गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा // १/१/१// ब्रह्मसूत्र 
ब्रह्म कौन है ? उसका स्वरुप क्या है ? इस विषय पे बड़े बड़े विद्वानों के पसीने छूट जाते है. तो साधारण भोगी जीवो की क्या बिसात जो उस परब्रह्म के स्वरुप का वर्णन कर सके. वेद जिसे नेति नेति कहकर पुकारते है उस आदि,मध्य,अवसान रहित परमात्मा को जानने की कोशिश प्राचीन आत्मतत्व ज्ञानी ऋषि-मुनियों ने की थी. हम जैसे सड़े-गले विकारवान जीव उस तत्व को क्या समझ सकते है और क्या बखान सकते है. मानव को भगवान् ने विवेक-बुद्धि  प्रदान की है जिसकी सहायता से,और सदगुरु के निर्देशन में जीव उस परम तत्व को जानने समझने का प्रयत्न करता है. सदगुरु ही वह शक्ति है जो हमारी बुद्धि को निर्मल करके,हमारे आत्मकल्याण की राह दिखलाता है. इसी लिए हमारे शास्त्रों में सदगुरु को महान और पूजनीय बताया गया है. 
हमारी परम्परा और दूसरी परम्पराओ में यही तो सबसे बड़ा फर्क है की हम ब्रह्म को सर्वव्यापी मानते हुए कण कण में उस सर्वव्यापी को व्याप्त मानते है,जबकि दूसरी परम्पराए उसे अलग-थलग चित्रित करती है.
विचार करने की बात है की यह जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड देखने,सुनने ,और अनुभव करने में आ रहा है, जिसकी सृष्टि रचना के एक अंश पर भी विचार करने से आश्चर्यचकित  होना पड़ता है, हमें दिखने वाला सारा जगत तो उस सञ्चालन कर्ता की शक्ति का एक अंशमात्र है.
यह सबका ईश्वर है,यह सर्वज्ञ है ,यह सबका अन्तर्यामी है,यह संपूर्ण जगत का कारण है, क्योंकि सब प्राणियों की उत्पत्ति,स्थिति,प्रलय का स्थान यही है. वह इस सारे जगत का कर्ता होते हुए भी अकर्ता है. उसका कर्तापन साधारण जीवों की भांति नहीं है .सर्वथा अलौकिक है.यह सर्वशक्तिमान सर्वरूप होने में  समर्थ होकर भी सबसे सर्वथा असंग है.सर्व्गुन्सम्पन्न होते हुए भी निर्गुण है .
हमें दिखाई देने वाले इस संसार का पैदा करने वाला और निमित्तकारण यह ब्रह्म ही है.
सर्वशक्तिमान परब्राह्म्पर्मेश्वरकी परा(चेतन जीव समुदाय) और अपरा (परिवर्तनशील प्रकृति) दो शक्तिया है. ये इसकी अपनी शक्तिया है इसलिए उससे अभिन्न है. वह इन शक्तियों का आश्रय है इसलिए इनसे भिन्न भी है.
 वेदों में ब्रह्म को चतुह्स्वरुपी बताया गया है -
१.ब्रह्म -----सत,चित,और आनंदस्वरूप है,वह निर्गुण और अक्षर रूप से विख्यात है.
२.ईश्वर ----वही ब्रह्म जब अचिन्त्य विविध रूप विशिष्ठ जगत की सृष्टि ,स्थिति,और लय करते है,तब ईश्वर कहलाते है. वही ब्रह्म संसार के निमित्त और उपादान कारण है.
३.वही ब्रह्म "एकोहम बहुस्याम" के अनुसार अपने चित अंश को अनंत रूपों में पसारित करके अपने स्वरुप से जीव समूह के रूप में प्रकाशित होता है.
४.ब्रह्म के जिन अनंत रूपों में चिदंश (जीव) प्रविष्ट हुए है,उन्ही अनंत रूप समूह का नाम ही जगत है .
उपरोक्त चारो स्वरूपों में ब्रह्म परिपूर्ण रूप से विराजमान है, जैसे समुद्र और तरंग अभिन्न होते हुए भी स्वरुप में भिन्न भी है उसी प्रकार जीव और ब्रह्म अभिन्न होते हुए भी स्वरूपतः भिन्न है.

 
 

13 टिप्‍पणियां:

  1. इस यज्ञ में आप कि ये आहुति भी सफल रही!जितनी गूढ़ बात उतनी ही सरलता से!

    लगे रहो.....

    कुंवर जी,

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  2. aapki posten pad alag hi aanand aata hai. dharm sanskriti ke bare men,tathyaparak or saral jankari aapke blog pe mil rahi hai.

    shubkamnaye

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  3. @ जैसे समुद्र और तरंग अभिन्न होते हुए भी स्वरुप में भिन्न भी है उसी प्रकार जीव और ब्रह्म अभिन्न होते हुए भी स्वरूपतः भिन्न है.

    hamare santon ne brahm ko kitne saralta se samjhaya h

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  4. आपको तो धरम का मार्गदर्शक होना चाहिए था भाई
    कहा फंस गये कंपनियों के चक्कर में
    चलो कोई बात नही ऐसे ही अपने ज्ञान रुपी चक्षुओ से इस धरा रुपी चिराग को हमेशा प्रकाशमान करते रहना.
    धन्यवाद

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  5. संजीव भाई धर्म का मार्ग तो सद्ग्रंथो, और सदगुरु से ही प्राप्त होता है,आप और मै तो सिर्फ जिज्ञासु है. जो जिज्ञासु है वही तत्वको जानने की कोशिश करता है. बाकी तो दस्युओं की तरह लूट-पात मचाये है .

    पुष्पेन्द्र जी आपके सहयोग के लिए धन्यवाद !

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  6. जो जिज्ञासु है वही तत्वको जानने की कोशिश करता है. बाकी तो दस्युओं की तरह लूट-पात मचाये है .

    ========================================================================== बड़े भाई साहब अमित जी - जय श्री राधे-राधे !!!

    आप जिज्ञासु भी हैं और ज्ञानी भी हैं, क्योंकि जिज्ञासु एक ऐसे मार्ग पर चलता है जिसकी मंजिल है तत्व ज्ञान, इसलिए इस पर चलने वाला स्वत: ही ज्ञानी हो जाता है !
    इस तत्वज्ञान के मार्ग पर ना तो वापसी का विकल्प होता है और ना ही विराम और विश्राम के लिए स्थान, इस स्थिति में तत्व ज्ञान को पाने और जानने की अभिलाषा भी अत्यंत दुर्लभ होती है !
    एक तरफ संसार होता है और दूसरी तरफ तत्व ज्ञान, इसीकारण चयन भी नितांत कठिन हो जाता है !
    तत्वज्ञान को पाने का ज्ञान ही ज्ञानी बना देता है -
    जिज्ञासा (जिज्ञ + आशा) - जानने योग्य को जानने की आशा (अभिलाषा)
    जानने योग्य इस संसार है क्या - केवल तत्वज्ञान क्योंकि यहीं परिपूर्ण है, इसे जानने के बाद कुछ भी शेष नहीं रह जाता है !

    जानने योग्य को जानना चाहिए उसे प्राप्त करने का निरंतर प्रयास करना चाहिए ऐसा केवल एक दृढ निश्चयी जिज्ञासु ही जानता है !
    जो ऐसा ज्ञान रखता हो वह ज्ञानी ही कहलाने योग्य है !!
    मेरे पूर्ण मत के साथ आप ज्ञानी हैं !!

    !!! बस एक ही धुन जय-जय भारत !!!

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  7. aapki vinamrtaa aur niruttar kar dene waali shaili ke kaaran hi aapke lekhon se miltaa dharm-prasaad swaadist lagtaa hai. ab kewal upasthi darz karwaanaa hi rah gahaa hi. kahin bhi koi halki baat nahin karte. aaj kaa yuvaa 30% bhi agar aap jaisa ban jaaye to desh men punah vaidik dharm vaayu bahane lage.

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  8. aapki vinamrtaa aur niruttar kar dene waali shaili ke kaaran hi aapke lekhon se miltaa dharm-prasaad swaadist lagtaa hai. ab kewal upasthiti darz karwaanaa hi rah gayaa hai. kahin bhi koi halki baat nahin karte. aaj kaa yuvaa 30% bhi agar aap jaisa ban jaaye to desh men punah vaidik dharm vaayu bahane lage.

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  9. aap kitna tasali se apni baat khete h acha lageta h,or jamaal ko pate to ubaal aa jata h.ese he bate batati raho

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  10. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  11. amit bhai, aapne jo likha pad kar dil khush huaa.sach me kuch hi log hoange jinko in sab baato ke baare main pata hoga.is ke liya thans..

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जब आपके विचार जानने के लिए टिपण्णी बॉक्स रखा है, तो मैं कौन होता हूँ आपको रोकने और आपके लिखे को मिटाने वाला !!!!! ................ खूब जी भर कर पोस्टों से सहमती,असहमति टिपियायिये :)