाले अभिमानी ​ कालनेमि लोगों का प्रलाप सहज ही हैं।  क्योंकि साधारण जन दुर्भाग्य से मूल ग्रंथों का वास्तविक अध्ययन नहीं करते और कालनेमि अध्ययन करके वास्तविकता छिपाकर वितण्डा फैलाते हैं। 
कालनेमि के बारे में भली भाँति जानते ही आप, वह राक्षस आञ्जनेय को पथ से विचलित करने के लिए साधु रूप धारण कर बैठ गया।
लेकिन ऐसे लोगों का भांडा जल्द ही फूटता हैं।
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥
उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥​

​कालनेमि अपनी गति पाएंगे परन्तु हम साधारण जन तो एक प्रयास अपने  ग्रंथों को ​मूल​ से देखकर समझने का कर ही सकते हैं। ​
​कथा अनुसार वसुदेवजी विवाह करके अपने घर आने के लिए नवविवाहिता स्त्री देवकी के साथ रथ पर सवार हुए।  उग्रसेन का पुत्र अपनी चचेरी बहन के वात्सल्य वश स्वयं उनके रथ का सारथ्य करने लगा।  मार्ग में आकाश वाणी द्वारा ये बताने पर कि देवकी का आठवाँ पुत्र तेरा काल होगा तो वह देवकी की हत्या करने लगता हैं तब वसुदेव जी यह कहकर कि "इसके पुत्रों से ही तुम्हें भय हैं तो मैं इसके सारे पुत्र तुम्हें समर्पित करूँगा। " तब वसुदेव जी के वचन को मानकर कंस ने उन्हें जाने दिया। 

​वासुदेव-देवकी जी भी प्रसन्नतापूर्वक अपने घर गये - 
"वसुदेवोऽपि तं प्रीतः प्रशस्य प्राविशद्गृहम्​"​​​ ​​भा० १०/०​१/५​५ ​ ​
​तदन्तर समयानुसार प्रथम पुत्र उत्पन्न होने पर वसुदेवजी उस "कीर्तिमान" नामक पुत्र को ले जाकर कंस को सौंप दिया।  इस सत्यनिष्ठा से प्रसन्न कंस ने यह सोचकर कि काल तो आठवाँ होगा उस बालक को लौटा दिया। वसुदेवजी बालक को लेकर घर आ तो गए परन्तु उन्हें उस पर विश्वास नहीं हुआ।  उसी समय अस्थिर मति कंस ने तुरंत उन दोनों को अपने ही घर में  बंदी बना दिया। और उनके जो पुत्र उत्पन्न होने लगे उन्हें अपनी मृत्यु का कारण मानकर एक एक को मारने लगा --

देवकीं वसुदेवं च निगृह्य निगडैर्गृहे। 
                               जातं जातमहन्पुत्रं तयोरजनशङ्कया । । ​ ​भा० १०/०​१/६६ ​ 

​कंस जब देवकीजी के छः पुत्रों की हत्या कर चुका और सातवें गर्भ को यथाविधि संकर्षित कर रोहिणीजी गर्भ में स्थापित कर दिया गया तब समय आने पर भक्तों को अभय देने वाले भगवान्, वसुदेव के मन में प्रविष्ट हो वसुदेवजी द्वारा देवकीजी में स्थापित हुये। 

जैसे घड़े के भीतर दीपक की सुंदर ज्योति और ज्ञान छुपाने वाले मनुष्यों के मन में जैसे ​ज्ञान छिपा रहता हैं वैसे ही देवकी  घर में बंदी थी - 
"भोजेन्द्रगेहेऽग्निशिखेव रुद्धा सरस्वती ज्ञानखले यथा सती" ​भा० १०/०​२/१९ 

​एक दिन कंस देवकी के प्रकाश से उस घरको प्रकाशित देखकर कहने लगा कि, निश्चय  ही मेरे प्राणों का नाश करने वाला विष्णु ही इसके गर्भ में प्रकट हुआ हैं।  क्योंकि पहले कभी ​देवकी के प्रकाश से यह घर  ऐसा प्रकाशित नहीं हुआ।" - - 
 तां वीक्ष्य कंसः प्रभयाजितान्तरां
विरोचयन्तीं "भवनं" शुचिस्मिताम्
आहैष मे प्राणहरो हरिर्गुहां
                             ध्रुवं श्रितो यन्न पुरेयमीदृशी   भा० १०/०​२/२० 

​श्रीकृष्ण के प्राकट्य के बाद वसुदेवजी भगवान् को गोकुल में नंदराय जी के यहाँ पहुंचा कर उनकी कन्या को लेकर पुनः "घर" में प्रवेश किया - 
सुतं यशोदाशयने निधाय तत्
                               सुतामुपादाय "पुनर्गृहानगात्"  भा० १०/०३/५१  ​ 

श्रीमद्भागवत के इन वर्णनों से स्पष्ट हैं की  श्रीकृष्ण का प्राकट्य साधारण कारागार नहीं हुआ था। अपितु घर को ही कारागृह का रूप दिया गया था।  श्रीवसुदेव - देवकी घर में ही बंदी थे उन्हें साधारण बंदियों की भाँती कारागार में नहीं डाला गया था।  वे अपने घर से बाहर नहीं निकल सकते थे।  घर से भी किसी प्रकार भाग ना निकलें इसलिए बेड़ी बंधन भी था। इसके आलावा निजगृह में थे यही सबसे बड़ा सुख था। 
तो इस शंका का कोई स्थान नहीं हैं कि वसुदेव-देवकी ने कारागृह में सबके सामने कैसे आठ संतान पैदा कर डाली। 
अपने ग्रंथों को पढ़िये मूल समझिये तब ऐसी शंका दिमाग में घर नहीं करेगी तथा कालनेमियों के प्रभाव से भी बच पाएंगे। 

बोलिये वसुदेव-देवकी नंदन सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण की जय !!!!!

''कृष्णं सर्वेश्वरं देवमस्माकं कुलदैवतम्'' 


शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017








॥ वेदान्तदशश्लोकि ॥

ज्ञानस्वरूपञ्च हरेरधीनं शरीरसंयोगवियोगयोग्यम् ।
अणुं हि जीवं प्रतिदेहभिन्नं ज्ञातृत्ववन्तं यदनन्तमाहुः ॥ १॥

आनादिमायापरियुक्तरूपं त्वेनं विदुर्वै भगवत्प्रसादात् ।
मुक्तञ्च बद्धं किल बद्धमुक्तं प्रभेदबाहुल्यमथापि बोध्यम् ॥ २॥

अप्राकृतं प्राकृतरूपकञ्च कालस्वरूपं तदचेतनं मतम् ।
मायाप्रधानादिपदप्रवाच्यं शुक्लादिभेदाश्च समेऽपि तत्र ॥ ३॥

स्वभावतोऽपास्तसमस्तदोषमशेषकल्याणगुणैकराशिम् ।
व्युहाङ्गिनं ब्रह्म परं वरेण्यं ध्यायेम कृष्णं कमलक्षेणं हरिम् ॥ ४॥

अङ्गे तु वामे वृषभानुजां मुदा विराजमानामनुरूपसौभगाम् ।
सखिसहस्त्रैः परिसेवितां सदा स्मरेम देवीं सकलेष्टकामदाम् ॥ ५॥

उपासनीयं नितरां जनैः सदा प्रहाण्येऽज्ञानतमोऽनुवृत्तेः ।
सनन्दनाद्यैर्मुनिभिस्तथोक्तं श्रीनारदयाखिलतत्त्वसाक्षिणे ॥ ६॥

सर्वं हि विज्ञानमतो यथार्थकं श्रुतिस्मृतिभ्यो निखिलस्य वस्तुनः ।
ब्रह्मात्मकत्वादिति वेदविन्मतं त्रिरूपताऽपि श्रुतिसुत्रसाधिता ॥ ७॥

नान्या गतिः कृष्ण पदारविन्दात्सन्दृश्यते ब्रह्मशिवादिवन्दितात् ।
भक्तेच्छयोपात्तसुचिन्त्यविग्रहाचिन्त्यशक्तेरविचिन्त्यसाशयात् ॥ ८॥

कृपास्य दैन्यदियुजि प्रजायते यया भवेत्प्रेमविशेषलक्षणा ।
भक्तिर्ह्यनन्याधिपतेर्महात्मनः सा चोत्तमा साधनरूपिका परा ॥ ९॥

उपास्यरूपं तदुपासकस्य च कृपाफलं भक्तिरसस्ततः परम् ।
विरोधिनो रूपमथैतदाप्ते ज्ञेर्या इमेऽर्थाऽपि पञ्चसाधुभिः ॥ १०॥

॥ इति श्रीमत्सुदर्शनचक्रावतारभगवन्निम्बार्कप्रणीता
वेदान्तदशश्लोकी ॥

सोमवार, 14 नवंबर 2016

श्रीनिम्बार्काचार्य



श्रीभगवन्निम्बार्काचार्य जयंती महोत्सव की हार्दिक बधाई।श्रीनिम्बार्काचार्य ने समस्त वैष्णव आचार्यों एव श्रीशंकराचार्य से पूर्व धर्म की लडखडाती ध्वजा को संभाल कर और ईश्वर भक्ति जो कर्मकाण्ड में ही उलझा दी गई थी को  "उपासनीयं नितरां जनैः" के घोष द्वारा सर्वजन के अधिकार की घोषित कर प्रत्येक जीव को - "ज्ञानस्वरूपञ्च हरेरधीनं" बताकर प्रत्येक मानव को ज्ञान का अधिकारी और श्रीहरि के आधीन घोषित किया।

श्रीनिम्बार्काचार्य ने  द्वैत और अद्वैत के खण्डन मण्डन की प्रवृत्तियों के प्रारम्भ से बहुत पूर्व वेदान्त में स्वाभाविक रूप से प्राप्त द्वैताद्वैत सिद्धांत को ही परिपुष्ट किया।  ब्रह्म के सगुण-निर्गुण,  साकार-निराकार सभी स्वरुप स्वाभाविक हैं। इनमें किसी एक के निषेध का अर्थ होता हैं ब्रह्म की सर्वसमर्थता, सर्वशक्तिमत्ता में अविश्वास करना।

अखिल ब्रह्माण्ड में जो हैं सब ब्रह्ममय ही हैं, ---
"सर्वं हि विज्ञानमतो यथार्थकंश्रुतिस्मृतिभ्यो निखिलस्य वस्तुनः |
ब्रह्मात्मकत्वादिति वेदविन्मतं त्रिरुपताअपि श्रुतिसुत्रसाधिता ||
श्रीनिम्बार्क के विचार में जगत भ्रम या मिथ्या नहीं, अपितु ब्रह्म का स्वाभाविक परिणाम है।
श्रुति और स्मृति वचनों से इसकी सिद्धि होती हैं।

कई लोग श्रीनिम्बार्काचार्य को श्रीशंकराचार्य के परवर्ती सिद्ध करने का प्रयास करते हैं उसके सन्दर्भ में तथ्यों का स्वयं परीक्षण ना करके कॉपी-पेस्ट करने की प्रवृति ज्यादा घातक हुई हैं।
आचार्य निम्बार्क ने ब्रह्मसूत्रों पर "वेदान्तपारिजात सौरभ" नामक सूक्ष्म भाष्य लिखा हैं।
आचार्य के भाष्य में बौद्ध-दार्शनिक "वसुबन्धु"(समय चौथी से पांचवी शती)  के अस्तित्व-वादी मत का उल्लेख हुआ हैं, और सिर्फ बौद्ध-जैन मत की आलोचना हुई हैं।
इसमें श्रीशंकराचार्य के मायावाद एवं अद्वैतवाद का खंडन नहीं हुआ हैं। उत्पत्यधिकरण सूत्र में आचार्य निम्बार्क ने "शक्ति कारणवाद" का खंडन किया हैं।  यदि वे आदिशंकराचार्य के परवर्ती होते तो उनके "व्यूहवाद-खंडन" का भी प्रतिवाद करते।  इसके विपरीत आदिशंकराचार्य जी ने आचार्य निम्बार्क के द्वैताद्वैत दर्शन की आलोचना की  हैं।
इतना ही नहीं श्रीनिम्बार्क के उत्तराधिकारी आचार्य श्रीनिवासाचार्य द्वारा निम्बार्कभाष्य की टीका "वेदान्त-कौस्तुभ-भाष्य" में भी कहीं आदिशंकर के मत की आलोचना नहीं प्राप्त होती, जबकि बौद्ध दार्शनिक विप्रबंधु (धर्मकीर्ति) (समय पांचवी से छठी शती) का उद्धरण उन्होंने अपनी टीका में दिया हैं।
आचार्य शंकर ने अपने ब्रह्मसूत्र और बृहदारण्यकोपनिषत् भाष्य में दोनों ही आचार्यों के उद्धरणों प्रयुक्त कर द्वैताद्वैत/भेदाभेद की आलोचना की हैं।
१. श्रीनिम्बार्क -> २. श्रीनिवासाचार्य -> ३. श्रीविश्वाचार्य के बाद ४. श्रीपुरषोत्तमाचार्य ने अपने "वेदान्त-रत्न-मञ्जूषा" नामक वृहद-विवरणात्मक भाष्य में सर्वप्रथम (निम्बार्क परंपरा मे)  श्रीशंकराचार्य के अद्वैतमत का प्रबल खंडन किया था।

वर्तमान में निम्बार्क सम्प्रदाय की पीठ सलेमाबाद, किशनगढ़ राजस्थान में स्थित हैं।  जिसकी स्थापना आचार्य श्रीपरशुरामदेव ने की थी।  विक्रम संवत १५१५ का उनके नाम से पट्टा तत्कालीन शासकों द्वारा दिया गया मौजूद हैं।
आचार्य परशुरामदेव श्रीनिम्बार्क से ३३ वीं पीठिका में थे।
उनके गुरु श्रीहरिव्यासदेव के गुरु श्रीभट्टदेवाचार्य की रचना "युगलशतक" के दोहे "नयन बाण पुनि राम शशि गनो अंक गति वाम।  प्रकट भये श्री युगलशतक यह संवत अभिराम।।"  से उनकी विद्यमानता विक्रम संवत १३५२ सिद्ध होती हैं।  इनके गुरु श्री केशव काश्मीरीभट्टदेवाचार्य हुए हैं जिनका काश्मीर निवास प्रसिद्द हैं।  श्रीभट्ट देवाचार्य अपने गुरु के सानिध्य में काश्मीर में ही अधिक रहे इसकी पुष्टि "तबाकते अकबरी भाग ३" से भी होती हैं।  तबाकाते अकबरी के अनुसार कश्मीर के शासक राजा उदल को पराजित कर सुलतान शमशुद्दीन ने कश्मीर में मुस्लिम शासन की शुरुवात की थी।  इसी शमशुद्दीन की आठवीं पीढ़ी में जैनूल आबदीन(शाही खान)  हुआ जो कला विद्या प्रेमी था।  इसके दरबार में श्रीभट्ट नामक पंडित का बड़ा सम्मान था जो बड़ा भारी कवि और भैषज कला में भी निपुण था।  श्रीभट्ट पंडित ने सुलतान को मरणांतक रोग से मुक्ति दिलाई थी तब श्रीभट्ट की प्रार्थना पर सुलतान ने अन्य ब्राह्मणों को जो उसके पिता सिकंदर द्वारा निष्काषित कर दिए गए थे पुनः अपने राज्य में बुला लिया था तथा जजिया बंद कर दिया था।  इसका शासन  काल वि. सं. १४३५ से १४८७ तक रहा।  इससे श्रीभट्टजी की विध्य्मानता वि. सं.१४४६ तक सिद्ध होती हैं।   वि. सं. १३५२ में उन्होंने युगलशतक पूर्ण किया जो की मध्य आयु में ही किया होगा।  इससे निष्कर्ष निकाल सकतें हैं की उनके गुरु श्री केशव काश्मीरीभट्टदेवाचार्य की विध्य्मानता वि. सं. १३०० से १४०० के आसपास तक रही।
इन्ही केशवदेव नें मथुरा में यवनों का दमन कर जन्मस्थान से मुस्लिमों के आतंक का शमन किया था।  "कटरा-केशवदेव"  इन्ही श्रीकेशवकाश्मीरीभट्टदेवाचार्य के नाम से प्रसिद्द हैं।  तथा वहां के कृष्ण जन्मभूमि मंदिर का गोस्वामी परिवार इन्हे अपना पूर्वज मानता हैं।  इससे भी इस तथ्य की पुष्टि होती हैं।
भक्तमालकार नाभादास जी ने भक्तमाल में इनके सम्बन्ध में अपने पद में "काश्मीर की छाप" और मथुरा में मुस्लिम तांत्रिक प्रयोग के विरुद्ध प्रयोग का विशेष उल्लेख किया हैं।  जब तेरहवीं शताब्दी में ३० वीं पीठिका के आचार्य श्री केशव काश्मीरीभट्टदेवाचार्य की विध्य्मानता प्रमाणित होती हैं तब श्रीनिम्बार्काचार्य को श्रीरामानुजाचार्य यहाँ तक की कई विद्वान श्रीमध्वाचार्य जी के भी परवर्ती सिद्ध कर देते हैं।  जितने भी शोध इतिहास लिखे जा रहे हैं सब सिर्फ पूर्व पूर्व की किताबों को कॉपी पेस्ट कर लिख रहें हैं परस्पर विरुद्ध तथ्यों की अनदेखी कर।
श्रीनिम्बार्क के अनुयायी उन्हें द्वापरान्त में प्रकट हुआ बताते हैं।  और आपने जिस काल गणना का संकेत किया हैं उससे भी निम्बार्क के द्वापरान्त में विद्यमानता की ही पुष्टि होना सम्भाव्य हैं।

मंगलवार, 29 मार्च 2016

निज कृत करम भोगु सब भ्राता

आज से लगभग 20 वर्ष पहले की बात होगी।  ​प्रमोद अपनी राजदूत मोटरसाइकल से रात 9 बजे अपने कार्यस्थल से ​अपने घर वापस जा रहा था। 
​सर्दियों का समय था,सर्दियों में गाँवों में 7 बजते बजते सूनसान हो जाया करती हैं।  ​गाँव की सिंगल सूनसान रोड पर उसे दिखाई दिया कि एक मोटरसाइकल पेड़ से टकरा कर पड़ी है और साथ ही दो व्यक्ति खून से लथपथ पड़े हैं। उसने अपनी बाइक की लाइट के उजाले में देखा एक  तो उसके ही गाँव व्यक्ति था दूसरा पडोसी गाँव का। 
​उसने मोटरसाइकल से उतर कर उन्हें हिलाया डुलाया, दोनों के सर में चोट थी और काफ़ी खून बह रहा था। 
दोनों ज़िंदा थे लेकिन बेहोश।  गाँव वाले व्यक्ति से तो इनकी लड़ाई हो रखी थी आपस में आन-जान और बोलचाल भी बंद थी।  लेकिन इसके मन में एक पल को भी ये नहीं आया की इनकी सहायता ना करूँ या इन्हे कुछ हो गया तो शक मेरे ऊपर आयेगा। 
वह  तुरंत भागकर कुछ कदम की दूरी पर स्थित ढाणी में गया और आवाज लगाकर लोगों को बुलाया। 
कुछ महिलायें और बच्चे बाहर आये। 
स्थिति ये निकली की 5 घरों की उस ढाणी के सभी पुरुष वहाँ के एकमात्र वाहन ट्रेक्टर ट्रॉली सहित किसी बरात में गए हुए थे, तो न तो वहाँ कोई साधन था और ना कोई सबल सहायक। 
व्यक्ति ने  महिलाओं से उनकी चार पांच ओढ़निया ली और ​पाँच - छ:  किशोर ​-बालकों को साथ चलने के लिए
क​हा।   उसने कहा की तुम इन दोनों को मेरे पीछे बैठा दो और इन ओढणियों से कसकर मेरे बाँध दो।  मशक्कत पूर्वक ऐसा किया गया और वो उन दोनों ज़िंदा लोथ को 9 किलोमीटर दूर एक क्लिनिक पे जा पहुंचा। क्लिनिक के पीछे ही स्थित घर से डॉक्टर को बुलाया गया और उनका उपचार शुरू हुआ। डॉक्टर ने उसके साहस और युक्ति की प्रशंसा करते हुए कहा की यदि ये रात भर ऐसे ही पड़े रहते तो खून के रिसाव और ठंढ के कारण ये वहीँ मर लेते।
​दोनों स्वस्थ होकर घर आ गए और इनके परिवारों में भी पुनः मेलजोल हो गया। 




अच्छी कहानी हैं ना ???
लेकिन कहानी अभी पूरी नहीं हुई। अब सत्रह बरस आगे चलिए।   11 नवम्बर 2012 धनतेरस के दिन  वही व्यक्ति अपने डीलरों से बकाया वसूली करके लिए बीकानेर/श्रीगंगानगर एरिया से ​ वापस लौट रहा था।
ड्राईवर साथ नहीं था तो इनोवा खुद ही चला रहा था। उस समय जयपुर-सीकर हाइवे पे फोर लेन बनाई जा रही थी।
जगह जगह ट्रैफिक डायवर्जन किया हुआ था, दोनों साइड के वाहन एक ही रोड पर आ जा रहे थे।  ये भी त्योंहार पे घर पहुँचने के उल्लास में गाडी चला रहा था, जयपुर अभी लगभग 52 किलोमीटर दूर था ज्यादा नहीं दूरी और ट्रैफिक के अनुपात से डेढ़ घंटे की ही दूरी थी। 
अरेरे यह क्या सामने से एक वीडियोकोच वाला डायवर्जन में  दनदनाता हुआ आता दिखा, इसने गाडी बाईं तरफ दबाई लेकिन उस साइड भी एक मोटरसाइकिल वाला था, साइड दबाते ही वो बाइक सहित नीचे खेत में कूद गया ये संभालता उससे पहले ही बस इसकी इनोवा को दायीं तरफ़ से पूरी छिलता हुआ घसीट गया।
एक धमाका हुआ और दिमाग सुन्न!!!!!!
आसपास के लोग दौड़े आये पचखड़े हुई गाडी से इसे निकाला, दायें हाथ की कोहनी और कंधे के बीच  हड्डी टूटकर मांस फाड़कर बाहर निकल आई थी नीचे दायें पाँव में भी जांघ की हड्डी टूटकर मांस और पैंट फाड़कर बाहर झाँकने लगी थी। दोनों जगह से बुरी तरह खून बहे जा रहा था।
तीन युवक गाडी का सारा सामान जिसमे कलेक्शन किये हुए पांच-सात लाख रुपये थे, सहित तुरंत अपनी स्कॉर्पियो में लिटा जयपुर रवाना हो गए। इसका शरीर और मन दोनों ही मजबूत हैं जहाँ लोग सोच रहे थे की ये आधे रस्ते में ही मर जाएगा इसे पूरा होश था।
युवकों ने इससे नंबर पूछकर इसके बड़े भाई को सूचित किया और कहा की आप तुरंत हॉस्पिटल की व्यवस्था कीजिये और बताइये कहाँ लेकर पहुंचना हैं। बड़े भाई ने डूबते मन से कहा एक बार संभव हो तो मेरी बात करवा दो। पट्ठे की हिम्मत और मानसिक मजबूती देखिये फोन पे भाई से कहा भाईजी बस हाथ और पाँव की हड्डी ही टूटी हैं और कुछ ख़ून बह रहा हैं बाकी मैं बिलकुल ठीक हूँ।  चिकित्सा राज्यमन्त्री इसके मित्र थे, भाई ने उन्हें फोन कर सारी स्थिति से अवगत कराया। SMS हॉस्पिटल की इमरजेंसी में तत्काल डॉक्टर तैनात हो गए, मन्त्री खुद पहुँच गए।  बेसब्री बढ़ती जा रही थी गाडी इमरजेंसी के बाहर रुकी इसे तुरंत अन्दर पहुँचाया गया, टीम ने इलाज शुरू किया दूसरे दिन ऑपरेशन हुआ, दिवाली अस्पताल में ही मनी, 20 दिन में बन्दा घर पहुंचा।
उधर मरीज के घर वाले उन युवकों के पाँव पड़ रहे थे वो परिवार के लिए साक्षात भगवद् दूत थे।
युवक मासूमियत से कैश सम्भलाते हुए भाइयों से कह रहे थे देख लीजिये/संभाल लीजिये। :)




रविवार, 20 मार्च 2016

भये मरद तैं रांड

जगद्गुरु श्रीनिम्बार्काचार्य श्रीहरिव्यासदेवाचार्य जी ने अपने श्रीमहवाणी जी में सेवा सम्बन्धी निर्देशन करते हुए कहा हैं --
"प्रातः काल उठि कै धार सखी को भाव।
जाय मिले निज रूप सौ याको यही उपाव।।"
श्रीयुगल उपासना के लिए सखी भाव हृदय में दृढ़ होना चाहिए, बाहरी लहंगा, चुनरी अथवा मेहँदी आदि कृत्रिम सखी स्वरुप धारण करने का निषेध करते हुए इसे परम निंदनीय पूज्य आचार्यश्री गण अपनी वाणी में बताते हैं।
इसी भाव को विस्तार देते हुए आपके पट्ट शिष्य आचार्य श्रीपरशुरामदेव अपने परसुरामसागर में निम्न निर्देशन करतें हैं। --
मैंधी मौली मनवसि, भये मरद तैं रांड।
परसा सेवै भामनि, भगत नाहिं वे भांड।।१।।
प्रेम भगति साधी नहीं, लागै भरम विकारि। 
परसा सेवै भामनि, भये पुरुष तैं नारि।।२।।
परसा परहरि स्वामिनी, भज्यो न केवल स्वामि। 
तौं तनकौं यौंही धर्यो, लाग्यो जीव हरामि।।३।।
परसा ब्रह्म अपार कौ, जपै जु अजपाजाप। 
भूलि गये हरि भगति कौ, लागौ सखी सराप।।४।।
मन मैं सखी सरुप कै, तन धारै ज्यौं दास। 
परसराम ता दास कैं, हिरदै जुगल निवास।।५।।

रविवार, 31 जनवरी 2016

"अघटित घटन, सुघट बिघटन, ऐसी बिरुदावली नहिं आन की।"

विनय पत्रिका में तुलसी बाबा हनुमानजी के लिए कहते हैं 
"अघटित-घटन, सुघट-बिघटन, ऐसी बिरूदावलि नहिं आनकी"
जो न घटने वाली घटना को घटा दे और जो घटना घटने वाली हो उसे विघटित कर दे ऐसा सामर्थ्य हनुमानजी का हैं !!!!!

और किसमें हैं ऐसा सामर्थ्य???
क्या स्वयं रामजी में भी नहीं!!!!!

काल सबको खाता हैं सब काल के वश में हैं लेकिन हनुमान जी महाकाल हैं।
काल स्वयं इनके वश में हैं इनके हाथ का खिलौना हैं  काल ---- "हाथ वज्र .........विराजे" वज्र मने काल 😊

दूसरे हनुमान जी इस प्रकृति से भी परे हैं।
क्योंकि इस प्रकृति प्रपंच को रघुनाथ जी ने गुण-दोष सहित रचा हैं, "सकल गुण दोषमय बिस्व कीन्ह करतार" 
संसार में ऐसा कोई नहीं जो सिर्फ़ गुणी हो या सिर्फ़ अवगुणी हो, गुण अवगुण दोनों ही सबमें रहतें है।
एक हनुमान जी में ही सिर्फ़ गुण ही गुण भरे हैं, "सकल गुण निधानम"।
क्योंकि जगन्माता जानकी जी ने ही इन्हें आशीर्वाद दिया हैं "........गुणनिधि, सुत होहु"
 इतना सुनकर तो प्रकृति भी मौन रह गई की अब तो हमारा भी कुछ बस नहीं हैं, अब तो
"अघटित घटन, सुघट बिघटन" समर्थ हनुमान जी हो गए हैं।
एक कारण और भी हैं, ऐसा सामर्थ्य तो परमेश्वर के अलावा और किसका हो सकता हैं, और हनुमान जी परमेश्वर हैं नहीं ये तो उनके दास हैं फिर उनका ऐसा बल कैसे हुआ???
सीधी सी बात हैं हनुमान जी का खुद का कोई बल हैं ही नहीं ;)  !!!!!!
क्या बात करते हो!!!    उनको "अतुलित बल धामं" कहा गया हैं और तुम कहते हो उनका कोई बल ही नहीं हैं!!!!

देखो भईया धाम कहते हैं घर/मन्दिर/तीर्थ को, तो हनुमान जी तो धाम हैं जिसमे बल रहता हैं और प्रभु से सम्बंधित स्थान को ही धाम कहा जाता हैं तो धाम हनुमानजी और धामी प्रभु का बल और बल तथा बलवान अलग अलग होते नहीं तो सारा सामर्थ्य हुआ रामजी का।
इसलिए "अघटित घटन, सुघट बिघटन, ऐसी बिरुदावली नहिं आन की।"
😊😊😊😊😊😊

रविवार, 13 दिसंबर 2015

"कृपा करहुँ गुरुदेव की नाई"

"बुद्धि हीन तनु जानि के । सुमिरौ पवन कुमार ।
बल बुधि विद्या देहु मोहि । हरहु कलेस विकार ।"

हनुमान चालीसा उन श्रीहनुमातलाल की वंदना हैं।
जो अपने मान का हनन करने के कारण "हनुमान" कहलाते हैं।
हनुमान जी हैं गुरु और उनका स्वभाव हैं जीव को श्रीराम भक्ति की ओर उन्मुख करना।

"कृपा करहुँ गुरुदेव की नाई" के भाव से जब हम उनके शरणागत होते हैं तो,  प्रथमतः तो स्वयं हनुमान अपने स्वरुप से हमें शिक्षा देते हैं अपने मान, अहं को त्यागने की।
दूसरे परमगुरु श्रीहनुमान की शरण होते हैं तो स्वतः ही जीव की अहं बुद्धि का त्याग हो जाता हैं और ऐसा मान रहित भक्त पहली प्रार्थना ही ये करता हैं -

हे पवनकुमार मैं बुद्धिहीन आपकी शरण हूँ मुझे अपनी शरण लीजिये और आत्मबल, निश्चयात्मक बुद्धि और आत्मज्ञान रूपी विद्या का दान दीजिये जिससे मेरे कलेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश ) और विकार (काम क्रोध लोभ मोह अहंकार) का नाश हो हरण हो।
जो जीव अपने अहंकार का अपने मान का हनन करके परम गुरु श्रीहनुमान जी का स्मरण करेगा उनकी शरणागति लेगा हनुमत कृपा से उसके अविद्या, अस्मिता आदि पञ्च क्लेश और काम, क्रोध आदि पञ्च विकारों का नाश होकर श्रीराम भक्ति की प्राप्ति होगी।
गुरु स्वयं अपने स्वरुप शक्ति का शिष्य में अधिष्ठान करता हैं, तो जिस अहंम शून्य शरणागत शिष्य में परम गुरु हनुमान अपने स्वरुप का अधिष्ठान करेंगे वो जीव भी स्वयं हनुमान हो जाएगा।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

"केशव (कृष्ण) का पतन (मृत्यु) देखकर पाण्डव हर्ष से भर गये और सारे कौरव 'हा केशव' कहकर रोने लगे" ;) ;)


wink emoticon wink emoticon
असुरों के दुष्कर्म को आप निम्न दो श्लोकों के उदहारण से आसानी से समझ लीजिये।
एक सुभाषित श्लोक हैं ----
केशवं पतितं दृष्ट्वा पाण्डवा: हर्षनिर्भरा:।
रोदन्ति सर्वे कौरवा: हा हा केशव केशव ॥
इसका प्रथम दृष्टया अर्थ मुझे और आपको यही समझ आयेगा कि "केशव (कृष्ण) का पतन (मृत्यु) देखकर पाण्डव हर्ष से भर गये और सारे कौरव 'हा केशव' कहकर रोने लगे" क्या ये इसका वास्तविक अर्थ हुआ ?????
कृष्ण का पतन देखकर पाण्डव कैसे हर्ष से भर जाएंगे और कौरव क्योंकर दुःख मनाने लगेंगे !!!!!!!
लेकिन श्लोक का महाभारत युद्ध, कृष्ण, पाण्डव या कौरवों से दूर दूर तक क्या कहीं भी कुछ भी सम्बन्ध नहीं हैं।
इसका अर्थ है -
के (क) - पानी में
शवं - लाश को
पतितं - गिरते
दृष्टवा - देखकर
पाण्डवाः - मछली या बागळ,
हर्षनिर्भराः - हर्ष से भर गए
रोदन्ति - रोने लगे
सर्वे - सारे
कौरवाः - कौवे
हा केशव - हाय शव पानी में
शव को पानी में गिरते देख जलीय मछलियाँ हर्ष से भर गयी और सारे कौवे रोने लगे की हाय शव पानी में गया।
अब बताइये असुर अर्थ क्या अनर्थ कर सकता है smile emoticon
अच्छा एक अगला श्लोक भी देखिये -
हतो हनुमतारामो सीता सा हर्षनिर्भरा। रुदन्ति राक्षसास्सर्वे हाहारामो हतो हतः॥
हनुमान ने राम को मार डाला जिससे सीता हर्ष से भर उठी, और सारे राक्षस रोने लगे की हाय राम को मार डाला।
अब हैं ना ये सत्यानाशी अर्थ smile emoticon
राम किस प्रकार मारे जायेंगे ??? उनकी मृत्यु के समाचार से भगवती सीता माँ कैसे हर्ष मनाएंगी ?? मारेगा भी कौन, हनुमानजी !!!!!!!!! और राम के मारे जाने के समाचार से राक्षस दुःखी होंगे !!!!!!!
भेरी फन्नी smile emoticon smile emoticon
हनुमत+आरामः =हनुमतारामः - हनुमान ने जहाँ आराम पाया = अशोक वाटिका
हनुमान ने अशोक वाटिका को नष्ट-भ्रष्ट किया ये देखकर श्रीसीताजी हर्ष से भर गई और अपनी वाटिका का हनन देखकर सारे राक्षस दुःख से हाय हमारा आराम (बागीचा) कहकर रोने लगे।
ये श्लोक तो लौकिक संस्कृत के हैं इनमें ही असावधानी पे अर्थ का अनर्थ सम्भाव्य हैं।
वैदिक संस्कृत तो गहन हैं उनको छिछली बुद्धि से समझने की कोशिश बिजली के नंगे तार छूने के ही समान घातक हैं।
मित्रों! सनातन वाणी हैं शान्ति की, सद्भाव की, सर्वेः भवन्तु सुखिनः की, इसमें अशान्ति, दुर्भाव और दूसरों को दुःख देने की ध्वनि सुनने की कोशिस करना पत्थर निचोड़कर पानी टपकाने का प्रयास करने के ही सामान निष्फल हैं। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में खींचतान करके मांसाहार, गौहत्या, आदि सिद्ध करने का प्रयास उनकी दुष्टता का परिचायक नहीं हैं, ये हमारी मूर्खता का परिचायक हैं। हमने हमारे ऋषियों की वाणी का अध्ययन, मनन, करना बंद कर दिया तो जो चाहे अपनी मर्जी अनुसार आसानी से मांसाहार, अश्लीलता की प्रतीति आपके ग्रंथों में आपको करवाकर आपके मन में अपनी ही जड़ों के प्रति ग्लानि का भाव भर सकता हैं। भर क्या सकता हैं भर रहा हैं। और आप हम अपने ही आलस, अपनी मूढ़ मति के वशीभूत अपने अमृत कुण्ड को गंगा नाला माने जा रहे हैं।
जो साधारण संस्कृत नहीं जानते वे वेदों की क्लिष्ट संस्कृत के विद्वान बनते हुये अर्थ का अनर्थ करते है। शब्द तो काम धेनु है उनके अनेक लौकिक और पारलौकिक अर्थ निकलते है । अब किस शब्द की जहाँ संगति बैठती है, वही अर्थ ग्रहण किया जाये तो युक्तियुक्त होता है अन्यथा अनर्थकारी। ऐसे ही बहुत से शब्द वेदों मे प्राप्त होते है, जिनको संस्कृत भाषा और भारतीय संस्कृति से हीन व्यक्ति अनर्गल अर्थ लेते हुये अर्थ का कुअर्थ करते हुये अहिंसा की गंगोत्री वेदों को हिंसक सिद्ध करने की भरसक कोशिश करते है। इसलिए बार बार कहा जाता हैं अपने ग्रंथों को पढ़िए बार बार पढ़िए सनातन वाणी अपना शुद्ध अर्थ स्वयं प्रकट करेगी।

रविवार, 19 जुलाई 2015

गजब का सपना।



आज रात को मुझे गजब का सपना आया। वैसे तो सपने मुझे कभी कभी ही आते है, और जो आते है उन्हें मैं भूल जाता हूँ। पर यह सपना अभी तक भी स्मृति पटल पे बिलकुल ताजा बना हुआ है। और हो भी क्यों नहीं सपना ही ऐसा था।  रात को जब गहरी नींद में था तो क्या देखता हूँ की एक महान विभूति बिलकुल चाँद की मानिंद उज्जवल वस्त्र पहिने,पूर्णिमा के चन्द्रमा की भांति चमकदार चेहरा,विशेष गरिमामय व्यक्तित्व लिए  मेरे सामने प्रकट हुए।  मैं उन्हें पहचान नहीं पाया पर उनके गरिमामय व्यक्तित्व से सम्मोहित हुआ, उन्हें  परमेश्वर का अंश जानकर उनके सामने दंडवत हो गया।  मैंने विस्मित  होते हुए पूछा की आप कौन  है और किस प्रकार कृपा कर मुझे दर्शन दिए है। उन्होंने मुझे उठाया और कहा की मै तेरी सोच पे अपनी मोहर लगाने आया हूँ।  मैंने कहा की मै कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ।  तब उन्होंने निर्मल मुस्कराहट  के साथ मुझसे कहा की "मैं उस परवरदिगार का रसूल हजरत मुहम्मद हूँ , और कुरआन को लेकर तेरे मन में जो  विचार उत्पन्न हुए है उन पर अपनी मुहर लगता हूँ ". इतना कहते ही वह  दिव्य स्वरुप अन्तर्निहित हो गया और मेरी नींद खुल गयी।
अब आप जानना चाहते  होंगे की श्रीमोहम्मद साहब ने मेरे कुरआन विषयक किन विचारों पे अपनी मोहर लगायी थी. (चाहे सपने में ही लगायी हो,और सपने दिनभर के विचारों की परिणिति ही क्यों ना हो) 

तो बंधुओ गौर से पढिये मेरे कुरआन विषयक विचार और सोचकर  मुझे बताइए की क्या यह भी हो सकता है ?,या यही हुआ है ? ---

मुझे शक है की वर्तमान में जिस किताब को पवित्र कुरआन कहा जाता है, वही असल कुरान है, जिसे परमेश्वर ने श्रीमोहम्मद साहब पे नाजिल किया था।  क्योंकि श्रीमोहम्मद साहब की जीवनी पढते हुए उल्लेख मिलता है की श्रीमोहम्मद साहब के जनाजे में  काफी कम लोग शामिल हुए थे।   क्योंकि  उनके अनुयायी खलीफा पद की लड़ाई में उलझ गए थे।  अब बताइए की जो अनुयायी आज तक उनके ऊपर शान्ति नाज़िल होने की प्रार्थना करते है, वो उनकी पार्थिव देह को भी शांति से सुपुर्दे-खाक नहीं कर सके। 
तो जो लोग अपने मसीहा की उनकी पार्थिव देह को भी उचित  सम्मान नहीं दे पाए और सत्ता के लिए लड़ने लगे हों, क्या उन्होंने सत्ता के लिए श्रीमोहम्मद साहब की शिक्षाओं की हत्या करके कुरआन में सत्ता प्राप्ति की सहायक आयतों का समावेश नहीं किया होगा।
इस तथ्य की पुष्टि इस्लाम के लगभग सौ से ज्यादा पंथों द्वारा एक दूसरे को फ़र्ज़ी इस्लाम वाला घोषित करने, एक दूसरे को समाप्त करने,  एक दूसरे की मस्जिदों को जिन्हे खुदा का घर कहा जाता हैं को  ढहाने आदि से होती हैं।  
आमतौर पर लोग मुसलमानों के दो ही फिरकों शिया और सुन्नी के बारे में ही सुनते रहते है ,लेकिन इनमे भी कई फिरके है। इसके आलावा कुछ ऐसे भी फिरके है ,जो इन दौनों से अलग है। इन सभी के विचारों और मान्यताओं में इतना विरोध है की यह एक दूसरे को काफ़िर तक कह देते हैं, और इनकी मस्जिदें जला देते है।  और लोगों को क़त्ल कर देते है .शिया लोग तो मुहर्रम के समय सुन्नियों के खलीफाओं ,सहबियों ,और मुहम्मद की पत्नियों आयशा और हफ्शा को खुले आम गलियां देते है।
सुन्नियों के फिरके -हनफी ,शाफई,मलिकी ,हम्बली ,सूफी ,वहाबी ,देवबंदी ,बरेलवी ,सलफी,अहले हदीस .आदि -
शियाओं के फिरके -इशना अशरी ,जाफरी ,जैदी ,इस्माइली ,बोहरा ,दाऊदी ,खोजा ,द्रुज आदि
अन्य फिरके -अहमदिया ,कादियानी ,खारजी ,कुर्द ,और बहाई आदि 
इन सब में इतना अंतर है की ,यह एक दुसरे की मस्जिदों में नमाज नहीं पढ़ते, और एक दुसरे की हदीसों को मानते है .सबके नमाज पढ़ने का तरीका, अजान सब अलग है  इनमे एकता असंभव है। 
श्रीमोहम्मद साहब ने तत्कालीन अरब में फैली बर्बर कबीलाई परम्पराओं को तोड़ते हुए शुद्ध वैदिक धर्म की महिमा का पुनर्स्थापन किया था।  जिसे उनके अनुयायियों ने अपनी वासनाओं,और हैवानियत  की राह  में रोड़ा मानते हुए, पवित्र कुरआन में बर्बर और अनर्गल आयातों का समावेश कर दिया, जिससे की उन्हें खलीफा पद के रूप में कौम की बादशाहत, और लुटेरों के रूप में दुनिया की बेशुमार दौलत प्राप्त हो सकें।
तो यह है पवित्र कुरआन को लेकर मेरी चिंता और मेरे सपने में पधार कर श्रीमोहम्मद साहब द्वारा इसकी पुष्टि करने का हाल।  

वैसे सपना तो सपना हैं, लेकिन जिज्ञासा का समाधान तो होना चाहिये, क्यों एक किताब, एक खुदा और एक रसूल को मानने वाले आपस में मारकाट मचाये हुए हैं।  वहीँ दूसरी और असंख्य शास्त्रों, एक ब्रह्म के असंख्य रूपों और असंख्य गुरुओं को मानने वाले आपस में भी एक होकर रहतें हैं और सम्पूर्ण विश्व के लिए भी शान्ति की प्रार्थना करतें हैं।




शनिवार, 4 अप्रैल 2015

"राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहाँ बिश्राम"

​​
(चित्र गूगल से )

​वर्तमान में सबसे ज्यादा भीड़ आकर्षित करने वाले मंदिरों में हनुमान जी के मंदिर प्रमुख हैं। 
हम देखतें हैं हर गली नुक्कड़ पर हमें श्रीहनुमान जी के मंदिर मिल जातें हैं।  मंगलवार शनिवार दर्शनार्थी भीड़ की लम्बी कतार।  किसी से पूछो तुम्हारे इष्ट कौन हैं झट से हनुमान जी का नाम ले देगा।
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​सर्वप्रथम तो हनुमान जी इष्ट होने लायक मैटेरियल ही नहीं हैं।  श्रीहनुमतलाल को इष्ट मानना स्वयं उनके साथ अन्याय हैं, उनकी महिमा का, उनकी गरिमा का अवमूल्यन हैं। 
श्रीहनुमतलाल की गरिमा उनकी गुरुता से हैं। हनुमान इष्ट प्राप्ति कराने वाले गुरुदेव ही हो सकतें हैं यही उनकी महिमा हैं. सांसारिक ताप से पीड़ित जीवों को ज्ञान प्रदान कर ब्रह्म की, इष्ट की प्राप्ति कराना, हरि विमुख जीवों को भक्ति मार्ग पर अग्रसर करने वाले गुरु!!!  यह हनुमानजी का स्वरुप हैं।
श्रीहनुमान श्रीसीताराम की भक्ति-कृपा प्राप्ति कराने वाले गुरुदेव हैं, हनुमतलाल जी भक्ति के परमाचार्य हैं।  जो व्यक्ति हनुमान जी की उपासना/साधना कर उनसे सांसारिक भोग, भौतिक उन्नति की कामना करता हैं उसका यह कर्म भक्तिमार्ग से तो निष्फल हैं ही कर्मकाण्डीय रूप में भी निष्फल हैं।
कर्मकाण्ड में भी सैद्धांतिक रूप से जो देव जिस तत्व का अधिष्ठाता होता हैं वह साधना के फल स्वरुप वही तत्व प्रदान सकता हैं।  आध्यात्मिक और भौतिक दोनों ही दृष्टि  से हनुमत कृपा जीव को ब्रह्म की ओर ही उन्मुख करेगी, संसार में उसको अपने संसाधन परहित में लगाने के लिए प्रेरित करेगी। 

हनुमानजी के स्वरुप को समझने से पहलें हमें उनके ध्येय वाक्य को पहले समझना होगा।  श्रीहनुमानजी का  ध्येय वाक्य हैं "राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहाँ बिश्राम"  हनुमान जी निरंतर रामजी के काज में लगे हुए हैं बिना विश्राम। 
हनुमानजी का प्राकट्य ही राम काज के लिए हुआ हैं -
"राम काज लगि तव अवतारा"
"राम काज  करिबे को आतुर"
"रामचन्द्र के काज संवारे"

उनका अवतरण राम-काज के लिए, उनकी आतुरता राम-काज के लिए, वस्तुतः  उनकी सम्पूर्ण चेतना ही  राम-काज संवारने के लिए हैं, इसके बिना इन्हे चैन नहीं और बस निरंतर प्रभु श्रीराम के काज को आज तक सँवारे जा रहे हैं।
निरंतर !!!!  मन में शंका उठेगी की अब कौन सा काम बाकी हैं राम काज तो कब का पूरा हुआ।   सुग्रीव को उसका राज मिल गया, सीताजी की खोज हो गयी, लंका भी जल गयी, संजीवनी बूटी भी आ गयी, रावण मारा गया और राम राज की स्थापना भी हो गयी अब क्या राम काज शेष रहा ????
पर क्या सृष्टि के कण कण में रमण  करने वाले श्रीराम की रामायण इतनी ही हैं ????   क्या किसी काल विशेष की घटनाओं का वर्णन ही रामायण हैं ???
नहीं !  हरि अनंत हैं उनकी कथा अनंत हैं।  सम्पूर्ण जगत सियाराम मय हैं।  कण कण में राम हैं कण कण में रामायण का विस्तार हैं। 
युग विशेष की सीमा में तो हनुमान ने सीता की खोज पूरी  कर ली और उनका मिलन भी राम से  हो गया परन्तु यह जो ब्रह्म अंशी जीव "आत्माराम" हैं इसकी सीता अर्थात शांति का हरण विकार रुपी रावण नें कर लिया हैं निरंतर कर रहा हैं उसी आत्माराम को उसकी शांति सीता का मिलन  विकार रुपी रावण का वध करवाकर करा देना ही हनुमान का निरंतर राम काज हैं।
श्री शंकराचार्य कहतें हैं -"शान्ति सीता समाहिता आत्मारामो विराजते।
 
अब जो जीव की ये शान्ति हैं यह खो गयी हैं।  खो नहीं गयी वस्तुतः उसका हरण हो गया हैं, विकार रुपी रावण द्वारा उसका हरण हुआ हैं।  
सीता धरती की  बेटी हैं अर्थात हमारा धरती से जुड़ाव, सरल संयमित जीवन ही शांति प्रदान करता हैं।  लेकिन जहां सोने की लंका अर्थात अपरिमित महत्वकांक्षाओं से भौतिक संसाधनो की लालसा से विकार बलवान होंगे लोभ प्रबल होगा बस वहीँ  हमारी शांति लुप्त हो जाएगी।  हम विकारों के दुर्गुणों के वश  हुए भौतिकता में अपनी शांति तो तलाश रहें हैं लेकिन वह मिल नहीं रही मिल भी नहीं सकती।  जब तक रावण का मरण ना होगा राम से  सीता का मिलन भी ना होगा। 

पर रावण को मारने से पहले सीता की खोज जरूरी हैं और यह दोनों काम बिना हनुमान के संभव नहीं हैं। 
हनुमान अर्थात जिसने अपने मान का हनन कर दिया हैं।  हम अपने जीवन में अहंकार का नाश करके ही अपने आत्मा  रुपी राम से  शांति रूपा सीता का मिलन  संभव कर सकतें हैं।  

और आगे श्रीराम का काज क्या हैं ?  राम की प्रतिज्ञा हैं - "निशिचर हीन करहुं महि
"।  
राम अवतार का हेतु हैं -
"असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु॥"
 "जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥"

राम का लक्ष्य हैं निशिचर विहीन धरा, अर्थात तामसी वृत्तियों का दमन और सात्विकता का प्रसार।  जब जब धर्म की हानि होती हैं यानी संसार की धारणा शक्ति समाज के अनुशासन, पारस्परिक सौहार्द्य का, व्यक्ति के सहज मानवीय गुणों का जब पतन होता हैं तो उस स्थिति का उन्मूलन राम का कार्य हैं।
 
​श्रीमदभगवद गीता के सोलहवें अध्याय में भगवान ने मनुष्य मात्र को दो विभागों में विभाजित कियां हैं और उनके लक्षणों की विशद व्याख्या की हैं।  ऐसी आसुरी वृत्तियों वाले मनुष्यों का नियमन और दैवीय सात्विक प्रवृत्ति जनो को सहज जीवन की सुरक्षा का व्यहन करना राम का कार्य हैं।  राम के इसी कार्य को श्रीहनुमत लाल निरंतर बिना विश्राम किये किये जा रहें हैं।
राम शाश्वत  हैं, तो उनकी यह सृष्टि भी जड़-चेतन सहित शाश्वत  हैं।  और यह स्वभावतः ही
​"सकल गुण-दोषमय" हैं।  
इसमें ऐसा नहीं हो सकता की गुण ही विद्यमान रहें और दोष समाप्त हो जाएँ।  अवस्थाएं उच्त्तम और निम्नतम हो सकती हैं परन्तु अस्तित्व हीनता किसी की नहीं हो सकती।  सद्गुणों का उभार और दुर्गुणों का नियमन ही राम काज हैं। 
और इस राम काज को सिवा हनुमान के कोई और कर भी नहीं सकता।  अपने अभिमान का हनन करने वाले हनुमान, सद ज्ञान और सद गुणों के सागर,  बन्दर के समान चंचल मन को अपना दास बनाने वाले कपीश, ​
​ मन-कर्म-वचन में समता से ​
​लोक विख्यात, श्रीराम की सत्यता, शीलता,जीवन की मर्यादा के प्रसारक/
दूत
​, चर-अचर के हित चिंतन से उत्पन्न अतुलित आत्म बल के धाम हनुमान ही यह कार्य संपन्न कर सकतें हैं।
 
प्रत्येक वह व्यक्तित्व जो यह गुण-स्वाभाव-चरित्र अपने में समाहित कर सकता हैं वह अनंत राम की अनंत ​
रामायणों के अनंत हनुमानों में से एक हनुमान हैं। 
हम ज्यों ज्यों अपने मान का हनन करेंगें अपने अभिमान को गलायेंगे त्यों त्यों हमारे अंतर में बल की वृद्धि होगी।  ये बल तामसी नहीं अपितु सात्विक होगा जो अभय पद की प्राप्ति कराता हैं।  श्रीराम कृपा ही अभय पद हैं जो बिना हनुमान के संभव ही  नहीं हैं। 

इसलिए श्रीहनुमतलाल जी से सिर्फ और सिर्फ भगवद्भक्ति प्राप्ति की प्रार्थना कीजिये।  उनसे सिर्फ निरंतर परहित कर पाने के सामर्थ्य का वरदान मांगिये। यही वास्तविक श्रीहनुमत उपासना हैं।